बेहतर राष्ट्रपति कार्यकाल में सिद्ध हुए, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी



राष्ट्रपति चुनाव को लेकर बहुत सारी बातें हो रही हैं, जातीय कार्ड से लेकर कौन हारेगा एवं कौन जीतेगा तक कीं। राष्ट्रपति पद के दोनों प्रत्याशी प्रचार भी कर रहे हैं। वे सांसदों से मिल रहे हैं और राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों का सामना कर रहे हैं। यह सब चुनाव तक चलता रहेगा व इसी पर चर्चा भी होती रहेगी। इसके बीच कुछ चर्चा वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की भी हो, ताकि पता चले कि उनका कार्यकाल कैसा रहा है। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने में कितना योगदान दिया, कितना नहीं।
बहरहाल, जुलाई में ही राष्ट्रपति भवन से विदा लेने वाले प्रणब मुखर्जी को संविधान विशेषज्ञ और उसमें आस्था रखने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है एवं विगत पांच वर्षो में देश के राष्ट्रपति होने के नाते उन्होंने उसका संरक्षण भी किया है। भारत के संविधान और कांग्रेस के संविधान से उनका परिचय अद्भुत है। प्रणबदा वैसे व्यक्ति हैं, जिनसे संविधान के किसी भी प्रावधान या अस्पष्ट क्षेत्रों के बारे में स्पष्ट जानकारी के लिए संपर्क किया जा सकता है। उनकी विद्वता और उनके ज्ञान का कोई सानी नहीं है।
भारत जब से गणतंत्र बना, तब से हमारे विभिन्न राष्ट्रपतियों ने खुद को विभिन्न तरीकों से वर्णित किया है। चार प्रधानमंत्रियों के साथ कामकाज करने वाले आर. वेंकटरमण ने अपने आप को ‘कॉपीबुक’ राष्ट्रपति बताया, जबकि देश के पहले दलित राष्ट्रपति केआर नारायण ने खुद को ‘कार्यशील राष्ट्रपति’ कहा। इधर, मिसाइलमैन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ कहा गया, तो कभी-कभी उन्हें बच्चों का राष्ट्रपति भी, जो न केवल बच्चों एवं युवाओं से प्यार करते थे, बल्कि उन्होंने उनके लिए राष्ट्रपति भवन के द्वार खोल दिए थे।
उधर, देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने खुद को सामान्य समय में दोस्त व दार्शनिक तथा संकट के समय में मार्गदर्शक और संरक्षक बताया था, जबकि फखरुद्दीन अली अहमद को ‘रबर स्टांप’ राष्ट्रपति कहा गया, जिन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल संबंधी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिया और उनसे यह सवाल भी नहीं पूछा कि उन्होंने कैबिनेट के फैसले के बगैर यह निर्णय क्यों लिया। दूसरी ओर ज्ञानी जैल सिंह ‘सक्रिय राष्ट्रपति’ माने जाते रहे, जिन्होंने राजीव गांधी की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने का मन बना लिया था, जिनके साथ उनके मतभेद थे। लेकिन अगर कोई प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल का विश्लेषण करे, तो उन्हें तकनीकी रूप से सही और सजग सांविधानिक राष्ट्रपति कहेगा। तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद उन्होंने अपने पहले बयान में स्पष्ट किया था कि ‘अब मुझे राष्ट्रपति के रूप में संविधान की सुरक्षा व उसका संरक्षण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसे मैं निभाऊंगा।’
हालांकि, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच सबसे ज्यादा दिलचस्प रिश्ते देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के बीच थे। अलग-अलग दृष्टिकोणों के चलते दोनों के बीच कई मुद्दों पर गहरे मतभेद रहते थे। मसलन-राजेंद्र बाबू रूढ़िवादी और भारतीय परंपराओं में विश्वास रखते थे, तो नेहरू ज्यादा आधुनिक, उदारवादी व पश्चिम के विचारों से प्रभावित थे। पर दोनों ने परिष्कृत ढंग से मतभेदों को अलग रखा और मर्यादा रखते हुए एक-दूसरे के पदों का पूरा सम्मान किया, क्योंकि दोनों में एक चीज समान थी कि दोनों लोकतंत्र में आस्था रखते थे।
