चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर यह मांग की, अधिकार दे संसद



चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर यह मांग की है कि उसे भी अपनी अवमानना पर रोक का वैसा ही अधिकार मिलना चाहिए, जैसा न्यायपालिका के पास है और उसकी यह मांग सही भी है। वैसे भी चुनाव के दौरान होने वाले तमाम विवादों को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग को ताकतवर बनाने की मांग लंबे अरसे से उठती रही है। चुनाव सुधारों के लिए जितनी भी समितियां बनीं, उन सभी की सिफारिशों में यह बात आई कि हमारा चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, मगर उसके पास अधिकार नहीं हैं। अत: उसे कुछ न्यायिक अधिकार दिए ही जाने चाहिए। कम से कम उसके पास इतना अधिकार तो हो ही कि यदि कोई चुनावी उम्मीदवार अपने हलफनामे में गलत जानकारी देता है, चुनाव में दंद-फंद करने-कराने के आरोपों की जद में आता है तो आयोग उसे फौरन अयोग्य घोषित कर सके। पर यह अधिकार उसे दिया नहीं गया है। चुनाव आयोग में केवल शिकायत की जा सकती है और वह जांच कराने के बाद कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया में मतदान हो चुका होता है और फिर नतीजे हासिल करने के लिए आरोपी उम्मीदवार अदालत में चला जाता है। फिर, प्राय: निचली अदालतों के फैसले पर ही परिणाम आ जाता है और आरोपी उम्मीदवार एक बार जीता, सो जीत गया।

मतलब, चुनाव आयोग के पास आई शिकायत और उस पर उसके द्वारा कराई गई जांच चुनाव परिणाम आने के बाद बहुत अहमियत नहीं रखती है। इधर, 12 दिसंबर-1990 से 11 दिसंबर-1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन ने अपने कार्यकाल में चुनाव आयुक्त के अधिकारों का इस तरह प्रयोग किया था कि उनके कारण सभी राजनीतिक दलों को पसीना आने लगा था। यूं उनके पर कतरे गए थे। एक सदस्यीय निर्वाचन आयोग को तीन सदस्यीय बनाकर और बहुमत से फैसला लेने का प्रावधान करके। लेकिन उन्होंने चुनाव आयोग की गरिमा बहाल की। उनके बाद होने यह लगा कि राजनीतिक दल आयोग पर आरोप तक लगाने लगे। पार्टियां पहले तो बिना सिर-पैर की शिकायतें करती हैं और जब आयोग पाता है कि उनकी शिकायत में कोई दम नहीं है तथा वह जांच से इंकार कर देता है, तो उस पर सरकार की कठपुतली होने जैसा आरोप जड़ दिया जाता है। अब तो चुनाव में हारने वाले प्राय: हर दल को लगता है कि आयोग सरकार की कठपुतली है।
प्रसंगवश, हाल ही में उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद न केवल ईवीएम पर सवाल उठाए गए थे, बल्कि चुनाव आयोग पर भी तरह-तरह के आरोप लगाए गए थे। जाहिर है कि यह आयोग का अपमान था और जिन दलों ने यह किया था, वे इसकी जुर्रत ही इसलिए कर पाए थे कि आयोग के पास अपनी अवमानना पर रोक लगाने का कोई अधिकार नहीं है। इस स्थिति में उसे अपनी साख की रक्षा के लिए कदम उठाने का अधिकार मिलना ही चाहिए। पर यह काम होगा, इसमें संदेह है। इसके लिए अवमानना अधिनियम-1971 में संशोधन जरूरी है, जो राजनीतिक दल होने नहीं देंगे!

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