रूस विरोधी वैश्विक अंतर्विरोध


राजएक्सप्रेस, भोपाल। Spy Poisoning ब्रिटेन (Britain) के नेतृत्व में शक्तिशाली यूरोपीय देश तथा व्यापार के लिए यूरोपियन यूनियन से जुड़े अनेक देश रूस से टकराव की स्थिति में पहुंच चुके हैं। यह टकराव भविष्य में किस रूप में सामने आएगा, यह बड़ा सवाल है। मगर इतना तो साफ है कि अगले कुछ दिनों में रूस विरोधी मानसिकता कुछ और देशों में देखने को मिल सकती है। यह घटनाक्रम भारत के लिहाज से भी अहम है। अत: हमें तटस्थता कतई नहीं दिखानी चाहिए।
ब्रिटेन (Britain) के नेतृत्व में शक्तिशाली यूरोपीय देश तथा व्यापार के लिए यूरोपियन यूनियन से जुड़े अनेक देश रूस (Russia) से टकराव की स्थिति में पहुंच चुके हैं। इस टकराव का जो प्रमुख कारण प्रचारित व सार्वजनिक हुआ या हो रहा है, वह है ब्रिटेन में रह रहे पूर्व रूसी जासूस सर्गेई स्क्रिपल व उनकी 36 वर्षीय पुत्री पर विषमिश्रित रसायनिक हमला, जिसका आरोप ब्रिटेन ने रूस पर लगाया है। परिणामस्वरूप विगत 25 मार्च को अमेरिका ने भी रूस के विरुद्ध बड़ा कूटनीतिक निर्णय लेते हुए उसके 60 राजदूतों को गुप्तचर भूमिका निभाने के संदेह पर निष्कासित कर दिया। इनमें से 12 संयुक्त राष्ट्र में पदस्थ हैं।
अमेरिका की देखादेखी फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड, आस्ट्रेलिया सहित 18 देशों ने भी रूस के कुल 40 राजदूत निकाल दिए। अभी पता नहीं कितने देश अमेरिका का समर्थन करने के लिए अपने यहां स्थित रूसी राजदूतों को निकालेंगे या उन्हें निगरानी में रखेंगे। ब्रिटेन तो पहले ही 23 रूसी राजनयिक निष्कासित कर चुका है। हालांकि, ट्रंप सरकार और अन्य देशों की सरकारों ने यह राजनीतिक कठोरता रूसी राजदूतों द्वारा राजदूत के भेष में गुप्तचर का कार्य करने के संदेह में दिखाई है। अमेरिका ज्यादा कठोर बना हुआ है और उसने रूसी राजदूतों को सात दिन के अंदर देश छोड़ने का आदेश पारित किया है। साथ ही सिएटल स्थित रूसी वाणिज्य दूतावास को बंद करने के संकेत भी दिए हैं।
जासूस तथा उसकी पुत्री पर हमला करने के ब्रिटेन के आरोप और फलस्वरूप ब्रिटेन तथा अमरिका सहित अन्य देशों की रूस के राजदूतों को निष्कासित करने की कार्रवाई पर पुतिन की ओर से तो अभी तक कोई आधिकारिक वक्तव्य नहीं आया है, लेकिन आस्ट्रेलिया स्थित उसके राजदूत ने चेतावनी दी है कि जिस तरह रूस के विरुद्ध कार्रवाइयां हो रही हैं, उससे दुनिया को भयंकर शीतयुद्ध में जाने से कोई नहीं रोक सकता। राजदूत ग्रिगोरी लॉगविनोव ने रूस की ओर से ब्रिटेन के आरोप का खंडन किया। उनके अनुसार ब्रिटेन न तो आरोप के साक्ष्य दे रहा है और न ही अड़ियल व्यवहार छोड़ रहा है।
इस संदर्भ में यह तथ्य विचारणीय है कि ब्रिटेन ने ‘रसायन हथियार प्रतिबंध सभा के प्रावधान एवं नवाचार’का अनुसरण भी नहीं किया और वह रूस के अनुरोध के उपरांत भी इसका अनुकरण करने से मना कर रहा है। रूस के विरोध में एकजुट हुए विश्व के देशों के प्रति रूसी लोगों में भी अत्यधिक रोष है। अमेरिका द्वारा रूसी वाणिज्य दूतावास बंद किए जाने के बाद रूस में हुए एक अमेरिका-विरोधी ट्विटर चुनाव में सेंट पीटर्सबर्ग स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास को बंद करने का बहुमत सामने आया है। उधर यूक्रेन व क्रीमिया जैसे देशों में भी स्थानीय आतंकियों द्वारा किए व कराए जा रहे उपद्रवों, हिंसा व अन्य लोक समाज तथा लोक प्रशासन विरोधी गतिविधियों में षड्यंत्रपूर्वक रूस का नाम लगाया जा रहा है।
इन परिस्थितियों में रूसी राष्ट्रपति पुतिन को उन देशों के साथ मिलकर नई समस्या का समाधान निकालना होगा, जो अभी तक उसके विरोध में नहीं खड़े हुए। नि:संदेह भारत इनमें से एक हो सकता है। भारत को इस संबंध में तटस्थता नहीं अपनानी चाहिए। अपना रुख साफ करना चाहिए। देखा जाए तो ब्रिटेन ने जो मुद्दा रूस को घेरने के लिए उठाया है, वह इतना बड़ा था नहीं, लेकिन अमेरिका ने जिस तरह ब्रिटेन के संकेत पर रूसी राजदूतों पर जासूसी करने के आरोप लगा उन्हें निकाला है, उससे निश्चित ही दुनिया में शीतयुद्ध अपने पुरातन स्वरूप से अलग विनाशक हो जाएगा।
