अरुण जेटली: भारतीय अर्थव्यवस्था और नेतृत्व की कमजोरी उजागर



वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तो स्वीकार नहीं किया, पर जैसी अर्थशास्त्रियों व विरोधी दलों ने शंका जताई थी, नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था के आखिरी तिमाही के नतीजे वैसे ही आए हैं। गौरतलब है कि मार्च में पिछले वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही के आंकड़ों के आधार पर केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने भी विमुद्रीकरण से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों की आशंका को सिरे से खारिज करते हुए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में विकास बने रहने का अनुमान लगाया था। आखिरी तिमाही में भी यह उम्मीद जताई गई थी कि विकास दर 7.1 प्रतिशत रहेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

बेशक, साल 2016-17 के दौरान जीडीपी की विकास 7.1 प्रतिशत तो रही, लेकिन इसी साल की आखिरी तिमाही में यह घटकर महज 6.1 फीसदी पर अटक गई। जनवरी-मार्च की तिमाही में जीडीपी विकास दर के महज 6.1 प्रतिशत पर सिमटने का असर यह रहा कि दुनिया की सबसे तेज विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था का भी ताज भारत से छिन गया, क्योंकि इसी अवधि में चीन की आर्थिक विकास दर 6.9 प्रतिशत रही है। आजकल हर मोर्चे पर भारत को नीचा दिखाने की कोशिश करने वाला चीन आने वाले दिनों में अगर इसी तथ्य को प्रचारित करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था और नेतृत्व पर हमला करने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
आठ नवंबर-2016 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी को लागू करने की अचानक ही घोषणा कर दी, तो पहले तो देश चकित रह गया। यह बात और है कि जैसे-जैसे नगदी की कमी होने लगी, नोटबंदी को लेकर राजनीतिक और आर्थिक हलके से सवाल उठने लगे। निश्चित तौर पर जनता को इससे परेशानी झेलनी पड़ी, लेकिन उसने कालेधन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की दिशा में इस कदम को अहम मानते हुए नोटबंदी की परेशानियों को न सिर्फ झेला, बल्कि सरकार के कदम का साथ भी दिया।
यह बात और है कि हजारों साल से नगदी के आधार पर चलने वाली व्यवस्था के चलते फुटकर कारोबारियों और छोटे उद्योगपतियों को समस्या झेलनी पड़ी। इसका असर यह हुआ कि दिहाड़ी पर काम करने वाले छोटी आय वाले मजदूरों और कामगारों को अपने घरों को लौटना पड़ा, क्योंकि उनके नियोक्ताओं के पास उन्हें देने के लिए नगदी थी ही नहीं। यही वजह है कि बीते साल की 8.7 प्रतिशत के मुकाबले कोयला, क्रूड ऑइल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, खाद, स्टील, सीमेंट और बिजली जैसे प्रमुख आठ सेक्टरों की विकास दर ढाई फीसदी पर सिमट कर रह गई। इसकी वजह यह है कि इन सेक्टरों में निचले स्तर पर दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर ज्यादा हैं और कई छोटे-मोटे सामान स्थानीय जरूरतों के मुताबिक नगद ही खरीदे जाते हैं और उनका इस्तेमाल इस सेक्टर के निर्माण में होता है। इसलिए जहां रोजगार घटा, वहीं उत्पादन भी घटा, लिहाजा इन सेक्टरों की विकास दर तिहाई से भी कम रह गई है। यह स्थिति निश्चित ही चिंताजनक है।
चूंकि कंस्ट्रक्शन (रियल इस्टेट) उद्योग में भी नगदी पर ही ज्यादा काम होता है, लिहाजा यह सेक्टर सबसे ज्यादा गिरावट की मार झेलने को मजबूर हुआ। आंकड़ों के मुताबिक, जिस रियल इस्टेट में बीते साल छह फीसदी की वृद्धि दर थी, वह इस वर्ष घटकर ऋणात्मक 3.7 प्रतिशत रह गई। यानी, इस सेक्टर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। यही नहीं, बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की विकास दर भी 12.7 प्रतिशत की तुलना में 5.3 प्रतिशत रह गई है। यह गिरावट नोटबंदी के कारण आई है।
