न्याय क्षेत्र में महिलाओं की कम संख्या हमारे लिए बड़ा सबक, न्यायपालिका में लिंगभेद ठीक नहीं




राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रीय विधि दिवस के अवसर पर नीति आयोग और विधि आयोग के सम्मेलन में न्यायपालिका में महिलाओं, ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के न्यायाधीशों की नगण्य संख्या पर चिंता जताते हुए सुधार की सलाह दी है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एके सीकरी भी इस मुद्दे पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। यह मुद्दा ऐसे समय उठाया गया है, जब न्यायपालिका न्यायाधीशों की कमी के संकट से जूझ रही है। सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के 17 हजार जजों में से देश की आधी आबादी यानी महिलाओं की संख्या 4 हजार 700 के करीब है। पिछले एक दशक से भी अधिक समयावधि में सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने सबसे बड़ी अदालत में नियुक्ति के लिए सिर्फ तीन महिला जजों का नाम प्रस्तावित किया है। एक स्वस्थ, सक्षम व सुदृढ़ न्यायपालिका के बिना बेहतर लोकतंत्र की कल्पना संभव नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि सभी तबकों का यथोचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
रूमा पाल को देश की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की दौड़ से कैसे अलग किया गया, यह अब भी रहस्य बना हुआ है। भारतीय गणतंत्र के 67 साल पूरे हो गए हैं। इतिहास के इन ‘गौरवशाली’ 67 सालों में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी तक एक भी महिला नहीं पहुंच पाई। वर्तमान स्थिति के अनुसार, अगस्त 2022 तक कोई स्त्री मुख्य न्यायाधीश नहीं बन सकेगी। संविधान लागू होने के लगभग 40 साल बाद फातिमा बीवी (6 अक्टूबर, 1989) सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं। वे 1992 में सेवानिवृत्त हो गईं। इसके बाद सुजाता वी. मनोहर (1994), रूमा पाल (2000), ज्ञान सुधा मिश्रा (2010), रंजना प्रकाश देसाई (2011) और आर. भानुमति (2014) को ही सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनने का अवसर मिल चुका है।
जहां सर्वोच्च न्यायालय में यह स्थिति है, वहीं देश के अधिकांश उच्च-न्यायालय अपनी ‘प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश’ का इंतजार ही कर रहे हैं। नौ फरवरी-1959 को अन्ना चेंदी देश में किसी भी उच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं जब उन्हें केरल उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई गई। इसके कई साल बाद (30 मई-1974) को पी. जानकी अम्मा व केके ऊषा (1991) केरल हाईकोर्ट की न्यायाधीश बनीं। सन 2013 में टी. मीना कुमारी को मेघालय उच्च न्यायालय और 2014 में जी. रोहिणी को दिल्ली हाईकोर्ट और डॉ. मंजुला चेल्लुर को कलकत्ता हाईकोर्ट की ‘प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश’ बनने का गौरव प्राप्त हुआ। देश भर के 24 उच्च न्यायालयों में अब तक नियुक्त महिला न्यायाधीशों की संख्या सात प्रतिशत से अधिक नहीं है।
न्यायपालिका में महिला न्यायधीशों की कमी का एक कारण यह बताया जाता है कि वकालत के पेशे में ही महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले बहुत कम है। इन 67 सालों में भारत के कानून मंत्री के पदों पर भी पुरुषों का कब्जा बना हुआ है। भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल का पद भी पुरुषों के लिए आरक्षित रहा है। कुछ समय पहले इंदिरा जयसिंह को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बना कर महिला सशक्तिकरण का खूब गुणगान किया गया था। यही नहीं, वकीलों की अपनी संस्थाओं में भी महिला अधिवक्ताओं को हाशिये पर ही खड़ा रखा गया। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के सभी अध्यक्ष (एमसी सीतलवाड़ से लेकर मन्नन कुमार मिश्र तक) पुरुष ही रहे हैं। यह स्थिति महिलाओं के असमानता के अधिकार को बताने के लिए काफी है। मगर अब इस विसंगति को दूर करना ही होगा।
