बच्चों की सेहत की चिंता सही


महाराष्ट्र के सभी स्कूलों में जंक फूड बेचने पर पाबंदी लगा दी गई है। इसे जल्द ही सभी स्कूलों में लागू कर
दिया जाएगा। सरकार ने यह फैसला विद्यार्थियों की तबियत और बढ़ती बीमारी को ध्यान में रखते हुए लिया है। फास्ट फूड पर पांबदी लगाते हुए सरकार ने तर्क दिया है कि इससे विद्यार्थियों में मोटापा और बीमारियों का प्रमाण दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है, जिसका असर बच्चों की शारीरिक व मानसिक क्षमता पर पड़ रहा है। पिछले माह ही राजस्थान सरकार ने इसी तरह का फैसला लागू किया है। दोनों राज्यों की सरकारों का यह फैसला बच्चों की सेहत के संबंध में उम्दा है। जरूरत है कि इस तरह के फैसले देश की सभी सरकारें अपने राज्यों में लागू करें। बच्चों में तेजी से बढ़ते मोटापे को लेकर ही पिछले वर्ष सीबीएसई ने संबद्ध सभी स्कूलों को अपनी कैंटीन में बेचे जाने
वाले फास्ट फूड बंद करने को कहा था। इसी तरह के आदेश यूजीसी भी जारी कर चुका है। महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार एवं सीबीएसई के साथ यूजीसी की बच्चों की सेहत की चिंता वाकई सही है। युवा वर्ग का बढ़ते वजन की चपेट में आना चिंतनीय है। यही वजह है कि हाल ही में यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे छात्रों के मोटापे को लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने कैंटीन और छात्रवासों की मेस में बिकने वाले जंक फूड पर
रोक लगा दी है। अब सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में कैंटीन और मेस चलाने के लिए फूड एंड स्टैंडर्ड -2006 के तहत लाइसेंस लेना और गाइडलाइंस को मानना अनिवार्य होगा। कई व्याधियों को समेटे मोटापे की समस्या अब वैश्विक समस्या बन चुकी है। खासकर पिछले तीन दशकों में मोटापा एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले 30 सालों में दुनिया में मोटापे के शिकार लोगों की संख्या दोगुनी हो गई है। दुनिया के दस में से एक व्यक्ति भयंकर मोटापे का शिकार है। भारत जैसे विकासशील देशों से लेकर विकसित देशों तक बड़ी आबादी इस स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौती से जूझ रही है। दुनियाभर में सरकारों से अपील की जा रही है कि वो मोटापे की समस्या को दूर करने के लिए संगठित कदम उठाएं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ वर्षो में बढ़ते सकल घरेलू उत्पाद के साथ चीन, भारत, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और मैक्सिको जैसे देशों में मोटापे के शिकार लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। ब्रिटेन की चिकित्सा पत्रिका लांसेट में छपी ओईसीडी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि गरीब देशों के लिए बढ़ते मोटापे के दुष्परिणामों को झेलना बेहद कठिन होगा, वहां स्वास्थ्य सेवाएं पहले से लचरता की शिकार हैं। देश के लिए तो यह स्थिति बेहद चिंतनीय और विरोधाभासी है। एक ओर ऐसे लोग हैं, जो खाना
जुटाने की जुगत में लगे हैं और दूसरी ओर ऐसे लोगों की तादाद में बढ़ोतरी हो रही है, जो मोटापे की समस्या
से जूझ रहे हैं। इतना ही नहीं युवा पीढ़ी में पोषण से युक्त पारंपरिक आहार की जगह आधुनिक युग के खान-पान ने अपनी जगह बना ली है। गौरतलब है कि ऐसे अधिकतर खाद्य पदार्थो में वसा और चर्बी की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो उनके शरीर के लिए बहुत ही नुकसानदायक है। इस बात को बच्चे समझ नहीं पा रहे हैं, ऐसे में जरूरी हो जाता है कि उनके मां-बाप इस संकट से उन्हें बाहर निकालें। बच्चों के शरीर की चिंता करते हुए महराष्ट्र, राजस्थान के साथ सीबीएसई और यूजीसी ने जो पहल की है, वह अभी तक परवान नहीं चढ़ी है। अब भी कई स्कूलों में जंक फूड का चलन जारी है। इसे बंद किया जाना चाहिए। बच्चों में मोटापे की समस्या से निजात पाने की पहले हमारी है। हम अगर बच्चों को जंक फूड खाने को नहीं देंगे, तो वे नहीं खाएंगे। ऐसे में जरूरी है कि हम अपनी आदत सुधारें। बच्चे तो खुद ब खुद सुधर जाएंगे।

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  1. हम अपनी आदत सुधारें। बच्चे तो खुद ब खुद सुधर जाएंगे।

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