अमेरिका व चीन के बीच व्यापारिक टकराव तो पहले से ही रहा है और अब ब्रिटेन, अमेरिका व फ्रांस ने रूसी राजदूतों को निष्कासित करने का जो परोक्ष युद्ध शुरू किया है वह विश्व के लिए आगामी दिनों में बहुत बड़ी समस्या बनने वाला है। क्या विडंबना है कि जासूस पर हमले को लेकर आकार ले रहा वैश्विक संघर्ष संयुक्त राष्ट्र के पांच प्रमुख सदस्यों के बीच ही हो रहा है। उक्त घटना पर चिंतन करते हुए याद आ रहा है कि वे कौन लोग थे, जो यह मिथ्या समाचार फैला रहे थे कि वर्ष 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को रूस और पुतिन ने रिपब्लिकन ट्रंप के पक्ष में प्रभावित किया था।
यदि ऐसा हुआ होता तो क्या ट्रंप उस उपकार को एक वर्ष में भूल रूस के विरुद्ध इतनी बड़ी राजनयिक कार्रवाई कर सकते थे? जिस तरह रूसी शासन, उसके राष्ट्रपति के विरुद्ध अमेरिकी चुनाव के संदर्भ में वैश्विक दुष्प्रचार किया गया था, क्या गारंटी है कि ब्रिटिश नेतृत्व में रूस पर लगे नए आरोप उसी दुष्चक्र का कोई हिस्सा न हों? पूरा विश्व आज तक जिन तीन शक्तिशाली राष्ट्रों के व्यापारिक, कूटनीतिक तथा सामरिक हस्तक्षेप से निश्चित ध्रुवों में विभाजित था वे क्रमश: अमेरिका, रूस व चीन थे।
जब दुनिया के अनेक देश आईएस के आतंक से त्रस्त थे और कोई भी शक्तिशाली देश सीरिया सहित मध्य एशियाई व यूरोपीय सीमाओं से लगे आतंक त्रस्त देशों में सैन्य भूमिका में उतरना नहीं चाहता था, तब अमेरिका व रूस ने एक कूटनीतिक गठबंधन बनाकर सीरिया में दो पक्ष (सीरियाई सरकार व आईएस संरक्षक माफिया) बनाकर उनके साथ लड़ने का कार्यक्रम बनाया। यह कार्यक्रम भी ये देश तब बना पाए जब तेल संसाधनों से लैस मध्य एशियाई देशों पर इन्होंने अपनी तेल की निर्भरता बिल्कुल कम कर दी। यह सब संभव हुआ ऊर्जा के अपने परमाणु स्रोत व संसाधन विकसित करें।
आईएस से निपटने के बहाने रूस-अमेरिका को मुस्लिम राष्ट्रों से भरे मध्य एशिया में अपना सामरिक, व्यापारिक प्रभुत्व जमाने का अवसर तो मिला ही मिला। साथ ही इन्हें बारी-बारी से सीरिया व इसे जैसे अन्य तेल के प्राकृतिक भंडारों से पूर्ण भू-भागों पर अपना व्यापारिक अधिकार जमाने का अवसर भी मिला। दुनिया को दिखाने के लिए रूस-अमेरिका सीरिया में परस्पर विरोधी गुटों के साथ थे, पर वास्तव में वे वहां व्यापारिक व सामरिक लाभ के साझीदार थे। यह परस्पर साझीदारी अंतत: दोनों राष्ट्रों के लिए अत्यंत लाभदायी सिद्ध हुई।
दस वर्षो तक सीरिया में रूस व अमेरिका निर्मित अस्त्रों का व्यापार भी अत्यधिक हुआ, जिसका लाभांश अमेरिका-रूस के मध्य वितरित होता रहा। संयुक्त राष्ट्र व सुरक्षा परिषद् के पांच प्रमुख राष्ट्रों में से दो राष्ट्र रूस व अमेरिका विपरीत शासन पद्धतियों तथा सीरिया में दो विरोधी गुटों की ओर से लड़ते हुए भले ही अलग प्रतीत हों, परंतु वास्तव में इस युग की व्यापारिक-कूटनीतिक-राजनीतिक चेतना के अनुसार वे दोनों समरूप ही प्रतीत होते हैं। तब क्या कारण है कि संयुक्त राष्ट्र व सुरक्षा परिषद् के अन्य देश ब्रिटेन, रूस के विरुद्ध इतना आक्रोशित हो गए कि दुनिया भर में खलबली मच गई है। क्या कारण है कि अमेरिका भी जासूसी के संदर्भ में जारी ब्रिटेन के प्रतिवेदन पर रूस के प्रति इतना कठोर हो गया।
संयुक्त राष्ट्र व सुरक्षा परिषद् के दो अन्य देश फ्रांस तथा चीन में से केवल चीन ही है, जो अभी तक इस घटना पर तटस्थ बना हुआ है, जबकि फ्रांस ने भी रूस के विरुद्ध ब्रिटेन और अमेरिका की राह पकड़ ली है। मास्को का ऐसा विश्वासघाती चरित्र कभी नहीं रहा, जैसा उसके विरुद्ध ब्रिटेन और अमेरिकी नेतृत्व में अन्य देशों की कूटनीतिक कार्रवाइयों से प्रतीत हो रहा है। आखिर जासूसों के साथ होने वाली ब्रिटेन जैसी घटना कोई पहली व अप्रत्याशित घटना नहीं है। बहरहाल, रूस विरोधी यह वैश्विक अंतर्विरोध अंतत: कहां जाकर रुकेगा, प्रतीक्षा अब इसी बात की रहेगी। आने वाले दिनों में रूस को लेकर बन रहा वैश्विक परिदृश्य कई ऐसे नाटकीय मोड़ लेगा, जो दो देशों के बीच टकराव का कारण बनेगा। अत: अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

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