जो भी हो, पर राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल कम उल्लेखनीय, गैर-विवादास्पद और गैर-टकराववादी रहा है। फिर भी आपको सरकार के कई अंदरूनी सूत्र बताएंगे कि उन्होंने कई अवसरों पर प्रधानमंत्री या उनके मंत्रियों से सवाल पूछे हैं, चेताया है या सरकार के नजरिए से अलग अपने विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन उसे उन्होंने कभी सार्वजनिक नहीं किया। कहा तो यह भी जाता है कि आने वाले समय में प्रणब मुखर्जी पर्दे के पीछे के इन घटनाक्रमों पर खुद प्रकाश डालेंगे कि उनके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच क्या चल रहा था। इस विषय में वे कोई किताब तक लिख सकते हैं।
फिर भी संसद को दरकिनार कर बार-बार अध्यादेश जारी करने के प्रति उनका कड़ा रवैया कोई रहस्य नहीं है। कई मौकों पर उन्होंने संसद की अनदेखी करने के लिए अध्यादेश का सहारा लिए जाने को लेकर सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की। वे मानते हैं कि अध्यादेश का सहारा विशेष परिस्थितियों में ही लिया जाना चाहिए। शत्रु संपत्ति प्रवर्तन और मान्यीकरण अध्यादेश-2016 उनके समक्ष पांच बार लाया गया। उसके महत्व को देखकर उन्होंने हर बार उसे पारित किया, मगर अंत में सरकार को यह भी लिखा कि भले ही इसे मंजूरी दी जा रही है, लेकिन उम्मीद है कि ऐसा फिर नहीं होगा और इसे उदाहरण नहीं माना जाना चाहिए। यही नहीं, पिछले डेढ़ वर्षो में प्रणबदा ने देश में बढ़ती कथित असहिष्णुता के खिलाफ भी कई बार खुलकर बोला है, जिसमें गोरक्षा के नाम पर हो रही राजनीति का स्पष्ट संदर्भ था।
भारत के बहुलतावादी सिद्धांतों का मजबूत समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि ‘असहिष्णु लोगों के लिए भारत में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।’ उन्होंने रोहित वेमुला की आत्महत्या, जेएनयू, रामजस कॉलेज और हैदराबाद में हुई अप्रिय घटनाओं के मद्देनजर यह भी कहा ही था कि विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता से काम करने की अनुमति मिलनी चाहिए और उन्हें बहस का केंद्र बनाया जाना चाहिए, न कि हिंसा का। कई मौकों पर उन्होंने संसद में गतिरोध पर चिंता भी व्यक्त की। अपने कार्यकाल में कई बार इस तरह के बयान देकर उन्होंने संसदीय संस्थाओं और बहुलतावादी मूल्यों की रक्षा की, जो भारतीय लोकतंत्र की पहचान हैं और ऐसा करके उन्होंने सत्तारूढ़ व्यवस्था को एक संदेश दिया, लेकिन वे उससे टकराए कभी नहीं।
कई लोग उम्मीद कर रहे थे कि वे अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने के लिए अनुच्छेद-356 का इस्तेमाल करने को लेकर केंद्र से सवाल पूछेंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जबकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा था कि ‘राष्ट्रपति भी गलती कर सकते हैं।’ लेकिन प्रणब मुखर्जी पूरी तरह से कैबिनेट की सलाह पर ही चले। इसीलिए उन्हें वैसा राष्ट्रपति कहा जा सकता है, जो हमेशा संविधान के हिसाब से ही चला। जरूरी मौकों पर उन्होंने सत्तारूढ़ दल को उचित सलाह दी, उसे उसके कर्तव्य भी याद दिलाए, मगर उन्हीं अधिकारों के तहत, जो कि भारतीय संविधान ने राष्ट्रपति को दिए हैं। प्रणब मुखर्जी अपने इन अधिकारों का अतिक्रमण करते कभी नहीं दिखे। न ही किसी मसले पर उन्होंने अति-सक्रियता दिखाई। आगे चलकर वे अपने कार्यकाल को किस तरह से परिभाषित करते हैं, यह जरूर उन्हीं पर निर्भर करेगा।

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