शिक्षा की उम्र में अपराध चिंतनीय, यह देश और समाज के लिए चुनौती का समय




अंग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक विलियम हैजलिट लिखते हैं कि संसार में बच्चे का प्रथम प्रवेश विद्यालय में होता है। इसके पूर्व बच्चा घर में रहता है। कहीं जाता भी है तो माता-पिता के साथ। अत: बच्चे में अच्छे संस्कार व आदर्श स्थापित करने का उत्तरदायित्व सबसे पहले उसके माता-पिता का ही होता है। वह अनुशासन का पाठ सबसे पहले घर में सीखता है। अगर माता-पिता अनुशासन में रहने के आदी हैं तो बच्चा भी वैसा ही बनेगा। लेकिन दुखद बात यह है कि देश में बाल अपराधियों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। अब ऐसा माना जाता है कि निम्न आर्थिक वर्ग से संबंधित बच्चे जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं, वे अपराधों में जल्दी फंस जाते हैं, क्योंकि उनके माता-पिता दोनों मजदूरी या दूसरे छोटे-मोटे काम करते हैं। आंकड़ों की मानें तो पढ़े-लिखे व अच्छे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी अब हत्या व सामूहिक दुष्कर्म जैसे अपराध कर बैठते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक किशोरों द्वारा किए जा रहे अपराधों में इजाफा हो रहा है।
किशोरों के खिलाफ वर्ष-2003 में 33 हजार 320 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2014 में बढ़कर 42 हजार 566 हो गए। इनमें से 18 साल की आयु के 31 हजार 364, 12 से 16 साल की आयु के 10 हजार 534 व 12 साल से कम आयु के करीब 668 बच्चे गिरफ्तार हुए थे। जान लें कि 12 वर्ष वाले बच्चों में एक दर्जन को हत्या जैसे जघन्य अपराध में गिरफ्तार किया गया था। शर्मनाक तथ्य यह है कि पिछले 10 वर्षो में किशोरों द्वारा बलात्कार के मामलों में तीन सौ फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। वर्ष-2003 में किशोरों द्वारा रेप के 535 मामले दर्ज किए गए थे, जो कि 2014 में बढ़कर दो हजार 144 हो गए। गौरतलब है कि बुरी संगत, आधुनिक जीवन शैली और संचार माध्यम, नशा, लाड़-प्यार एवं अशिक्षा किशोरों में बढ़ती यौन हिंसा का सबसे बड़ा कारण है। राष्ट्रीय बाल अपराध एजेंसी और ऑनलाइन सुरक्षा केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक, 2012 में 12 से 15 साल की उम्र के 62 फीसदी बच्चों के पास मोबाइल फोन थे। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वर्तमान में यह आंकड़ा कहां तक पहुंच गया होगा। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि स्मार्टफोन व तकनीक के विकास ने सेक्स संबंधी सामग्री को तेजी से बढ़ावा देने में मदद की है। चाइल्ड लाइन इंडिया फाउंडेशन 2014 के मुताबिक देश में 65 फीसदी युवा नशाखोरी से ग्रस्त हैं, जिनकी उम्र 18 वर्ष से कम है। यह आंकड़ा हमारे लिए भयावह है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि 10-11 वर्ष की आयु के 37 फीसदी छात्र विभिन्न प्रकार के मादक पदार्थ सेवन करने लगे हैं। सर्वे बताते हैं कि छोटी उम्र में ही मादक पदार्थो का सेवन करने वाले बच्चे हिंसक वारदातों को अंजाम देने से भी नहीं चूकते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इस मुद्दे को लेकर युवाओं से अपील की थी कि नशा समाज व अवाम के लिए एक अभिशाप है और इससे विनाश के सिवाय कुछ नहीं मिलता। अभिभावकों का कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों के जीवन को संवारने के लिए उनकी गतिविधियों पर पूरी नजर रखें। भारत में किशोर अपराध के मामले में बढ़ोतरी के बाद दिल्ली सरकार जघन्य अपराधों की सजा की न्यूनतम उम्र सीमा पंद्रह साल करने की मांग कर रही है, जबकि लोकसभा में किशोर न्याय संशोधन विधेयक 2014 पारित किया गया है, जिसमें सजा देने की उम्र सीमा 18 से घटाकर 16 वर्ष कर दी गई है। यह विधेयक अभी कानून नहीं बन पाया है, लेकिन नाबालिगों द्वारा किए जाने वाले अपराधों में जिस तेजी से वृद्धि हो रही है, उससे काननू बनाने की मांग तेज हो रही है। अमेरिका के 20 राज्यों में किशोरों से जुड़े अपराधों को लेकर सख्त कानून हैं। वहां जुनेवाइल मामलों में वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाता है। कुछ संगीन मामलों में उम्रकैद तक का प्रावधान है। फ्रांस में ऐसे अपराधियों के लिए किशोर न्यायालय है, जहां 13 से 18 वर्ष के किशोर अपराधियों के खिलाफ मामले चलते हैं। 2002 में इस कानून में बदलाव कर फ्रांस में बाल अपराधियों को और कड़ी सजा दिए जाने का भी प्रावधान किया गया। ऑस्ट्रेलिया में अपराधी की श्रेणी में रखने के लिए बच्चे की उम्र 10 साल होना जरूरी है। वहां 16 से 17 साल की उम्र के अपराधियों को वयस्क श्रेणी में रखकर मुकदमा चलाया जाता है, तो इंग्लैंड में बाल अपराध के तहत मुकदमा चलाने के लिए उम्र 10 साल तय है।
इसे विडम्बना ही कहेंगे कि भारत में सजा के बाद भी किशोरों को सुधार गृह ही भेजा जाता है। देश में 815 किशोर सुधार गृह हैं जिनमें करीब 35 हजार किशोरों को रखने की व्यवस्था है, जबकि देश में किशोर अपराधियों की संख्या करीब 17 लाख है। अधिकांश सुधार गृह जेल से कम नहीं बताए जाते। खराब माहौल के चलते वहां से बाल अपराधियों के भागने की घटनाएं अब आम हो गई हैं, जबकि बाल सुधार गृह की पहली शर्त यही होती है कि वहां का वातावरण मित्रवत होने के साथ-साथ किशोरों के लिए सीखने-सिखाने वाला हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस व्यवस्था में सुधार होगा। भारत में बाल अपराधियों की बढ़ती संख्या ने हमारे सामने जो सवाल खड़ा कर दिया है, उसमें अब सख्ती की तरफ सोचना ही होगा।

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