पानी में मिल सकता है ईंधन


राजएक्सप्रेस, भोपाल। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने समुद्र के गर्भ में हाइड्रोजन गैस (Hydrogen Gas Fuel)का एक विशाल भंडार होने का अनुमान जताया है। समुद्र तल में मौजूद चट्टानों में इसके होने की संभावना है। हाइड्रोजन गैस का भंडार मिलने की स्थिति में ईंधन के इस्तेमाल के मौजूदा तरीके और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं। नि:संदेह समुद्र की सतह में हाइड्रोजन के विशाल भंडार मानव प्रजाति के लिए एक वरदान साबित हो सकते हैं। उम्मीद है कि वैज्ञानिक इस मिशन में जल्द सफल होंगे।
जी हां, पानी में आग मसलन पानी में ईंधन मिलने की वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है। शुरुआत में वैज्ञानिक खोजें अविश्वसनीय जरूर लगती है, लेकिन अंतत: ये हकीकत के रूप में सामने आकर मानव जीवन को सरल और सुविधायुक्त बनाने का ही काम करती हैं। अब इसी दिशा में अभिनव तलाश जारी है। समुद्र की तलहटी में भविष्य के ईंधन के रूप में हाइड्रोजन गैस बड़ी मात्रा में समाई हुई है। कहा जा रहा है कि इस गैस में अग्नि अंतर्निहित है। इसी आग को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने के उपाय वैज्ञानिक तलाश रहे हैं। अब अमेरिकी वैज्ञानिकों ने समुद्र के गर्भ में हाइड्रोजन गैस का एक विशाल भंडार होने का अनुमान जताया है। समुद्र तल में मौजूद चट्टानों में इसके होने की संभावना है। हाइड्रोजन गैस का भंडार मिलने की स्थिति में ईंधन के इस्तेमाल के मौजूदा तरीके और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं। वैसे भी इस समय पूरी दुनिया बढ़ती जा रही आबादी के फेर में स्वच्छ जल, उचित आहार तथा पर्यावरण के अनुकूल ईंधन व धरती के अलावा रहने लायक नए ग्रह तलाशने में लगी है। इस कड़ी में यदि समुद्र के भीतर हाइड्रोजन के बड़े भंडार उपलब्ध हैं व उन्हें ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना संभव हो रहा है तो यह ईंधन की समस्या से निदान की दिशा में एक उपयोगी खोज है।
अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार, समुद्र तल के नीचे टेक्टॉनिक प्लेट के फैलाव में आई तेजी के कारण बनी चट्टानों में मुक्त हाइड्रोजन गैस का विपुल भंडार होने की संभावना है। वैज्ञानिक भी पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत के लिए मुख्य रूप से हाइड्रोजन गैस की उपस्थिति को जिम्मेदार मानते हैं। समुद्र में हाइड्रोजन गैस मिलने पर जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला व पेट्रोलियम पदार्थो के स्थान पर इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। हाइड्रोजन गैस की यह खूबी है कि इसके दहन पर कॉर्बन का उत्सर्जन नहीं होता है। इसलिए यह उम्मीद भी जताई जा रही है कि इसका उपयोग शुरू होने पर ग्लोबल वार्मिग की गंभीर होती जा रही समस्या से निपटने में भी आसानी होगी।
शुरुआती अध्ययनों में टेक्टॉनिक प्लेट में मंद गति से फैलाव के कारण हाइड्रोजन गैस के निर्माण की बात कही गई थी। ताजा शोध इसके उलट है। नए अनुसंधन में समुद्र तल के नीचे हाइड्रोजन गैस की मात्रा को टेक्टॉनिक प्लेटों में फैलाव की गति और चट्टान की मोटाई के अनुपात में मापा गया है। वैसे भी वैज्ञानियों का यह मानना है कि ब्रह्मांड में मौजूद सभी तत्वों के द्रव्यमान की दृष्टि से लगभग 75 प्रतिषत सिर्फ हाइड्रोजन है। सभी तत्वों के कुल परमाणुओं में से करीब 90 फीसदी हाइड्रोजन परमाणु हैं। सभी मंदाकनियों, तारों और ग्रहों में हाइड्रोजन बड़ी मात्र में समाहित है। इनका निर्माण भी आणविक हाइड्रोजन से निर्मित गैसीय बादलों से हुआ है। तारों की चमक के रूप में जो ऊर्जा हमें दिखाई देती है, उसके उत्सर्जन में भी हाइड्रोजन के परमाणुओं की अहम भूमिका अंतनिर्हित रहती है। ऊर्जा के इस उत्सर्जन से हाइड्रोजन परमाणुओं का संलयन होता है, जिसमें हीलियम नामक तत्व के परमाणु