त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराने के बाद भाजपा को निशाना बनाकर दूसरे राज्यों में भी प्रतिमाओं को खंडित करने का सिलसिला जारी



Lenin:- त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराने के बाद भाजपा को निशाना बनाकर दूसरे राज्यों में भी महापुरुषों की प्रतिमाओं को खंडित किए जाने का सिलसिला जारी है। मगर भारतीय जनता पार्टी पर लाख आरोप लगाए जा रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि जब लेनिन की मूर्ति तोड़ी गई, तब त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी। तब माणिक सरकार की ही अगुआई में कार्यवाहक सरकार काम कर रही थी। त्रिपुरा में जनादेश आते ही पच्चीस साल के वामपंथी शासन के प्रतीकों पर हमला शुरू हो गया। लेनिन की मूर्ति तोड़ दी गई। इसे लेकर बौद्धिक वर्ग के एक तबके ने सवालों की फेहरिश्त उछालनी शुरू कर दी है। इस घटना की प्रतिक्रियाएं भी हुईं। कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया तो मेरठ में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबडेकर की मूर्ति तोड़ी गई तो सुदूर दक्षिण तमिलनाडु में पेरियार की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया।
जाहिर है कि इसे लेकर देश में बवाल मचा। इसे लेकर सवाल उठने भी चाहिए, लोकतांत्रिक समाज में सत्ता का दर्शन और चेहरा बदलते ही उसके प्रतीकों को सदा के लिए आखिर क्यों उखाड़ फेंक देना चाहिए। हालांकि, एक वर्ग को इसलिए यह घटना चिंतित नहीं करती कि सत्ता से बेदखल हो चुकी एक विचारधारा के प्रतीक की मूर्ति तोड़ी गई, बल्कि उन्हें चिंता इस बात की है कि दुनिया में कथित बदलाव का सपना देखने-दिखाने वाले एक प्रतीक की मूर्ति तोड़ी गई। सोशल मीडिया पर इन दिनों लेनिन की मूर्ति तोड़ने को तालिबान के कामों से तुलना की जा रही है। अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान ने पिछली सदी के आखिरी दशक के शुरुआती दिनों में बामियान की पहाड़ियों पर बनी भगवान बुद्ध की मूर्तियों को तोड़ दिया था। तब पूरी दुनिया ने कला के उन अप्रतिम नमूनों को तोड़ने को लेकर विश्व को भाई-चारा का संदेश देने वाले बौद्ध दर्शन पर हमले के तौर पर लिया था।
लेकिन भारतीय संसद में एक विचारधारा ऐसी थी, जो तालिबान के प्रति सहानुभूति रखती थी। जब पेरियार की मूर्ति तोड़ी जाती है तो उसे भी बर्बरता से जोड़ा जाता है। बाबा साहब अंबेडकर की मूर्ति तोड़ी जाती है, तब भी प्रतिक्रियाओं के सुर ऐसे ही होते हैं। लेकिन जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति तोड़ी जाती है तो उसे बाकी मूर्तियों को तोड़ने की प्रतिक्रिया के तौर पर दिखाया जाता है। एक ही तरह की घटनाओं की व्याख्या अलग-अलग अंदाज में करना सोशल मीडिया को कुछ रणबांकुरों को भले ही स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन असल जिंदगी में लोग इसे दूसरे ही अर्थ में लेते हैं। भारतीय बौद्धिकता को छद्म के तौर पर लिया जाता है। भगवान बुद्ध नेपाल में पैदा हुए, उनके सबसे ज्यादा अनुयायी तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड जैसे देशों में हैं, लेकिन उन्हें बोध प्राप्त हुआ गया में, पहला उपदेश उन्होंने सारनाथ में दिया और निर्वाण कुशीनगर में प्राप्त किया, इसलिए बौद्ध दर्शन के संदर्भ में भारत भूमि की महत्ता कहीं ज्यादा है।
इसलिए बामियान की मूर्तियां तोड़ने को लेकर भारतीय समाज में कहीं ज्यादा पीड़ा थी। इसे लेकर संसद में बहस भी हुई और तब के विपक्षी दल कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों ने इसे खूंखार काम बताने की बजाय इतना कह कर पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी, तालिबान ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए यह काम किया है। दरअसल, उन दिनों शरीया आधारित शासन व्यवस्था लागू करने वाले तालिबान ने अफगानिस्तान को मध्यकालीन अंधेरा युग के साथ ही बर्बरता के युग में ठेल दिया था। इसलिए यूरोप और अमेरिका समेत तमाम देशों ने उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। इसलिए उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी। जब पूरी दुनिया तालिबान के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई की हिमायती बनी हुई थी, तब भारत के विपक्षी दल उसके प्रति सहानुभूति जताने की सोच रखते थे। इसलिए त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराने की कार्रवाई को तालिबान की कार्रवाई से जोड़ना उचित प्रतीत नहीं होता।
