राजीव ने दुनिया को किया नतमस्तक



राजएक्सप्रेस, भोपाल। आज पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की जयंती है। प्रधानमंत्री रहते राजीव ने पड़ोसी मुल्कों और अमेरिका तथा चीन के साथ जिस तरह के रिश्तों की नींव रखी, उसकी मिसाल आज भी देखी जाती है। सीमाओं पर दुश्मन देशों के दुस्साहस से उपजी असुरक्षा में हमें राजीव गांधी याद आते है। उन्होंने विश्व में कुछ भी सह लेने की भारत की छवि को तोड़ते हुए आर्थिक और सैन्य ताकत पर आधारित सशक्त भारत की पहचान दी।
Rajiv Gandhi: बेनजीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा में दावा किया है कि दक्षिण एशिया और शायद सारी दुनिया हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच रिश्तों का एक नया ही स्वरूप देखती अगर राजीव गांधी जिंदा रह जाते। भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल में साहसिक फैसलों से दुनिया को यह अहसास कराया था कि भारत जितना विनम्र है, राष्ट्रीय हित और देश की सुरक्षा को लेकर उतना ही आक्रामक भी। इंदिराजी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो तो पड़ोसियों से मित्रता या शत्रुता को लेकर किसी भी देश के प्रति किसी तरह का पूर्वाग्रह उनके मन में नहीं था। पर अपनी मां की हत्या और खालिस्तान के अनुभव से वह इतना जरूर समझ चुके थे कि पड़ोसियों के साथ अनावश्यक नरम रुख को भारत की कमजोरी समझा जा सकता है। युवा राजीव के सामने अपने को भारत के राष्ट्रहित की रक्षा में समर्थ और देश में सर्वमान्य नेता के रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती भी थी। यह वही दौर था जब चीन, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश व श्रीलंका से हमारे संबंध बेहद असामान्य थे और तनाव चरम पर था।
श्रीलंका में तमिलों पर अत्याचारों का अंतहीन सिलसिला चल रहा था और उसे वहां की सिंहली समर्थित सरकार का समर्थन प्राप्त था। ये तमिल भारत के दक्षिण राज्य तमिलनाडु में रहने वाले लोगों के रिश्तेदार थे। जाहिर है राजीव के मन में श्रीलंका में रहने वाले तमिलों के वैधानिक अधिकारों को लेकर बड़ी सहानुभूति थी। भारत की समझाइश के बाद भी श्रीलंकाई सरकार ने तमिलों के अधिकारों के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई तो राजीव गांधी ने भारत की सॉफ्ट नीति को बदल कर श्रीलंका को उसी की भाषा में जवाब देना आरंभ किया। जनवरी 1985 में श्रीलंका की एक गश्ती नौका ने भारतीय जल सीमा में प्रवेश कर मछुआरों पर हमला किया जिसमें दो मछुआरे मारे गए। भारतीय नौसेना ने श्रीलंका की एक सशस्त्र नौका दल को पकड़ लिया और उसके बाद राजीव गांधी ने श्रीलंका को भारत की सामरिक ताकत का अहसास कराया।
श्रीलंका में बसने वाले तमिल मूलत: भारतीय और हिंदू धर्म को मानने वाले हैं, इन 20 लाख तमिलों में असुरक्षा, अविश्वास और आतंक की भावना विद्यमान थी। तमिलों की सुरक्षा के लिए तमिल आंदोलन जोरों पर था, वहीं फरवरी 1986 में श्रीलंका के राष्ट्र प्रमुख जयवर्धने ने एक साल के भीतर तमिल आंदोलन को कुचलने की घोषणा कर दी। इस दौरान पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई, इस्नयल की मोसाद और अमेरिका की सीआईए की श्रीलंका में मौजूदगी के संकेत से दक्षिण की और भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ गई। जाफना प्रायद्वीप में तमिलों की बदतर स्थिति पर गंभीर चिंता प्रकट करते हुए भारत ने श्रीलंका से तुरंत युद्ध विराम करने और तमिलों को सहायता देने को कहा। जब श्रीलंका ने इसे अनसुना कर दिया तो भारत ने श्रीलंका को चेतावनी देते हुए अपने विमानों से जाफना में घुसकर भोजन पैकेट गिराए। अपनी सीमा में भारतीय विमानों के घुसने से सदमे में आए श्रीलंका ने भारत को चेतावनी भी दी। श्रीलंकाई सरकार की चेतावनी और विरोध को दरकिनार कर भारत ने उसे यह अहसास कराया कि भारत अपनी और अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए किसी भी देश में प्रवेश कर सकता है।