न्यायालयों में आंख पर पट्टी बांधे न्याय की देवी की मूर्ति होती है। उनके हाथ में एक तराजू होता है, जिसके दोनों पलड़े समान होते हैं लेकिन इस मूर्ति के पास रखे न्याय के सिंहासन पर बैठने वाले न्यायाधीशों की संख्या की ओर एक नजर डालें, तो यहां असमानता का जो नजारा देखने को मिलता है, वह स्तब्ध कर देने वाला है। न्यायपालिका में महिलाओं की संख्या सब कुछ बयां करती है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था विश्वास पर टिका होता है। लोक का तंत्र के ऊपर विश्वास लोकतंत्र का आधार होता है, लेकिन किसी वर्ग को शासन के विभिन्न क्षेत्रों में सम्मानजनक प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाए, तो क्या उसका विश्वास उस तंत्र पर होगा? ऐसी स्थिति में क्या वह व्यवस्था लोकतंत्र कहलाने के लायक है।
भारत में कहने को तो लोकतंत्र है। चुनाव के द्वारा सरकारें चुनी जाती हैं। सभी वयस्क पुरुषों तथा स्त्रियों को वोट देने का अधिकार है। शासन में परोक्ष तौर पर भागीदारी का अधिकार है लेकिन जब बात प्रतिनिधित्व की हो, तो वोट देने के अलावा शासन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात से काफी कम नजर आता है। जिस तरफ वे नजर उठाकर देखती हैं, वहीं उन्हें पुरुषों की भीड़ में इक्का-दुक्का महिलाएं दिखाई दे जाती हैं। चाहे राजनीति हो या सरकारी नौकरी, निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोग हों या फिर उद्योग-व्यापार करने वाले, हर क्षेत्र में उन्हें अपने वर्ग के प्रतिनिधित्व में असमानता का नजारा देखने को मिलता है। इसी तरह न्यायपालिका भी लोकतंत्र का स्तंभ है। वहां पर बड़े-बड़े फैसले लिखे जाते हैं, लेकिन फैसला लिखने वालों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व न के बराबर ही है।
सुप्रीम कोर्ट में 31 न्यायाधीशों का प्रावधान है, लेकिन वर्तमान समय में 25 न्यायाधीश कार्यरत हैं। यानी छह न्यायाधीशों की जगह अभी खाली है। इन 25 न्यायाधीशों में सिर्फ एक महिला न्यायाधीश हैं और वे हैं आर. भानुमति। इस तरह महिलाओं का प्रतिनिधित्व सिर्फ चार प्रतिशत है। आजादी के बाद सुप्रीम कोर्ट में 45 मुख्य न्यायाधीश हो चुके हैं, लेकिन उनमें एक भी महिला नहीं है। यानी 67 सालों में एक भी महिला मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाई है। हालांकि, समाज के कुछ लोगों का कहना है कि महिलाएं खुद ही इस क्षेत्र में कम आना चाहती हैं। एक महिला वकील ने भी कहा कि जब वह कानून की पढ़ाई कर रही थीं, तो उनकी क्लास में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी और जिन लड़कियों ने डिग्री ली, उसमें भी अधिकांश ने प्रैक्टिस शुरू नहीं की।
अगर न्यायापालिका में महिलाएं कम आ रही हैं, तो सरकार को विचार करना चाहिए। उनकी संख्या बढ़ाने के लिए कमेटी बनानी चाहिए। अगर 50 प्रतिशत जनसंख्या वाले किसी वर्ग का न्याय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में चार-पांच प्रतिशत प्रतिनिधित्व होता है, तो यह लोकतंत्र के लिए शर्म की बात है। कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था (वितरण मूलक न्याय यानी शासन-प्रशासन के हर क्षेत्र में सभी वर्गो की भागीदारी में न्याय के बिना) लोकतंत्र कहलाने के लायक नहीं है। अगर भारत में सच्चा लोकतंत्र स्थापित करना है, तो फिर महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के बारे में गंभीर होना होगा। जरूरत है सरकार इस तरफ और अधिक ध्यान दे। महिलाओं के विकास के लिए आवश्यक व जरूरी कदम उठाए जाएं। वास्तव में तभी हम महिला सशक्तिकरण की सार्थकता सिद्ध कर पाएंगे।

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