बालश्रम रोकथाम,यूं खत्म नहीं होगा यह कलंक



बालश्रम रोकथाम अधिनियम-2016 को लागू करने के लिए नियमावलि जारी कर दी गई है। कोई भी सभ्य व लोकतांत्रिक समाज अपने बच्चों को मजदूरी करने की इजाजत नहीं दे सकता। बच्चों को तो खेलना-कूदना और पढ़ना चाहिए, ताकि वे बड़े होकर अच्छे नागरिक बन सकें। लेकिन हमने बच्चों को मजदूरी से बचाने के लिए जो कानून बनाया है, वह कारगर होगा, इसमें संदेह है। बालश्रम पर रोक के लिए जो भी कानून देश में रहे हैं, उन्हीं जैसा हश्र इस नए कानून का भी हो सकता है। इस कानून में तीन समस्याएं सबसे ज्यादा गंभीर हैं। एक-किशोर न्याय अधिनियम में किशोर की उम्र को बढ़ाकर 18 वर्ष कर दिया गया है, जबकि इस कानून में यह उम्र 14 वर्ष ही रखी गई है। मतलब, 14 वर्ष से ज्यादा की उम्र के बच्चे मजदूरी कर सकते हैं। वैसे तो यह गलत नहीं है। मगर एक देश में आयुवर्ग का निर्धारण अलग-अलग क्यों होना चाहिए? दो-जिन बच्चों को बालश्रम से बाहर किया जाएगा, उनका भविष्य कैसे उज्ज्वल बनेगा, इस पर कानून मौन है। बच्चों को श्रम से बाहर करना ठीक है, लेकिन सिर्फ इसी वजह से वे पढ़ने-लिखने लगेंगे, यह मानना गलत है, जबकि यह कानून तो कुछ ऐसा ही मानकर चल रहा है कि बच्चों को मजदूरी से अलग कर दो और इसी से उनकी जिंदगी सुधर जाएगी।

सच तो यह है कि यह धारणा ही सही नहीं है। जिन बच्चों को मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, वे गरीब परिवारों के होते हैं। मतलब, मजदूरी करना उनकी मजबूरी है और जब तक वे मजबूर रहेंगे, कानून उन्हें मजदूरी करने से रोक नहीं सकता है। अत: उनकी मजबूरियों को दूर करने का प्रावधान उसमें होना ही चाहिए था, जो नहीं है। तीन-कानून बच्चों को अपने पारिवारिक कार्यो में सहयोग करने की इजाजत देता है। मतलब, किसी बच्चे का परिवार यदि मजदूरी करता है तो वह उसके काम में हाथ बंटा सकता है। यही तो वह प्रावधान है, जो बालश्रम को समाप्त नहीं होने देगा। कानून में परिवार की परिभाषा भी बहुत ही व्यापक है। उसमें परिवार का मतलब केवल माता-पिता तक सीमित नहीं है, वरन् उसमें दादा-दादी, नाना-नानी, मौसा-मौसी, मामा-मामी, ताई -ताऊ, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, भैया-भाभी और बहन-बहनोई को भी शामिल किया गया है। कानून के मुताबिक, बच्चों को घर -परिवार के कामों में हाथ बंटाने की इजाजत इसलिए दी जा रही है, ताकि वे अपने पारिवारिक कामों को सीख सकें। यह तर्क सही है। जो परिवार कुटीर उद्योग चलाते हैं या दुकानदारी आदि करते हैं, अगर उनके बच्चों को पारिवारिक काम करने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो काम पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी के पास कैसे पहुंचेगा, पर सवाल फिर वही कि क्या कुटीर उद्योग चलाने वाले अपने बच्चों की अपने काम में मदद लेते भी हैं? नहीं, क्योंकि इनकी कोशिश उन्हें पढ़ाने-लिखाने की होती है और अगर कोई व्यक्ति दुकान के नाम पर खोमचा न चला रहा हो तो वह भी अपने काम में बच्चों की मदद नहीं लेता। उसका जोर भी पढ़ाई पर ही होता है।
फिर, यदि हम मान लें कि इन सभी को काम में अपने बच्चों की मदद की जरूरत पड़ती होगी तो सवाल यह है कि परिवार की परिभाषा को कानून में बहुत व्यापक क्यों बना दिया गया है। आज के युग में परिवार का मतलब सिर्फ माता-पिता होता है। ज्यादा से ज्यादा दादा-दादी। हम अपने नजरिए को यदि और व्यापक कर लें तो भी बुआ-फूफा या मामा-मामी परिजन नहीं, रिश्तेदार ही होते हैं, जबकि कानून इन सभी को परिवार मानकर चल रहा है। साफ है कि इसका दुरुपयोग होगा। बाल मजबूर को अपने परिवार का अंग बताकर बाल मजदूरी कराने वाले बच निकलेंगे। हालांकि, जांच अगर होगी तो सच भी सामने आ जाएगा, मगर जांच-पड़ताल की फुर्सत है किसके पास? हमारे पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है, जो हर बाल मजदूर की गहराई से जांच कर सके। फिर, भ्रष्टाचार तो है ही, जिससे अंतत: मजदूरी कराने वाले का रास्ता ही आसान होगा। यूं इस कानून में यह प्रावधान है कि बच्चा स्कूल के समय व शाम सात बजे से सुबह आठ बजे तक अपने परिवार के काम में भी मदद नहीं करेगा। उससे ऐसा काम नहीं कराया जा सकेगा, जो कि उसे पढ़ाई से वंचित करे। थका देने वाला काम भी बच्चों से नहीं कराया जा सकेगा। बच्चा तीन घंटे से ज्यादा लगातार काम नहीं करेगा। यह सब प्रावधान बढ़िया हैं, मगर हमारे पास निगरानी की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है, सो इन प्रावधानों पर अमल होना भी मुश्किल है। लग तो यही रहा है कि ये सभी प्रावधान कागजों पर बने रहेंगे और मजबूर बच्चे मजदूरी करते रहेंगे, यथावत।
नए कानून की नियमावलि में यह भी जोड़ा गया है कि अगर कोई बच्चा लगातार 30 दिन तक स्कूल से गायब रहता है तो यह स्कूल की जिम्मेदारी होगी कि वह बाल विकास विभाग को सूचना देगा। लेकिन सवाल यहां भी है। स्कूल जाने वाले बच्चे मजदूरी नहीं करते। हालांकि, इस नियम के कुछ अपवाद हो सकते हैं, पर नियम यही है कि स्कूली बच्चे मजदूरी नहीं करते। सारांश के तौर पर कहा जा सकता है कि बालश्रम रोकने की कोशिश तो बढ़िया है, लेकिन इन प्रयासों से यह रुकेगा, इसमें तो संदेह ही है।

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