बनते हैं। ब्रह्मांड का ज्यादातर हिस्सा निष्क्रिय हाइड्रोजन परमाणुओं से भरा है। लेकिन यह बड़ी मात्रा में जल व अन्य हाइड्रोकॉर्बन जैसे योगिकों के घटक के रूप में भी रहता है। जीव-जंतुओं में भी इसकी मौजदूगी आवश्यक रूप में रहती है। अनेक तरह के ऐसे सूक्ष्म जीव हैं, जो हाईड्रोजन पैदा करने की बड़ी क्षमता रखते हैं। वैज्ञानिकों ने समुद्र की गहराई में जीवित सूक्ष्म जीव खोजे हैं। ये जीव समुद्र की तलहटी में आग्नेय चट्टानों से बनी मिट्टी में जीते हैं। ये जीव पानी के भीतर कॉर्बन डाइऑक्साइड को कार्बनिक पदार्थ में बदलने के लिए हाईड्रोजन का उपयोग करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को कीमोसिथेंसिस कहते हैं।
डेनमार्क स्थित और्हस विवि के इकोलॉजिस्ट मार्क लीवर का मत है कि यदि इसी के समान सूक्ष्म जीव हर जगह पाए गए, तो यह परत धरती पर पहला बड़ा ऐसा परिस्थितिकी तंत्र होगा, जो सूर्य के प्रकाश की बजाय रासायनिक ऊर्जा से चलता है। इससे पता चला है कि समुद्र की गहराइयों के जैव-मंडल में अनॉक्सी सूक्ष्म जीवों की एक अच्छी-खासी आबादी है। वैज्ञानिकों की धारणा है कि जब टेक्टॉनिक प्लेटों का उठता लावा ठंडा होता है, तब ज्यादातर बेसाल्ट की नवर्निमित चट्टानें मोटी तलछट के नीचे दब जाती हैं। इन्हीं बेसाल्ट चट्टानों पर और इन्हें ढंकने वाली तलछट पर सूक्ष्म जीवों का संसार बस जाता है। इस तरह सतह पर सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति को प्रमाणित करने के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग 35 लाख वर्श पहले बने बेसाल्ट के नमूने एकत्रित किए। इन नमूनों में षोधार्थियों ने ऐसे सूक्ष्मजीवों के जींस पाए, जो गंधक के यौगिकों और हाइड्रोजन उपयोग करते हैं और कुछ ऐसे थे, जो मिथेन गैस उत्पन्न करते हैं। कुछ प्रयोगों से यह भी पता चला कि ये जींस जीवित सुक्ष्मजीवों के हैं। इन्हीं प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि समुद्र की सतह में हाइड्रोजन के विशाल भंडार मौजूद हैं, जो मानव प्रजाति के लिए एक वरदान साबित हो सकते हैं।
शोधार्थियों ने पाया है कि समुद्री सतह के बैक्टीरिया अत्यंत सूक्ष्म नैनो-तारों से एक-दूसरे से जुड़े व गुथे रहते हैं। इन महीन प्रोटीन-तंतुओं में इलेक्ट्रॉन का आदान-प्रदान भी हो सकता है। इस तरह बैक्टीरियाओं की पूरी आबादी एक महाजीव की तरह काम करती है। और्हस विश्वविद्यालय के पीटर निएल्सन और उनके दल ने यह खोज की, कि सूक्ष्मजीव लंबी दूरियों तक एक तरह विद्युतीय सहजीवों के समान रह सकते हैं। इसका कारण है कि कई सूक्ष्मजीव ऐसे हैं, जो हाइड्रोजन सल्फाइड नामक गैस का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा प्राप्त करते हैं। यह गैस समुद्र की गहराई में बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। हाइड्रोजन साल्फाइड का ऑक्सीकरण करने के लिए इन सूक्ष्मजीवों के लिए जरूरी होता है कि उन्हें समुद्री पानी में विलय ऑक्सीजन मिलती रहे, जो सल्फाइड के विघटन से उत्पन्न हुए इलेक्ट्रोन को ग्रहण करे। यही तरीका हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में बनाते वक्त शायद अपनाया जाए, ऐसी संभावना है?
अब यदि ऐसा संभव हो पाता है तो समुद्र की तलहटी में हाईड्रोजन के जो विशाल भंडार हैं, वे वाकई न केवल मानव-उपयोगी साबित होंगे, साथ ही धरती के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने का काम भी आश्चर्यजनक ढंग से करेंगे। समुद्र का जो खारा पानी अब तक आसानी से पीने लायक भी नहीं बन पाया है, उसके गर्भ में समाई हाइड्रोजन ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने लायक रूप में परिवर्तित कर ली जाती है, तो यह समुद्र की मनुष्य के लिए बड़ी देन होगी। उम्मीद है कि यह सफलता जल्द ही मानव प्रजाति के लिए सुलभ होगी।

प्रमोद भार्गव (वरिष्ठ पत्रकार)

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