चीन में शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता साफ हो गया




Xi Jinping:- चीन की संसद ने रविवार को राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए दो कार्यकाल की निर्धारित सीमा को खत्म कर दिया। शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता साफ हो गया। यह फैसला बेहतर है या नहीं यह जानने के लिए थोड़ा इंतजार तो करना ही पड़ेगा। चीन की संसद ने रविवार को राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए दो कार्यकाल की निर्धारित सीमा को खत्म कर दिया। इसके बाद वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता साफ हो गया। चीन की संसद ने दो कार्यकाल की अनिवार्यता को दो तिहाई बहुमत से खत्म कर दिया है।
सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना द्वारा प्रस्तावित संशोधन को संसद से मंजूरी मिलना तय ही माना जा रहा था। माओत्से तुंग की तरह अनिश्चित काल तक फिर किसी के द्वारा सत्ता हथियाने के खतरे को देखते हुए सम्मानित नेता देंग शियोपिंग ने चीन में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के लिए दो अधिकतम कार्यकाल यानी 10 साल तक सत्ता में रहने की सीमा तय कर दी थी। हालांकि, रविवार को हुए संवैधानिक बदलाव के साथ ही 64 वर्षीय शी का आजीवन चीनी राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता प्रशस्त हो गया। अभी उनका दूसरा कार्यकाल चल रहा है जो 2023 में खत्म होगा।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इस कदम को पूरी दुनिया में गंभीरता से लिया जा रहा है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद पर किसी व्यक्ति के लगातार बने रहने की दो कार्यकाल वाली मौजूदा सीमा समाप्त कर दी जाए। चीन का सरकारी मीडिया इसे एक अच्छे और जरूरी कदम के रूप में पेश कर रहा है तो, पश्चिमी देश इसे एक व्यक्ति की तानाशाही लागू होने की पूर्वपीठिका बता रहे हैं। मगर यहां एक सवाल यह बनता है कि शी ने दूसरा कार्यकाल अभी शुरू ही किया है, जिसकी अवधि 2023 तक है। ऐसे में इस प्रस्ताव की जरूरत अभी क्यों आ पड़ी? इसका जवाब कुछ हद तक उत्तराधिकार की उस प्रक्रिया में मिलता है, जिसका प्रावधान 1982 के संविधान में किया गया है।
इस प्रक्रिया के मुताबिक करीब डेढ़ दशक पहले से यह स्पष्ट होने लगता है कि किसे आगे चलकर राष्ट्रपति बनना है। पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी में सदस्य और भी होते हैं, लेकिन सबको पता होता है कि उगने वाला सूर्य कौन सा है। ऐसे में दूसरे कार्यकाल में चल रहे राष्ट्रपति को राष्ट्र प्रमुख की कानूनी हैसियत भले मिली रहे, नौकरशाही का रुझान उस दूसरे नेता की तरफ होने लगता है, जो कुछ समय बाद सत्ता संभालने वाला होता है। इसमें दो राय नहीं कि शी ने चीन की संकटग्रस्त व्यवस्था को उबारने की कोशिशें की हैं।
भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के जरिए जहां उन्होंने आम जनता की नजरों में सरकारी तंत्र को विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया, वहीं आर्थिक समानता जैसे जीवन मूल्यों को विमर्श में वापस लाने और शासन की एक अहम कसौटी बनाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। लेकिन अब शी जिस तरह से ताकतवर हो गए हैं कि चीन के तंत्र पर खतरा फिर मंडराने लगा है कि वह व्यक्तिपरक तंत्र में न बदल जाए। हालांकि बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि चीन की अर्थव्यवस्था किस रफ्तार से बढ़ती है और फिर शी चीन के अंतरविरोधों को किस हद तक काबू में रख पाते हैं?

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