जीएसटी: पूरी हो गई है तैयारी


केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा तो यही है कि अगर जरूरत पड़ेगी तो जीएसटी परिषद की एक बैठक और बुलाई जा सकती है। दरअसल, सरकार इस नई कर-प्रणाली की दिशा में संपूर्ण राजनीतिक आम सहमति बनाकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है, इसलिए आगे भी बैठक की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में दो दिनों तक चलती रही जीएसटी परिषद की बैठक का सार यही है कि आम सहमति बन चुकी है और उसके बाद जीएसटी इसी वर्ष एक जुलाई से लागू भी हो जाएगा। इस कर-प्रणाली की कानूनी अड़चनें तो बहुत पहले ही दूर हो चुकी थीं। संविधान संशोधन समेत जीएसटी से जुड़े सभी पांचों कानूनों को संसद की मंजूरी मिल ही चुकी है। मतलब, जो अड़चन थी, वह करों की दरों को लेकर थी। जीएसटी परिषद में शामिल गैर-भाजपा शासित राज्यों के वित्त मंत्री कर की दरों को इसलिए कम रखवाना चाहते थे, ताकि उन्हें जरूरत पड़ने पर यह कहने का मौका मिलता रहे कि उन्होंने अपनी चला ली है, तो केंद्र सरकार के सामने अलग समस्या थी।
वस्तुत: जिन भी देशों में अभी तक जीएसटी लागू हुआ है, उनका तो यही अनुभव है कि जब यह कर-प्रणाली लागू होती है, तो शुरुआत में महंगाई बढ़ती है और यह सिलसिला चार-पांच वर्षो तक लगातार चलता रहता है। हमारे देश में चूंकि चुनाव का पहिया कभी रुकता नहीं है। यहां लगभग हर महीने कहीं न कहीं कोई न कोई चुनाव होता ही रहता है। गुजरात विधानसभा का चुनाव इसी वर्ष है। फिर अगले साल भी तीन-चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है और 2019 में लोकसभा चुनाव तो खैर है ही। इसीलिए केंद्र सरकार जीएसटी को इस तरह लागू करना चाहती है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी सलामत रहे। उसकी पहली कोशिश तो यही है कि जीएसटी लागू होने के बाद महंगाई नहीं बढ़नी चाहिए। जीएसटी की जो दरें निर्धारित की गई हैं, उनमें सरकार की यही कोशिश साफ-साफ दिख रही है। सामने आई दरों से पता चलता है कि जीएसटी के बाद रोजमर्रा की चीजें सस्ती ही होंगी, न कि महंगी। जिन चीजों के दाम बढ़ेंगे, उनका आम जनता से कोई लेना-देना नहीं, जिनका लेना-देना है, वे महंगाई से अप्रभावित रहते हैं!
लेकिन महंगाई अगर बढ़ी, तो सरकार ने इसका दारोमदार अपने सिर आने से बचने का रास्ता यह खोजा कि जीएसटी परिषद में विपक्ष शासित राज्यों के जो वित्त मंत्री हैं, वह उनकी बात मानने में बहुत ज्यादा देर नहीं करती। इससे विपक्ष भी खुश और अगर महंगाई बढ़ेगी तो वह कुछ कह भी नहीं पाएगा। इस तरह, जीएसटी पर सरकार बहुत सूझबूझ के साथ आगे बढ़ रही है। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि इस दिशा में जो होना था, अब लगभग हो चुका है। जो थोड़े-बहुत मतभेद होंगे, उन्हें भी जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। यानी, जीएसटी एक जुलाई से अब लागू हो जाएगा और जो काम राष्ट्रव्यापी आम सहमति बनने के बाद होता है, उसके क्या कहने। असहमति, बहस और निर्णय, यही तो लोकतंत्र है।

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