बच्चियों के साथ दुष्कृत्यों की बाढ़ सी आ गई, न जाने किस दिशा में जा रहा है समाज?



उसकी उम्र छह साल थी। पिता से अलग होने के बाद मां ने दूसरी शादी की थी। सौतेले पिता ने इस नन्हीं बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया। वह प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थी। वहां भी एक टीचर ने अलग से पढ़ाने का बहाना बना स्कूल की छुट्टी के बाद दुष्कर्म किया। वह अपने माता-पिता के साथ एक शादी में आई थी। पड़ौस के ही एक परिचित लड़के ने बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया। बच्ची जब बेहोश हो गई, तो सबूत मिटाने के लिए उसे मार भी दिया। अनाथ आश्रम में रहने वाली एक बच्ची के साथ वहां का चौकीदार ही धमकाकर दुष्कर्म करता रहा। सबसे जघन्य घटना नासिक में हुई। वहां सचिन नाम का शराबी नशे में घर लौटा। पत्नी की गैर-मौजूदगी में उसने अपनी ही पांच वर्ष की बेटी से दुष्कर्म किया। जब वह बेहोश हो गई, तब दरिंदे ने अपनी माता यानी बच्ची की दादी को बताया। दादी को लगा कि बच्ची होश में आकर कुछ कहेगी, तो इससे बेटे की बदनामी होगी। उसने बेटे से कहा कि बच्ची को हमेशा के ही लिए सुला दिया जाए। बस दोनों ने बच्ची का गला दबाया और शव को एक स्कूल के पास फेंक दिया। फिर, दादी ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई कि पोती का अपहरण हो गया। शंका होने पर कड़ाई से पूछताछ करने पर दोनों मां-बेटे ने अपना अपराध कबूल कर लिया। दादी द्वारा पोती की हत्या पर भरोसा करना कठिन है।

इन घटनाओं में से अधिकांश अपराधी या तो सीसीटीवी फुटेज के आधार पर या अंतिम बार बच्चियों के साथ जिन्होंने इन्हें देखा था, उनके बयानों के आधार पर पकड़े जा सके। दुष्कर्म के करीब 92 प्रतिशत मामले मित्र, परिचित, रिश्तेदार और परिवार के अन्य पुरुष सदस्यों द्वारा किए जाते हैं। वे नन्हीं बच्चियां, जिनकी आंखों में न जाने कितने सपने होंगे, जीने की कितनी चाहत होगी, उन्हें क्या पता था कि वे अपने लोगों के हाथों इस तरह शिकार बनेंगी। हालात से लगता है, नन्हीं बच्चियों के साथ दुष्कृत्यों की बाढ़ सी आ गई है। अपराधियों को लगता है कि इन लड़कियों की उम्र व कमजोर होने का वे लाभ उठा सकते हैं। आखिरकार, एक वहशी आदमी के सामने इनकी क्या बिसात। इन बच्चियों के प्रति जरा सी लापरवाही जानलेवा बन जाती है। मां का जरा सा ध्यान हटा कि ये किसी हादसे का शिकार बनीं। समाज में जैसे विश्वास का लोप हो गया है, बच्चियों के मामले में अपनों पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। न जाने समाज किस दिशा में जा रहा है। अकसर इन बच्चियों के साथ अपराध करके अपराधी इनकी जान लेने की कोशिश भी करते हैं। जिससे कि उनकी हैवानियत को बताने वाला कोई न रहे। फिर ये लाश को ठिकाने लगाने की भी जुगत भिड़ाते हैं। बच्चियों के प्रति हैवानियत के ये मामले तब ही सामने आ पाते हैं, जब बच्चियां किसी तकलीफ की शिकायत करती हैं या स्कूल जाने में आनाकानी करती हैं या अपने किसी परिचित को सामने देखकर ही डरने लगती हैं। या फिर, एकाएक घर से, स्कूल से, किसी समारोह स्थल से गायब हो जाती हैं। जब इनकी तलाश की जाती है, तब तक तो काफी देर हो गई होती है, क्योंकि तब इनका निष्प्राण शरीर ही हाथ आता है। किसी तालाब, कुएं, किसी रेल की पटरी, किसी गड्ढे, नाले अथवा मैदान में पड़ा हुआ। निर्भया का आंदोलन जब चल रहा था, तो मांग की जा रही थी कि एक तो अपराधी को सरेआम ऐसा दंड दिया जाए, जिससे फिर किसी की भी जधन्य अपराध करने की हिम्मत न हो। दूसरा, सजा देने वाला कानून भी ऐसा कठोर हो कि अपराधी उससे खौफ खाए। लेकिन इन दिनों जिस तरह से छोटी बच्चियां बड़ी संख्या में दुष्कर्म जैसे अपराध झेल रही हैं, उनसे लगता तो नहीं कि किसी के भी मन में दुष्कर्म के खिलाफ बने कठोर कानून अथवा पुलिस या किसी भी कठोर सजा का डर बैठा है, बल्कि कई बार तो ऐसा हुआ है कि एक बार दुष्कर्म करने वाला अपराधी सजा काट कर बाहर आता है और दोबारा उसी तरह के अपराध को अंजाम देता है। इनमें से कई तो किशोर होते हैं, जो अब भी जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धाराओं का लाभ उठाकर तीन वर्ष जेल में रहने के बाद बाहर आ जाते हैं और अनेक बार यह घोषणा करते हुए अपराध करते हैं कि हां, वे ऐसा कर रहे हैं और तीन साल में बाहर आकर फिर से करेंगे। तब सजा देने का अर्थ ही कुछ नहीं रहता।
महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी भी ऐसे ही किशोरों का जिक्र कर चुकी हैं। हालांकि, अब जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन हो चुका है। अब अगर अपराध बड़ों जैसा होगा तो फिर किशोर अपराधी को सजा भी बड़ों जैसी ही मिलेगी। हो सकता है कि इस बदलाव से मासूम बच्चियों के प्रति अपराध में कुछ कमी आए, मगर बदलने की जरूरत तो उस सोच की है, जो किसी भी औरत या बच्ची के प्रति सिर्फ बच्ची या औरत होने के कारण ही अपराध करना जायज मानती है। आखिर यह सोच कैसे बदलेगी? इस दिशा में प्रयास होने चाहिए। यह काम हरेक घर से शुरू होना चाहिए। लड़कों को यह सीख दी जानी चाहिए कि उसकी बहन भी उस जैसी है, वह कमजोर नहीं, उसका भी सम्मान है। वरना, कठोर कानून का डर शायद ही किसी अपराधी को सुधारेगा।

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