नर्मदा नदी को बचाने का शिव का प्रयास सही



मध्यप्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए शिवराज सरकार ने नर्मदा में रेत उत्खनन पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाने का एलान कर दिया है। अब शिवराज सरकार इस संबंध में कैबिनेट मंत्री राजेंद्र शुक्ल की अध्यक्षता में आईआईटी खड़गपुर के विशेषज्ञों की एक समिति का गठन करने जा रही है, जो उत्खनन से संबंधित सभी पहलुओं का अध्ययन करके रिपोर्ट देगी। इस रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय किया जाएगा कि नर्मदा से कैसे और कितनी मात्रा में रेत का उत्खनन किया जाए। समिति की रिपोर्ट आने तक उत्खनन पर प्रतिबंध लगा रहेगा। साथ ही, प्रदेश की सभी नदियों में उत्खनन के लिए मशीनों के प्रयोग पर भी रोक लगा दी गई है। इस एलान के बाद भी उत्खनन करते हुए पाए जाने वाले वाहन को जुर्माना लगाकर नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि उसे सीधे जब्त करने का नियम भी शिवराज सरकार ने लागू कर दिया है।
सरकार के इस फैसले से स्पष्ट है कि नर्मदा को लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अत्यंत गंभीर हैं। तभी तो ‘नर्मदा सेवा यात्र’ जैसे जागरूकता अभियान के साथ-साथ वे नर्मदा के संरक्षण की दिशा में नीतिगत स्तर पर भी ठोस कदम उठा रहे हैं। दरअसल, नर्मदा नदी को लेकर शिवराज सरकार गत वर्ष दिसंबर से गंभीर नजर आ रही है। तब ‘नर्मदा सेवा यात्र’ की शुरुआत और उसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री का स्वयं भी पूरे तन-मन के साथ जुटे रहना तथा अब नर्मदा में रेत उत्खनन पर पूर्ण प्रतिबंध का यह निर्णय दिखाता है कि सरकार नर्मदा पर छाए संकट के बादलों को दूर करने के लिए ईमानदारी से प्रयास कर रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार के इन प्रयासों का धरातल पर कितना प्रभाव होता है और वे नर्मदा के लिए कितने हितकारी सिद्ध होते हैं। सरकार की पहल अच्छी है, मगर प्रश्न यह उठता है कि नर्मदा नदी के अस्तित्व पर ऐसा संकट कैसे आ गया कि अब संरक्षण के लिए इस स्तर पर प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ रही है। दरअसल, नर्मदा की यह हालत एकाएक नहीं हुई है, बल्कि कई कारण जिम्मेदार हैं।
नदी के तटीय इलाकों में बने होटल-रेस्तरां, कारखानों और कुछ इलाकों में बने अव्यवस्थित सुलभ शौचालयों के अवशिष्टों का नदी में जाना नर्मदा की बिगड़ी हालत के लिए एक बड़ा कारण है। नर्मदा के आसपास स्थित पेड़-पौधों का खत्म होते जाना और रेत उत्खनन आदि भी नर्मदा के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध हुआ है। इन सबके अलावा और भी कई छोटे-बड़े कारण रहे हैं, जिन्होंने आज नर्मदा नदी पर अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर दिया है। हालांकि, शिवराज सरकार द्वारा जिस तरह से नर्मदा में रेत उत्खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है और इससे पहले जिस तरह से नर्मदा को गंगा एवं यमुना जैसी नदियों की तरह ही जीवित नदी का अधिकार देने का एलान किया गया है, उससे नर्मदा के उद्धार की उम्मीद जगती है। निश्चित तौर पर शिवराज सरकार के नर्मदा के संरक्षण की दिशा में किए गए ये प्रयास ‘देर आए दुरुस्त आए’ की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। इसी संदर्भ में उल्लेखनीय होगा कि नर्मदा के उद्धार के लिए तो प्रयास हो रहे हैं, मगर नदियों का संकट सिर्फ नर्मदा तक सीमित नहीं है। इस देश की अधिकांश नदियां आज मानव-उत्पादित अवशिष्टों, अंधाधुंध प्राकृतिक विनाश और अनियंत्रित दोहन के कारण अस्तित्व के संकट से जूझने को मजबूर हो रही हैं।
देश की सबसे बड़ी और विशाल विराट आस्थाओं का केंद्र गंगा नदी आज गंदगी के कारण इस कदर संकट में है कि केंद्र सरकार द्वारा उसको पुन: निर्मल और अविरल बनाने के लिए अलग से एक मंत्रलय बनाकर ‘नमामि गंगे’ जैसा भारी-भरकम बजट वाला अभियान शुरू किया गया है। इस दिशा में कुछ काम भी हुआ है, मगर अभी काफी प्रयास किए जाने शेष हैं। दूसरी सर्वाधिक आस्था का केंद्र नदी यमुना की दशा इसी से समझी जा सकती है कि उसका पानी ज्यादातर क्षेत्रों में एकदम काला हो चुका है। ऐसे ही और भी अनेक नदियां अपना प्रदूषण और अनियंत्रित दोहन के कारण अब न सिर्फ सौंदर्य खो चुकी हैं, बल्कि उनका अमृत समान पानी जहर के समान हो चुका है। इन सब पर भी दृष्टि डालने की जरूरत है। नर्मदा के उद्धार के लिए मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार आज जिस तरह से प्रयास कर रही है, इन नदियों के लिए भी केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर उसी प्रकार का एक राष्ट्रव्यापी प्रयास करने की आवश्यकता है। हर राज्य सरकार को यह दायित्व दिया जाए कि वह अपने क्षेत्र में बहने वाली नदियों की धारा को निर्मल-अविरल बनाने के लिए यत्न करें, जिसमें केंद्र सरकार उन्हें यथासंभव सहायता मुहैया कराए। इस प्रकार केंद्र और राज्य के सम्मिलित प्रयास से ही हम अपनी खत्म होती नदियों का उद्धार कर पाएंगे।
दूसरी बात यह है कि नदियों को निर्मल-अविरल बनाने से कहीं अधिक बड़ी चुनौती उनको वैसा ही बनाए रखना है। इसके लिए सरकार को न केवल कठोर कानून बनाने की आवश्यकता है, बल्कि उस कानून को धरातल पर लागू कराने के लिए एक सटीक व्यवस्था बनाना भी समय की मांग है। साथ ही, लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता लाकर तथा नदियों के गंदे होने के खतरे से रूबरू कराकर भी नदियों में गंदगी करने से रोकने के लिए प्रयास किए जा सकते हैं। इस प्रकार के कदम उठाने के बाद ही हम देश की नदियों को अपनी माता कहने के अधिकारी होंगे। बहरहाल, नर्मदा नदी को बचाने के लिए मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने जिस तरह से प्रयास शुरू किए हैं, वह देश के दूसरे राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बने हैं। नर्मदा यात्र के दौरान उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने अपने प्रदेश की नदियों के संरक्षण के लिए अभियान चलाने की बात कही थी। इसके अलावा सरकार के प्रयासों को विदेशों से भी सराहना मिली है। उम्मीद की जानी चाहिए कि एक दिन सरकार के प्रयास रंग लाएंगे, मगर यह तभी होगा, जब हम भी अपना योगदान देंगे।

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