मप्र में बेटियों के हक में स्वर्णिम पहल


राजएक्सप्रेस, भोपाल। आज के आधुनिक समाज में बेटियों और महिलाओं (Women in Society)को लेकर जिस तरह का उपेक्षित रवैया अख्तियार कर लिया गया है, वह ठीक नहीं है। मध्यप्रदेश समेत दूसरी सरकारें महिलाओं का जीवन स्तर सुधारने और उन्हें भयमुक्त माहौल देने के लिए तमाम योजनाएं चला रही हैं, मगर योजनाएं तब तक अपना काम नहीं कर पाएंगी, जब तक हम खुद को नहीं बदलेंगे। अत: जरूरी है कि समाज महिलाओं को लेकर अपनी सोच में बदलाव लाए और उनके रास्ते का पत्थर न बने।
देश के साथ-साथ मध्यप्रदेश बदल रहा है। इस बात का गवाह है बीते 15 सालों का स्वर्णिम दौर। एक के बाद एक बेटियों की सुरक्षा और उनके बढ़ते रहने के लिए शिवराज सिंह सरकार ने जो कोशिश की है, उसका अनुसरण अब देश के दूसरे राज्य भी तेजी से कर रहे हैं। बेटियों के जन्म से लेकर उन्हें आर्थिक रूप से संबल बनाने तक की हर कोशिश मध्यप्रदेश में हुई है। बेटियों के दुष्कर्मियों को फांसी की सजा हो या फिर लाडली लक्ष्मी योजना की शुरुआत। इन कोशिशों का सुफल यह निकला कि बाल विवाह जैसी कुरीतियां कम होती जा रही हैं। यह मध्यप्रदेश के बदलाव का सबसे बड़ा सबूत है। इतिहास गवाह है कि वैदिक युग में समाज में महिलाओं का स्थान पुरुषों की बराबरी का ही था। कोई भी सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और रचनात्मक कार्य बगैर महिलाओं की गैर-मौजूदगी के संपन्न नहीं होते थे। समाज में महिलाओं को मिले उच्च स्थान के फलस्वरूप ही कहा गया कि ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ विवाह, हवन, आहूति, पूजन-पाठ, मंदिरों में प्रवेश यहां तक कि ऋषि-मुनियों के आश्रम में भी महिलाओं को प्रवेश की पात्रता थी।
सीता, सावित्री आदि अनेक नारियां आज भी आदर्श के रूप में मान्य हैं। आगे चलकर यह परिस्थिति धीरे-धीरे बदलती गई, जिसका परिणाम हुआ पुरुष प्रधान समाज की रचना। आज के युग में नारी चार-दीवारी को लांघ कर आगे तो बढ़ी लेकिन अपने अस्तित्व के खतरे को साथ लेकर। बालिका भ्रूण हत्या जैसे घिनौने अत्याचार समाज में शुरू हो गए। परिवार में लड़की का होना अभिशाप बन गया। स्वतंत्रता के 70 वर्ष बीत चुके हैं। महिला सुरक्षा, समानता का अधिकार और घरेलू हिंसा के कड़े कानूनों के बन जाने के बाद भी नारी अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर पा रही है। नारी की कोख में ही नारी का कत्ल बड़ी सरलता से हो रहा है, जिसके फलस्वरूप स्त्री-पुरुष अनुपात वर्ष दर वर्ष घटता जा रहा है।
भारत में पुरुषों की तुलना में 40 लाख महिलाएं कम हैं। यह लिंग परीक्षण का परिणाम है। हर महीने देश भर में 50 हजार से अधिक कन्या भ्रूणों का गर्भपात किया जाता है और न जाने कितनी ही बालिकाओं की या तो हत्या कर दी जाती है या उन्हें लावारिस छोड़ दिया जाता है। हमने आधुनिक तकनीक को बदनाम करने में कोई कसर बाकी नहीं रख है, जो अल्ट्रासाउंड तकनीकी भ्रूण की स्थिति जांचने के लिए थी उसका इस्तेमाल कन्या भ्रूण के गर्भपात के लिए किया जा रहा है। भारत में लिंग परीक्षण तथा लिंग के आधार पर होने वाला गर्भपात दोनों ही अपराध हैं, लेकिन इस पर कानूनी कार्यवाही बहुत ही कम हो पाती है या नहीं होती है। यह सिर्फ गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चियों पर ही मंडराता खतरा नहीं है, बल्कि इसका असर अकेले पड़ते पुरुषों के विवाह की समस्या तक जा पहुंचा है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी लैंगिक अनुपात में आई गिरावट को लेकर चिंता जताते हुए इसका कारण जानना चाहा था। एक सरकारी अध्ययन में सामने आया है कि अगर यही हालात रहे तो वर्ष 2021 तक प्रति एक हजार लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या सिर्फ 898 रह जाएगी।
