क्या मानसून इस बार कमजोर रहने वाला है? यह चेतावनी है, न कि रिपोर्ट



तो क्या मानसून इस बार कमजोर रहने वाला है? यूं भारतीय मौसम विभाग द्वारा जो रिपोर्ट जारी की गई है, वह मानसून के पिछले 50 वर्षो के अध्ययन पर आधारित है और उसका सारांश यह है कि इस अवधि में हमारे देश में मानसून की बारिश में धीरे-धीरे कमी आती चली जा रही है। रिपोर्ट बता रही है कि जो बादल पानी बरसाते हैं, वे आसमान में छह से साढ़े छह हजार मीटर की ऊंचाई पर होते हैं। 50 वर्ष पहले यह बादल घने होते थे और मोटे भी, पर अब साल-दर-साल इनकी मोटाई कम होती चली जा रही है और कमी इनकी सघनता में भी आ रही है। यह अध्ययन गलत नहीं है। महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘मेघूदत’ वैसे तो प्रेम-काव्य है। इसके दो खंड हैं-पूर्वमेघ और उत्तरमेघ, जो संस्कृत में लिखे गए हैं और जिनमें सांसारिक प्रेम का अद्भुत वर्णन है, मगर इनमें अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए कालिदास ने जिन प्रतीकों का सहारा लिया है, वे मेघ यानी बादल और बारिश से जुड़े हुए हैं। जिनका लब्बोलुआब यह है कि धरती पर जितने घने जंगल होते हैं, आसमान में उतने ही घने और काले बादल।

कालिदास वैज्ञानिक नहीं, संत थे, पर उनकी बात का खंडन आज के बड़े से बड़े वैज्ञानिक भी नहीं कर सकते। तथ्य यही है कि अगर धरती हरी-भरी हो तो बारिश के मौसम में पानी बरसेगा ही। पर धरती की हमने जो दुर्गति की है, वह किसी से छिपी नहीं है। देश में वनों का क्षेत्रफल लगातार सिकुड़ता जा रहा है। अभी 15-20 वर्ष पहले कर्नाटक का 46, तमिलनाडु का 42, आंधप्रदेश का 63, ओडिशा का 72 और पश्चिम बंगाल का 48 फीसदी भूभाग वनों से ढंका हुआ था, जिसमें अब 40 फीसदी की कमी आ गई है। शहरीकरण ही वनों को नहीं निगल रहा है, बल्कि बढ़ती हुई आबादी के लिए कृषि-भूमि का जो विस्तार किया जा रहा है, उससे भी वन चौपट हो रहे हैं। इन्हें सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है, उत्खनन की वैध -अवैध परियोजनाओं ने। इनके कारण हजारों वर्ग किलोमीटर के वन क्षेत्र खदानों में बदल गए हैं। वस्तुत: उत्खनन के बाद खदानों को समतल करने, फिर वृक्ष के बदले वृक्ष लगाने की कोई नीति हमारे देश में अभी तक नहीं बनी। कारण यही है कि हरियाली भी नष्ट होती जा रही है। तब बादल पतले नहीं होंगे, तो और होगा भी क्या? तब बारिश भी साल-दर-साल कम ही होती जाएगी।
रही बात इस वर्ष मानसून की बारिश सामान्य या कम होने की, तो हमारा मौसम विभाग अपनी उस भविष्यवाणी पर कायम है, जो वह मार्च के बाद से लगातार कर रहा है कि इस साल बारिश अच्छी होगी। केरल, पुडुचेरी, गोवा में मानसून दस्तक दे ही चुका है। मुंबई में भी उसने अपनी आमद दर्ज करा दी है। यह सही है कि पश्चिमी और मध्य भारत में मानसून अब तक आ जाना चाहिए था, जो आया नहीं है। लेकिन अभी बहुत समय है और अब जब बारिश होती है, तब एक साथ होती है। इसीलिए हमें मानकर चलना चाहिए कि मौसम विभाग की भविष्यवाणी के अनुसार ही बारिश होगी। पर वनों को बचाने के लिए कुछ किए बिना भविष्य जरूर धुंधलता जाएगा।

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