याद कीजिए, सोवियत संघ को और इराक को। जब सोवियत संघ में कम्युनिस्ट शासन का खात्मा हुआ और सोवियत संघ का विघटन हुआ तो वहां भी लेनिन की मूर्तियां गिराई गईं। लेनिन के नाम पर रूस के दूसरे बड़े प्राचीन शहर का नाम कम्युनिस्ट शासन ने लेनिनग्राड रखा था, उसका नाम फिर से सेंट्स पीट्सबर्ग रख दिया गया। इराक में भी जब सद्दाम की सत्ता का अंत हुआ, जनता सड़कों पर उतर आई और सद्दाम की मूर्तियां गिराने लगी। लीबिया में भी यही हुआ, कर्नल गद्दाफी के अंत के बाद वहां भी जनता ने गद्दाफी से जुड़े प्रतीकों को तहस-नहस करना शुरू कर दिया था। अफगानिस्तान में भी जब तालिबान की मध्ययुगीन बर्बर सत्ता का अंत हुआ तो लोगों ने उससे जुड़े प्रतीकों को तोड़ दिया था। लेनिन की मूर्तियां तोड़े जाने को दूसरे अर्थो में भी लेना चाहिए।
इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि लेनिन की विचारधारा को अपना आदर्श मानने वाली सरकार ने अपने ढाई दशकों के शासन काल में लोगों के उन सपनों को पूरा करने में कामयाब नहीं हो पाई, जिन्हें दिखाकर उसने लोगों का समर्थन हासिल किया था। लेनिन की मूर्ति तोड़ने का एक मतलब यह भी हो सकता है कि लोग माणिक सरकार से इतने परेशान हो चुके थे कि उन्हें अपने गुस्से के प्रतिकार का यह भी एक रास्ता नजर आया। दरअसल जनता ऐसे कदम तभी उठाती है, जब वह अतीतगामी होती सत्ताओं और विचारधाराओं के अतिवाद से पक चुकी होती हैं। तभी भीड़तंत्र अतिवादी कदम उठाता है। बेशक, लोकतांत्रिक समाज में ऐसे कदम सही नहीं माने जाते। मगर सच्चाई तो यही है। अब भारतीय जनता पार्टी पर लाख आरोप लगाए जा रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि जब लेनिन की मूर्ति तोड़ी गई, तब त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी।
तब माणिक सरकार की ही अगुआई में कार्यवाहक सरकार काम कर रही थी। कोई सवाल नहीं है कि इस सरकार का आदेश मानने से प्रशासन और पुलिस इनकार कर देता। उन्हें इस बात का अंदाजा होना चाहिए था कि सत्ता बदलने के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर ऐसे सवाल उठेंगे। वैसे भारतीय जनता पार्टी ने इसके पीछे अपना हाथ होने से साफ इनकार कर दिया है। वैसे जिन राज्यों में वाम विचाराधारा वाली सरकारें कार्यरत रही हैं, वहां से छनकर आने वाली खबरें पार्टी तंत्र के वर्चस्व और प्रशासन के पंगु होने की कहानियों से भरी रही हैं। पश्चिम बंगाल हो या त्रिपुरा, उनका चरित्र एक ही रहा है। इससे जनता बुरी तरह त्रस्त रही है।
ऐसे में तो माणिक सरकार की कार्यवाहक सत्ता को इसका अंदाजा होना चाहिए था कि उनकी असल सत्ता जाते ही त्रिपुरा के लोग बदले की भावना से सड़कों पर उतर सकते हैं। इसलिए उन्हें एहतियाती कार्रवाई करनी चाहिए थी। लेनिन की मूर्ति तोड़ने को लेकर भारतीय जनता पार्टी को संस्कारहीन बताया जा रहा है। दुर्भाग्यवश इसे तार्किक ढंग से स्वीकार भी किया जा रहा है। लेकिन लोग यह भूल जा रहे हैं कि त्रिपुरा की सत्ता पर काबिज हो चुके विप्लब देब ने किस तरह माणिक सरकार का पैर छूकर आशीर्वाद लिया था। याद कीजिए, जब प्रधानमंत्री रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने कोलकाता की यात्रा की थी तो उन्हें बर्बर विचारधारा का प्रतीक बताते हुए पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने प्रोटोकाल के तहत उनकी आगवानी करने से तक से इनकार कर दिया था।
वैसे भी मूर्तियां तोड़ने भर से विचारधाराएं नहीं मर जातीं। मूर्तियां तो सिर्फ प्रतीक होती हैं और मूर्तियां तोड़ने का महत्व हवा में तलवार भांजने से ज्यादा नहीं है। लोकतांत्रिक समाज में विचारधाराओं को शिकस्त जमीनी स्तर पर बड़ी लकीर खींचकर ही दी जा सकती है। देश में मूर्ति तोड़ो अभियान जिस तरह से चलाया जा रहा है, उसे अब बंद करना होगा व सभी को अपनी विचारधारा को स्पष्ट करना होगा।

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