नैतिक शिक्षा आज की सबसे बड़ी जरूरत, नैतिक शिक्षा का बड़ा स्रोत गीता



हमारे देश के प्राय: सभी विद्यालयों में बच्चों को नैतिक शिक्षा देने की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता है और अगर दिया भी जाता है तो वह कामचलाऊ होता है। ऐसे में यह खबर सुखद है कि अब विद्यालयों में गीता भी पढ़ाई जाएगी। यहां गीता के महत्व को बताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसके महत्व से हमारा देश ही नहीं, पूरी दुनिया के कई देश अच्छी तरह से परिचित हैं। गौरतलब है कि भारत के स्कूलों में भगवद्गीता की पढ़ाई को अनिवार्य करने वाला विधेयक जल्दी ही आ रहा है। इस विधेयक में नियम की अवमानना करने वाले संस्थान की मान्यता रद्द करने का प्रावधान भी होगा। इसमें कहा गया है कि गीता के सुविचार एवं शिक्षाएं युवा पीढ़ी को बेहतर नागरिक बनाएंगी तथा इससे उनके व्यक्तित्व में निखार आएगा। बच्चे राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं। जब सूचना क्रांति आई है, तो उसके दुष्परिणाम भी हैं। अत: हमें अपने बच्चों को टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट व अन्य माध्यमों से परोसी जा रही अनुचित सामग्रियों से बचाना है। युवा पीढ़ी में भटकाव व उसमें नैतिक मूल्यों में आई गिरावट को दूर करने के लिए गीता के माध्यम से बच्चों को संस्कार देने होंगे। गीता बच्चों में संस्कार भरती है। जो संस्कार उनमें बचपन से आएंगे, वे युवावस्था में पुष्ट हो जाएंगे। गीता युवाओं को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। उसका हर श्लोक जीवन को दिशा देता है। वह मद, मोह, लोभ, क्रोध, अहंकार, लालच, ईष्र्या आदि बुराइयों को त्यागने के लिए प्रोत्साहित करती है। गीता से जीवन निर्माण की राह आसान हो जाती है। वह अनुशासन का संस्कार देती है, जो किसी भी राष्ट्र या समाज के निर्माण के लिए जरूरी है। कहा भी गया है कि गीता जीवन की सभी समस्याओं का हल है। जीवन में ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका उसमें निवारण नहीं है। गीता से कर्म करने का संदेश मिलता है। वह हमें जीवन जीने की कला भी सिखाती है। आज बच्चों में बढ़ रही उग्रता व उससे उत्पन्न होती कठिनाइयों से लड़ने के लिए गीता के ज्ञान के अनुसार कर्म जरूरी हो गया है। उसमें लिखा है कि क्रोध से भ्रम पैदा होता है और भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है। जब बुद्धि व्यग्र होती है, तब सारे तर्क नष्ट हो जाते हैं और तर्क नष्ट होने पर मनुष्य का पतन निश्चित है। गीताज्ञान से मनुष्य की सोच में परिवर्तन आता है। इससे वह इच्छित फल की प्राप्ति कर सकता है। वह मन पर नियंत्रण करना सिखाती है। जो मनुष्य मन पर नियंत्रण नहीं कर पाते, उनका मन उनके लिए शत्रु का कार्य करता है। गीता व्यक्ति को आत्म-मंथन करना सिखाती है। यह उसकी सोच में बदलाव लाने की ताकत रखती है, जिससे सकारात्मकता आती है।
गीता में कहा गया है कि मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे उसके अनुरूप ही फल की प्राप्ति होती है। इसीलिए तो गीता सत्कर्मो को महत्व देना सिखाती है। हमारा मन चंचल होता है। वह इधर-उधर भटकता रहता है। ऐसे ही अशांत मन को गीता सार शांत करना सिखा देता है। प्रकृति के विपरीत कार्य करने से मनुष्य तनाव में रहता है। यही तनाव विनाश का कारण बनता है। गीता सिखाती है कि धर्म और कर्म का मार्ग ही आपको हर तरह के तनाव से मुक्त रखता है। विश्वास के साथ मनुष्य इच्छित कार्य पर निरंतर चिंतन करे, तो उसे कार्य में सफलता मिलती है। यहां बताना जरूरी है कि अमेरिका के न्यूजर्सी स्थित सेटॉन हॉल यूनिवर्सिटी ने अपने यहां आने वाले हर स्टूडेंट के लिए भवगद्गीता पढ़ना जरूरी कर दिया है। इस यूनिवर्सिटी का मानना है कि विद्यार्थियों को सामाजिक सरोकारों से रूबरू कराने के लिए इससे बेहतर कोई और माध्यम नहीं हो सकता। 1856 में स्थापित हुई यह कैथलिक यूनिवर्सिटी पूरी तरह स्वतंत्र है। इसमें पढ़ने वाले एक तिहाई छात्र नॉन ईसाई हैं। कुछ वर्ष पहले नीदरलैंड की संसद में भी एक ऐसा ही प्रस्ताव पारित हुआ था, जिसके मुताबिक कक्षा पांच से वहां के स्कूलों में गीता पढ़ाई जाएगी। वहां प्राथमिक स्तर के विद्यार्थियों को गीता व उपनिषदों के छंद-श्लोक पढ़ाने का निर्णय लिया गया है।
मुंबई महानगर पालिका, जो कि देश की सबसे अमीर महानगर पालिका है, उसने अपने स्कूलों में भगवद्गीता पढ़ाना प्रारंभ कर दिया है। इसके डिप्टी म्युनिसिपल कमिश्नर रामदास भाऊ साहेब कहते हैं कि इसके द्वारा हम बच्चों में अधिक तेजी से निर्णय लेने की क्षमता और दक्षता विकसित करना चाहते हैं। बीएमसी के 12 सौ स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग साढ़े चार लाख बच्चों को अब गीता पढ़ाई जा रही है। इसी तरह राजस्थान यूनिवर्सिटी के कॉमर्स और मैनेजमेंट कॉलेजों के पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्सेस में भगवद्गीता तथा रामायण की मैनेजमेंट की तकनीकों को शामिल किया गया है। यहां के वाइस चांसलर नवीन माथुर के अनुसार, कृष्ण ने श्रम के बंटवारे, प्रेरणा, अधिकार, जिम्मेदारी और नेतृत्व के गुणों की बहुत ही बेहतर व्याख्या की है। अगर इससे विद्यार्थियों को परिचित कराया जाए तो निश्चित ही उनमें गुणात्मक सुधार आएगा। ऐसे में केंद्र सरकार प्राथमिक स्कूलों में गीता पढ़ाने के लिए वास्तव में कोई कानून बनाती है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। बच्चों को नैतिक शिक्षा देना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

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