बहरहाल, बेटियों के आत्मबल के लिए मध्यप्रदेश में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस बेटी बचाओ अभियान की कल्पना की थी वह साकार होकर शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली बालिकाओं को लाभ पहुंचा रही है। इससे एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है जो समाज को एक नए रास्ते पर ले जाएगी। लाडली लक्ष्मी योजना का आरंभ वर्ष 2007 में हुआ था। इसके अंतर्गत मध्यप्रदेश में अब तक 28 लाख 80 हजार कन्याएं लाभांवित हो चुकी हैं। इसी तरह लाडो, सुकन्या समृद्धि योजना सहित सेल्फी विद् डॉक्टर अभियान बालिका समृद्धि तथा नारी सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रही हैं। इस तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बेटियों की महत्ता को सवरेपरि मानकर न सिर्फ उनकी सुरक्षा और सम्मान का मार्ग प्रशस्त किया है बल्कि उनके अस्तित्व की रक्षा के उपाय भी किए हैं। लिंगानुपात को बराबरी पर लाने की दिशा में भी यह एक अभिनव प्रयास माना जा रहा है। मुख्यमंत्री अक्सर कहते हैं कि ‘बेटियों के बारे में समाज में पाई जाने वाली नकारात्मक सोच, लड़कों के मुकाबले उनकी कम होती संख्या, बालिका शिक्षा की कमजोर स्थिति, बेटियों को जल्द ब्याह देने की प्रवृत्ति जैसी समस्याएं मुझे हमेशा से कचोटती और झकझोरती रही हैं। उनके लिए कुछ सकारात्मक करने की तड़प मेरे मन में सदा से रही है। सौभाग्य से राज्य की बेटियों के लिए कुछ करने और अपनी सोच को अमलीजामा पहनाने का अवसर मुझे प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद मिला। मैंने बिना विलंब किए बालिकाओं के सर्वागीण विकास को सुनिश्चित बनाने वाली योजनाएं बनाने का निश्चय किया।’
पिछले दिनों एक सर्वे सामने आया था जिसके अनुसार दुनिया में जितनी भी महिला पायलट हैं उनमें सर्वाधिक संख्या भारतीय युवतियों की है। सिर्फ उड़ान का क्षेत्र ही नहीं बल्कि खेल तथा शिक्षा के क्षेत्र में भी बेटियां नित् नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। आवश्यकता तो उन्हें प्रोत्साहन तथा सुरक्षित माहौल देने की है। कन्या भ्रूण हत्या तथा बाल विवाह के अभिशाप को मिटाने के लिए सख्त कदम उठाने की आज नितांत आवश्यकता देखी जा रही है। बाल विवाह के मामले कभी कभार सामने आ जाते हैं। इस कुरीति से पूरी तरह निपटना ही होगा। कन्या भ्रूण हत्या का बड़ा कारण अशिक्षा और अंधविश्वास है। पहले की बात अलग थी लेकिन आज शिक्षित समाज में भी यह समस्या नासूर की भांति फैल रही है। सवाल है कि हमारा आधुनिक समाज आखिर किस दिशा में जा रहा है। कहना गलत न होगा कि आज भी हमारा शिक्षित समाज मध्यकालीन सोच से ग्रस्त है। अगर उच्च शिक्षित, संपन्न, शहरी लोग भी यह धारणा पाले बैठे हैं कि उनका वंश बेटे से ही चलेगा तो अनपढ़ और ग्रामीण परिवेश से जुड़े लोगों की सोच पर किस मुंह से सवाल उठाएं? जब तक हमारे दिलोदिमाग में बेटे से ही वंश चलने जैसी सोच बरकरार रहेगी, तब तक महज सरकारी योजनाओं के सहारे हालात सुधरने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
समाज में बेटियों को आगे बढ़ाने और महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के लिए सिर्फ सरकारी स्तर पर चलाई जाने वाली योजनाओं से काम नहीं होने वाला। अब समाज को अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी और ऐसा माहौल तैयार करना होगा, जो नारी शक्ति की राह में बाधा न खड़ी करे। महिलाएं आज हर क्षेत्र में अग्रणी बन रही हैं। यह पुरुषों के लिए गर्व की बात होनी चाहिए, मगर उच्च और विकसित सोच का दिखावा करने वाले पुरुषों को यह हजम नहीं हो रहा है। यह प्रवृत्ति जब तक हावी रहेगी, तब तक न तो समाज बदलेगा और न ही सरकार की योजनाएं अपना काम कर पाएंगी। जरूरत इस बात की है कि हम सभी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह को छोड़ें और खुद की सोच बदलें।

निलय श्रीवास्तव (वरिष्ठ पत्रकार)

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