नगालैंड में फिर बढ़ रही अशांति


राजएक्सप्रेस, भोपाल। नगालैंड में सुरक्षा बलों पर किए जा रहे उग्रवादी हमले (Nagaland Militants Attack)बता रहे हैं कि राज्य में अशांति का दौर थमा नहीं है। उग्रवादियों ने गत 14 दिनों में तीन बार असम राइफल्स के जवानों को निशाना बनाया। यह हरकत उग्रवादियों के नगालैंड में फिर से सिर उठाने की परिचायक है।
नगालैंड में सुरक्षा बलों पर उग्रवादी हमले बता रहे हैं कि राज्य में अशांति का दौर थमा नहीं है। उग्रवादियों ने पिछले 14 दिनों में तीन बार असम राइफल्स के जवानों को निशाना बनाया। रविवार को राज्य के मोन जिले में नगा उग्रवादियों के हमले में चार जवान शहीद हो गए। छह जून को भी इसी जिले में नगा उग्रवादियों ने असम राइफल्स के एक शिविर पर धावा बोला था। अभी 20 जून को उग्रवादियों ने फिर जवानों पर हमला किया। राहत की बात यह है कि इस बार वे अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाए। पिछले महीने की तीन तारीख को मोन जिले के चांगलांसू में नगा उग्रवादियों के हमले में असम राइफल्स के आठ जवान शहीद हो गए थे। हिंसा का यह सिलसिला चिंताजनक है। नगा उग्रवादियों की रणनीति घात लगा कर हमले करने की रही है, ताकि अधिक से अधिक संख्या में सुरक्षा बल हताहत हों और उनका मनोबल टूटे। समस्या यह है कि केंद्र के तमाम प्रयासों के बावजूद नगालैंड के उग्रवादी समूह शांति वार्ता को लेकर उत्सुक नहीं हैं। जब वार्ता की बारी आती है तभी ऐसी घटना हो जाती है जिसे आड़ बना कर उग्रवादी संगठन हमलों की रणनीति पर चलने लगते हैं। यही रवैया नगालैंड में शांति की राह में बाधक है।
ऐसे में सवाल उठता है कि नगा संगठनों और केंद्र के बीच शांति वार्ता कब होगी और कैसे चलेगी! क्या दशकों पुरानी इस समस्या का समाधान निकल भी पाएगा? हाल में एक छोटी-सी घटना के बाद ही नगा संगठन बातचीत से बिदक गए। दो जून को सुरक्षा बलों ने नगा संगठनों के समूह-नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप यानी एनएनपीजी की कार्यकारी समिति के नेता के घर पर छापा मारा था। सुरक्षा बलों की इस कार्रवाई से एनएनपीजी में नाराजगी बढ़ गई और उसने केंद्र के साथ चल रही बातचीत रोक दी। इसके बाद ही असम राइफल्स पर हमले की तीन घटनाएं हो गईं। केंद्र के साथ नगा संगठनों की वार्ता सात जून को होनी थी। नगा समस्या के स्थायी समाधान के लिए पिछले साल केंद्र सरकार और एनएनपीजी के बीच शांति वार्ता की प्रक्रिया शुरू हुई थी। दोनों पक्षों में सात जून को होने वाली बातचीत इसी शांति वार्ता का हिस्सा थी। नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप में कई नगा संगठन शामिल हैं।
इस घटनाक्रम से जिस तरह वार्ता में व्यवधान पड़ा, उससे यह आशंका तो होती ही है कि जो शांति वार्ता साल-भर पहले शुरू हुई थी, वह किसी तार्किक नतीजे तक पहुंच भी पाएगी या नहीं। शांति वार्ता की प्रक्रिया को झटके इसकी शुरुआत से ही लगते रहे हैं। नगा समस्या दशकों पुरानी है। दूसरी बड़ी वजह यह रही कि नगालैंड में एक नहीं, कई उग्रवादी-अलगाववादी संगठन खड़े हो गए और सभी ने हिंसा का रास्ता अपनाया। हालांकि सबसे पहले नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) ने केंद्र सरकार के साथ शिलांग समझौता किया था। नगा समस्या के समाधान के लिए जरूरी है कि जो भी समझौता हो, वह सभी नगा संगठनों और राज्य की जनता को स्वीकार्य हो।

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