ब्रिटेन में अकेलापन मंत्रालय बनाया गया, दुख-तकलीफ बांटने व अवसाद से लड़ने की लोगों के लिए सार्थक पहल की



हाल ही में ब्रिटेन में अकेलापन मंत्रालय बनाया गया। खुद अकेलेपन का दंश झेल चुकीं ट्रेसी क्राउच बागडोर संभालने वाली पहली मंत्री बनी हैं। यानी ब्रिटिश सरकार द्वारा एक मंत्रालय गठित कर आमजन के दुख-तकलीफ बांटने और अवसाद से लड़ रहे लोगों के लिए सहयोगी वातावरण बनाने की सार्थक पहल की गई है। दरअसल, ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से अलग होने के बाद से ही वहां अकेलापन चर्चा का विषय बना हुआ था। कुछ समय पहले आई एक रिपोर्ट ने यह बात पुख्ता की तो अकेलेपन से जूझ रहे लोगों के लिए ब्रिटेन की पीएम टरीजा मे ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया। गौरतलब है कि वर्ष 2017 की कमीशन ऑन लोनलिनैस की रिसर्च के मुताबिक, ब्रिटेन में 90 लाख से ज्यादा लोग सबसे ज्यादा या हमेशा अकेलापन महसूस करते हैं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि लगभग दो लाख बुजुर्गो ने महीने भर से भी ज्यादा वक्त से किसी दोस्त या करीबी से बात नहीं की। ध्यान देने वाली बात यही थी कि ऐसा अक्सर होता रहता है, जिसका नतीजा कई गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आता है। इस रिपोर्ट के अनुसार, अकेलापन लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव डालता है। यह एक दिन में 15 सिगरेट पीने जितना खतरनाक है। आंकड़े बताते हैं कि 75 साल की उम्र के आधे लोग ब्रिटेन में अकेले रहते हैं और दस में से एक गंभीर रूप से अकेलेपन का शिकार हैं। अकेलेपन की गिरफ्त में आने वाले लोगों को हो रहे शारीरिक-मानसिक नुकसान की ये चेताने वाली बातें हैं। इसीलिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री टरीजा का कहना है कि मैं अपने समाज के लिए इस समस्या का सामना करना चाहती हूं।
गौरतलब है कि अकेलेपन की इस भयावहता की ओर सांसद जो. कॉक्स ने पूरे ब्रिटेन का ध्यान खींचा था। उन्होंने आयोग गठित कर इस समस्या का आकलन एवं इसे दूर करने के उपाय ढूंढने की शुरुआत की थी। इसी आयोग ने अकेलापन मंत्रलय गठित करने का सुझाव दिया, जो अवसाद और तनहाई से जूझ रहे लोगों के लिए हेल्पलाइन भी बनाएगा। दरअसल, ब्रिटेन ही नहीं दुनिया के हर देश के नागरिकों के लिए अकेलापन दंश बनता जा रहा है। अकेलापन, आज दुनिया के हर हिस्से में बसे समाज की कड़वी सच्चाई है। हालिया कुछ सालों में तो अकेलापन बहुत तेजी से बढ़ा है। सब कुछ सिमटने के इस दौर में यह एकाकीपन का दंश विस्तार पा रहा है। हर उम्र, हर क्षेत्र से जुड़े लोग इसकी गिरफ्त में हैं। आज के दौर की जीवनशैली और बेपनाह जरूरतों के लिए हो रही भागमभाग, दोनों ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टरीजा ने कहा भी है कि आधुनिक जिंदगी का खामियाजा बहुत से लोग अकेलेपन के रूप में भुगत रहे हैं। हम मिलकर इस चुनौती का सामना कर सकते हैं और ऐसे लोगों की मदद कर सकते हैं, जो किसी भी वजह से खुद को अकेला मान बैठे हैं। यकीनन बदलते सामाजिक-पारिवारिक परिवेश में ऐसी मदद की दरकार दुनिया के हर हिस्से में है। तनहाई ने सभी को अपने घेरे में जकड़ रखा है, जिसका अगला पड़ाव शारीरिक व मानसिक व्याधियों से घिर जाना है। आमतौर पर माना जाता है कि अकेलापन मानसिक अस्वस्थता का ही कारण बनाता है, लेकिन अब कई शोध यह बात सामने ला रहे हैं कि इससे शारीरिक व्याधियां भी जड़ें जमाती हैं। शिकागो विश्वविद्यालय में मनोवैज्ञानिकों ने देखा कि सामाजिक रूप से अलग-थलग लोगों की प्रतिरोधक क्षमता में बदलाव हो जाता है।