भारत की इस कार्यवाही के कारण ही श्रीलंका सरकार ने भारत के समक्ष घुटने टेके और तमिलों पर सैनिक कार्यवाही उसे बंद करनी पड़ी। उस दौर में श्रीलंका सरकार तमिलों को दबाने और भारत को नीचा दिखाने के लिए पाकिस्तान की सेना का सहयोग लेना चाहती थी और इससे भारत को सुरक्षा के नए खतरों से जूझना पड़ता। भारत को यह अंदेशा था कि इस इलाके में पाकिस्तान और अमेरिका के घुसने से भारत की दक्षिण दिशा में नई सुरक्षा चुनौतियों से भारत को जूझना पड़ सकता है। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश की सुरक्षा के लिए आक्रामक नीति का सहारा लेकर तमिल समस्या के समाधान के लिए भारतीय सेना को श्रीलंका भेजने से भी गुरेज नहीं किया। हालांकि, राजीव गांधी का यह कदम आत्मघाती साबित हुआ और इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी, लेकिन देश की सरहदों की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाना चाहिए, इसका अहसास भी राजीव गांधी ने ही कराया था।
इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भारत अमेरिका के संबंधों में भारी कड़वाहट भर गई थी, राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्री रहते दो बार अमेरिका की यात्रा की। वहां उनका गर्मजोशी से स्वागत हुआ और उन्हें अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करने का अवसर देते हुए सर्वोच्च सम्मान दिया गया। यह वही दौर था जब भारत अमेरिका के बीच प्रौद्योगिकीय सहयोग की शुरुआत हुई और अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निवेशकर्ता देश बनने के साथ-साथ भारत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापार भागीदार भी बना। इस यात्रा की सफलता ने यह भी सुनिश्चित किया कि पाक परस्ती की अमेरिकी सोच अब भारत से संबंधों को लेकर भी संजीदा होगी। नेहरू की 1954 में चीन यात्रा के 34 वर्ष बाद राजीव गांधी ने 1988 में पांच दिवसीय यात्रा कर भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध से बढ़ी कड़वाहट को दूर करते हुए नए संबंधों की शुरुआत की।
दुनिया को दो बड़ी जनसंख्या वाले देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही कटुता को दूर करने का राजीव गांधी का यह अनूठा प्रयास था, जिसके जरिये पाकिस्तान और चीन के प्रगाढ़ संबंधों को बेधने की कोशिश के तौर पर देखा गया। आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की प्रायोजित नीति, इंदिरा गांधी की हत्या, पंजाब के आतंकवाद में पाक की भूमिका और जिया उल हक की सैन्य तानाशाही से भारत और पाकिस्तान के संबंध रसातल में पहुंच गए थे और दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव चरम पर था। ऐसे समय में राजीव गांधी ने आगे बढ़कर दूरदर्शिता पूर्वक पड़ोसी से बेहतर संबंधों को महत्व दिया। उनके इन्हीं प्रयासों की बदौलत भारत और पाकिस्तान के बीच 10 जनवरी 1986 को पहली बार व्यापक व्यापारिक समझौता हुआ और इस प्रकार दोनों देशों के बीच एक नए व्यापारिक संबंधों की शुरुआत हुई। साथ ही दोनों देशों के बीच एक बार फिर सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध परवान चढ़े। स्वतंत्र भारत के इतिहास में दूसरी बार कोई प्रधानमंत्री पाकिस्तान पहुंचा और उन्होंने पाक से एक-दूसरे के परमाणु संयंत्रों पर हमला नहीं करने का समझौता किया।
1986 में बंगलौर में सार्क सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सार्क का मुख्यालय काठमांडू में स्थापित करने का कूटनीतिक दांव भी राजीव गांधी ने ही खेला था। उन्होंने यह सुनिचित करने का प्रयास किया था कि सार्क के देशों की दशा और दिशा भारत ही तय करेगा। बहरहाल, आज भारत की सीमाओं पर दुश्मन देशों के दुस्साहस से उपजी असुरक्षा में हमें राजीव गांधी याद आते हैं। उन्होंने विश्व में कुछ भी सह लेने की भारत छवि को तोड़ते हुए आर्थिक और सैन्य ताकत पर आधारित सशक्त भारत की पहचान दी।

डॉ. ब्रहमदीप अलूने (वरिष्ठ पत्रकार)

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