चूंकि शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में नगदी की कमी के चलते दिहाड़ी मजदूरों को गांवों की ओर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसलिए कृषि क्षेत्र में मजदूरों की आवक बढ़ी है। काम करने वाले हाथ मिले, तो कृषि क्षेत्र में बाकी सेक्टरों की तुलना में कहीं ज्यादा अच्छी विकास दर देखने को मिली। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च को समाप्त हुए वित्त वर्ष में कृषि क्षेत्र को फायदा हुआ है। 2016-17 में कृषि की वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत रही, जो इससे पिछले वित्त वर्ष में 0.7 प्रतिशत रही थी। चौथी तिमाही में कृषि क्षेत्र का जीवीए 5.2 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि 2015-16 की समान तिमाही में यह 1.5 प्रतिशत बढ़ा था।
खेती-किसानी के क्षेत्र में वृद्धि दर के बेहतर रहने की बड़ी वजह बेहतर मानसून भी रहा है। दिलचस्प बात यह रही कि पिछले वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में जहां हर सेक्टर लंबी सांस ले रहा था, वहीं कृषि क्षेत्र की विकास दर चौथी तिमाही में पिछले साल की तुलना में 1.5 से बढ़कर 5.2 फीसदी पर पहुंच गई। इससे एक बात साफ होती है कि कृषि आधारित अपनी अर्थव्यवस्था की ओर लोगों का झुकाव बढ़ाया जाए, तो यह खुद भी विकास कर सकती है और लोगों की जरूरतों को भी पूरा कर सकती है। इसके साथ ही देश के सकल घरेलू उत्पाद में भी अपना सकारात्मक योगदान दे सकती है। हालांकि, केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों में एक उलटबांसी भी है। उसने 2016-17 में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर एक लाख तीन हजार 219 रुपए पर पहुंचने का अनुमान लगाया है। इसी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक प्रति व्यक्ति आय साल 2015-16 में सिर्फ 94,130 रुपए थी। इस तरह प्रति व्यक्ति आय में 9.7 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि जब विकास दर में गिरावट आई है, तो प्रति व्यक्ति आय कैसे बढ़ गई?
इसी आंकड़े के मुताबिक देश का सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) घटकर 6.6 प्रतिशत पर आ गया, जो 2015-16 में 7.9 प्रतिशत रहा था। नोटबंदी से 2016-17 की तीसरी और चौथी तिमाही में जीवीए प्रभावित भी हुआ है। इन तिमाहियों के दौरान यह घटकर क्रमश: 6.7 प्रतिशत और 5.6 प्रतिशत पर आ गया, जो कि इससे पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाहियों में 7.3 और 8.7 प्रतिशत रहा था। जाहिर है कि आर्थिक विकास में कृषि के मोर्चे को छोड़ दें, तो अर्थव्यवस्था को हर मोर्चे पर मुंह की ही खानी पड़ी है।
अब देश को इस घाटे को पूरा करने की दिशा में ही काम करना पड़ेगा। अलबत्ता, यह सवाल उठना लाजिमी है कि जनता के स्तर पर इस गिरावट का सीधा असर क्यों नहीं दिख रहा है? इसका सीधा जवाब यह है कि चूंकि महंगाई काबू में है, सो आर्थिक विकास दर में गिरावट का असर जमीन पर साफ तौर पर नहीं दिखा। लेकिन वस्तु और सेवा कर लागू होने के बाद कुछ क्षेत्रों में महंगाई बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। इसलिए अब अगर-मगर की भाषा बोलने से काम नहीं चलेगा। आर्थिक विकास दर और सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट के बाद अगर महंगाई बढ़ती है तो वह खतरनाक साबित हो सकती है। इसलिए बेहतर यह होगा कि अभी से ही हालात को संतुलित करने के लिए कदम उठाए जाएं।

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