कभी विकसित देशों के समाज की समस्या मानी जाने वाली वाली ऐसी सामाजिक व मनोवैज्ञानिक समस्याएं अब हमारे परिवेश में भी देखने को मिल रही हैं। सामाजिक अलगाव के हालत ऐसे हो चले हैं कि बुजुर्ग ही नहीं युवा भी इसकी चपेट में हैं। मौजूदा समय में बड़ी संख्या में युवा अपना भविष्य बनाने के लिए घर-परिवार और अपनों से दूर जाकर रह रहे हैं। वे भी अकेलेपन और अवसाद से जूझ रहे हैं, जिसके चलते युवाओं में जिंदगी से हारने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, समूची दुनिया में हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है और वैश्विक स्तर पर आत्महत्या करने वालों में ज्यादातर 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग युवा हैं। भारत में कुछ समय पहले अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा करवाए गए सर्वे में भी यही सामने आया था कि आत्महत्या करने वाले लोगों में अधिकतर 15 से 35 आयु वर्ग के लोग हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या है छात्रों की। जिन पर इस आयु में रोजगार पाने और स्वयं का सिद्ध करने का कहा-अनकहा दवाब होता है। इतना ही नहीं युवाओं का एक बड़ा प्रतिशत ऐसा भी है, जो शिक्षित है, सफल है पर अवसाद और अकेलेपन के चलते आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा है। जो कहीं न कहीं एकाकीपन की ही उपज है। सुख-दु:ख साझा करने का भाव भी अब किसी आयु वर्ग में नहीं दिखता।
सामाजिक संबंधों की बिगड़ती रूपरेखा और तकनीक ने मिलकर अकेलेपन को बढ़ावा दिया है। आभासी संसार की दिखावटी दोस्ती और अनर्गल संवाद ने हालात और विकट कर दिए हैं। बड़ी पीढ़ी के लिए तो स्थितियां और भी तकलीफदेह हैं। दुनिया भर में अकेलेपन के सबसे ज्यादा शिकार बुजुर्ग ही हैं। यह हमारे लिए भी चिंता का विषय है क्योंकि युवा देश कहे जाने वाले भारत में भी बुजर्गो की संख्या कम नहीं है। अनुमान के मुताबिक 2050 तक हमारी कुल जनसंख्या का चौथाई हिस्सा बुजुर्ग लोगों का ही होगा। भारत में साल 2026 तक वरिष्ठजनों की आबादी 10. 38 करोड़ से बढ़कर 17. 32 करोड़ हो जाने का अनुमान है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र ने भी इस विषय पर कई बार कहा है कि समय के साथ दुनियाभर में बुजुर्गो का अनुपात बढ़ता जाएगा। इसीलिए सरकारों को जीवनयापन व देखभाल के संबंध में नए विकल्पों और उपायों पर गौर करना होगा। एक ओर युवा अपनी और अपनों की उम्मीदों के बोझ तले अकेले हो रहे हैं वहीं, असुरक्षा और अकेलेपन को झेल रही बड़ी पीढ़ी सामाजिक बिखराव का खामियाजा भी भोग रही है।
खासकर महानगरों में तो स्थिति और भयावह है। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें किसी बुजुर्ग की मौत हो जाने के महीनों बाद भी आस-पड़ोस के लोगों को खबर तक नहीं होती। कई चर्चित चेहरों की खबरें भी सुर्खियां बनती हैं कि वे कैसे जीवन में अकेलेपन से लड़ रहे हैं या जीवन के आखिरी पड़ाव में एकाकीपन से जूझते हुए ही दुनिया से विदा हुए। अकेलेपन के चलते भावनात्मक टूटन की परिस्थितियां ऐसी हैं कि चिकित्सकों के पास ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है जो अपनों से संवाद को तरस जाते हैं। कभी सामाजिक मेलजोल और पारिवारिक जुड़ाव के लिए दुनियाभर में पहचान रखने वाले भारत में भी अब अकेलेपन की समस्या गंभीर होती जा रही है। अब देखने में आ रहा है कि करीबी रिश्तों में भी ऐसी दूरियां और औपचारिकता आ गई है। इसीलिए आज उम्रदराज लोग ही नहीं युवाओं का भी एक बड़ा प्रतिशत स्वयं को समाज से कटा हुआ महसूस करता है, जबकि सहअस्तित्व एवं आपसी सम्मान की सोच के साथ पीढ़ियों का साथ रहना, हमारे यहां साधारण सी बात रही है। एकाकीपन के ऐसे हालात नैराश्य को जन्म देते हैं। अवसाद और दूसरी मनोवैज्ञानिक समस्याएं जड़ें जमा लेती हैं। इन परिस्थितियों में ब्रिटेन में की गई नई व्यवस्था भारत समेत पूरी दुनिया के लिए आदर्श है।

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