देश के समाज को अपने हिसाब से रचती तकनीक



भारत जैसे देश के छोटे-बड़े शहरों में लोगों को जो बहुराष्ट्रीय-राष्ट्रीय कंपनियां किराए पर गाड़ियां मुहैया करा रही हैं, उनमें उबर और ओला की कंपनियां मशहूर हैं। मध्यम वर्ग के नागरिकों को अपने ब्रांड की गाड़ियां किराए पर लेने के लिए ये कंपनियां तरह-तरह से आकर्षित कर रही हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां लोगों में आकर्षण पैदा करने के लिए पूरे संसार में एक ही तरीका अपनाती हैं कि वे उनको मुफ्तखोरी के लिए प्रेरित करती हैं। उबर और ओला भी किसी सवारी को पहली बार मुफ्त में यात्रा कराती हैं। इसके अलावा कई तरह की छूटें, सुविधाएं देने का सिलसिला भी जारी रखती हैं ये। इस तरह कंपनियों का लोगों के साथ सीधा रिश्ता बन जाता है। इसी तरह से विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक संबंधों का अब एक सामाजिक ढांचा विकसित हो रहा है, जिससे हमारा पुराना ढांचा कमजोर पड़ रहा है। सो, भारत जैसे देशों में इस तरह के जो नए संबंध बन रहे हैं, उनका विश्लेषण किया जाना चाहिए। जो कंपनियां लोगों को किराए पर गड़ियां मुहैया करा रही हैं, उनमें ड्राइवर, कंपनी एवं सवारी के अलावा एक नया पात्र और जुड़ा है, जो कि तकनीक की शक्ल में है, जिसे हम ‘जीपीएस’ के नाम से जानते हैं। किसी यात्री को इन कंपनियों के पते व फोन नंबर नहीं पता होते, उनके पास इनसे संपर्क का जो जरिया है, वह तकनीक ही है, जिसे हम ‘मोबाइल ऐप्स’ के नाम से जानते हैं।

ऐप्स के जरिए हम-आप बताते हैं कि आपको किस जगह से किस जगह तक जाना है। वह ऐप्स कंपनी की गाड़ी में बैठे ड्राइवर को आदेश देता है कि वह बुलाई गई जगह पर पहुंच जाए। ड्राइवर किसी मनुष्य से बताई गई जगह का रास्ता नहीं पूछता। वह अपनी गाड़ी में लगे जीपीएस, मतलब दुनिया भर के नक्शे बताने वाली तकनीक पर भरोसा करता है। अत: वह कई बार तय जगह पहुंच जाता है, तो कई बार नहीं पहुंच पाता। मसलन-मेरे घर तक कभी भी ड्राइवर सीधे नहीं पहुंच पाते हैं। उन्हें आखिरकार मोबाइल पर पता बताना ही पड़ता है। लेकिन दिक्कत यह हो गई है कि ऐप्स ने ड्राइवर से किसी से रास्ता पूछने का भरोसा जिस तरह छीन लिया है, उसी तरह से उनकी सुनने की क्षमता को भी लगभग खत्म कर दिया है। किसी से पता पूछ लेने का भरोसा एक सामाजिक पूंजी होती है, उसी तरह से सुनने की क्षमता एक व्यक्तिगत पूंजी होती है, मगर ड्राइवर पता सुनने को भी तैयार नहीं दिखते हैं। वे आधी-अधूरी बात सुनकर फोन काट देते हैं। यह उनकी कमजोर पड़ती संवेदनशीलता के साथ, उनके यांत्रिक होने का प्रमाण है।
किसी समाज में जब पूंजी आधारित नए संबंधों की जगह का विस्तार करना पड़ता है, तो उस समाज की संवेदनशीलता को भी धीरे से नष्ट करना पड़ता है। हमें लगता है कि जो तकनीक है, वह आधुनिकीकरण की परिचायक है, पर यह गलतफहमी है। तकनीक आधुनिकीकरण करने में सहायक हो सकती है, मगर उस पर पूरी तरह से निर्भरता अपनी पूंजी को खोना ही है। ड्राइवर के पास क्या है? उसके पास गाड़ी सरीखी तकनीक को हांकने का प्रशिक्षण है, लेकिन उसके अलावा उसके पास एक सामाजिक पूंजी यह है कि वह गली मुहल्ले को पहचानता है। उसका सवारियों के साथ एक भरोसे का रिश्ता है। जीपीएस की तकनीक उसकी इस सामाजिक पूंजी को समाप्त कर रही है। लिहाजा, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नए चरित्र को पूरी तरह से समझने का प्रयास जरूरी है, ताकि समाज में बन रहे नए तरह के संबंधों पर आधारित भविष्य के समाज की रूपरेखा को समझा जा सके। मैनेजमेंट किसे कहते है? मैनेजमेंट का नया अर्थ है, सामाजिक पूंजी को अपनी निजी पूंजी में बदल लेना। कंपनियों ने समाज के एक बड़े हिस्से से पांच- सात लाख रुपए अपनी गाड़ी खरीदने में लगवाए व उसे यह लालच दिया कि वह पांच सात- लाख की लागत लगाकर महीने में 50-60 हजार की कमाई कर सकता है। तब अनेक ड्राइवरों ने जमापूंजी लगाकर और मालिक बनने की चाह के साथ ब्याज पर कर्ज लेकर गाड़ियां खरीद लीं। इस तरह समाज के एक हिस्से की पूंजी से खरीदी गई गाड़ियों को कंपनियों ने अपने ब्रांड का हिस्सा बना लिया। यह भी कैसे संभव है कि एक ओर तो कोई कंपनी गाड़ियां खरीदने वालों को उम्मीद से ज्यादा लाभ पहुंचा दे और दूसरी तरफ यात्रियों को कभी मुफ्त, कभी छूट के साथ, तो कभी सस्ती लगने वाली यात्र मुहैया करा दे। पर मुफ्तखोरी की आदत डालना एवं ज्यादा कमाई के लालच की संस्कृति कंपनियों के लिए विनियोग ही है।
इस संस्कृति से जिस समाज का निर्माण होता है, वह कमजोर होता है। सवारी की संवेदना से ड्राइवर निकल जाए एवं ड्राइवर के लिए यदि सवारी सिर्फ सामान हो जाए तो बनने वाले नए समाज की कल्पना ही की जा सकती है। कंपनियां तकनीक लेकर आती हैं व एक तकनीक आधारित कंपनी का दूसरी तकनीक आधारित कंपनी के साथ जैसा रिश्ता होता है, वे वैसा ही रिश्ता समाज के साथ बना लेती हैं। इस तरह इस नए रिश्ते का ढांचा पुराने रिश्तों को खत्म करता चला जाता है। हम जिस संक्रमण को महसूस कर रहा है, उसका बड़ा कारण यही है कि विभिन्न स्तरों पर समाज की पूंजी, निजी पूंजी यानी कंपनियों की पूंजी में तब्दील हो रही है।

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