इल्ज कोलर के लिए अब भारत पहला घर


जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में पली-बढ़ीं सामाजिक कार्यकर्ता इल्ज कोलर रॉलेफसन को बचपन से ही पशुओं से प्यार था। उनके पिता बॉटनी के प्रोफेसर थे और मां कृषि विशेषज्ञ। घर में कुत्ते व घोड़े थे। इल्ज न केवल उनके संग खेलतीं, बल्कि उनका ख्याल भी रखती थीं। पशु-प्रेम की वजह से उन्होंने पशु चिकित्सक बनने का फैसला किया। वर्ष-1970 में वेटनेरी डिग्री हासिल करने के बाद प्रैक्टिस करने लगीं।
पति यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। खुशहाल परिवार था। बतौर पशु चिकित्सक करियर भी अच्छा चल रहा था, लेकिन वह खुश नहीं थीं। इल्ज कहती हैं, पशुओं का इलाज करके पैसा कमाना मेरा मकसद नहीं था। मैं पशुओं के लिए कुछ करना चाहती थी। तभी पशु-शोध के लिए स्कॉलरशिप मिली और वे वर्ष-1991 में पति और बच्चों के संग भारत आ गईं। उन्हें राजस्थान के ऊंट और उनसे जुड़ी दिक्कतों पर शोध करना था। सबसे पहले बीकानेर स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल का दौरा किया। वहां उन्हें ऊंटपालकों के बारे में दिलचस्प बातें पता चलीं। उत्सुकता बढ़ती गई। वह ऊंटपालन करने वाली रायका जनजाति की बस्तियों में गईं। वहां घर के बड़े-बूढ़े ऊंटों से स्थानीय भाषा में बात कर रहे थे। गांववाले मानते हैं कि ऊंट उनकी भाषा समझते हैं। मैंने इंसान और पशुओं में ऐसा आत्मीय रिश्ता कभी नहीं देखा था। इल्ज राजस्थान में बस जाना चाहती थीं। वे बताती हैं, जब मेरा बेटा पांच और बेटी छह वर्ष की थी, तब राजस्थान का मौसम और स्कूल सिस्टम उनके मुताबिक नहीं था। इसलिए उन्हें जर्मनी में छोड़ना पड़ा। मां ने जिम्मेदारी संभाली। अब इल्ज छह माह भारत और छह माह जर्मनी में रहती हैं।
राजस्थान ने उन्हें जीने का नया मकसद दिया। मगर हालात का दूसरा पहलू भी था। ऊंटपालन करने वाली रायका आबादी मुश्किलों से जूझ रही थी। उन्हें लगा कि अगर तुरंत कुछ नहीं किया गया, तो न केवल ऊंटों की आबादी खत्म हो जाएगी, बल्कि प्राचीन रायका सभ्यता का भी अंत हो जाएगा। लिहाजा वह एक नए मिशन के साथ रायका समुदाय को बचाने के अभियान में जुट गईं। अपने बीस वर्ष के इस शानदार अनुभव का उन्होंने अपनी किताब कैमल कर्मा में बखूबी बयान किया है। उनके सौ से ज्यादा शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। इस वर्ष महिला दिवस पर राष्ट्रपति ने उन्हें नारी शक्ति अवॉर्ड से सम्मानित किया।

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