अवसर मिलने में गोरे रंग की भूमिका, लेकिन अब इस जटिल समस्या से बाहर आना जरूरत बन गई




अमेरिका-यूरोप में एक समय में रंग भेद अपने चरम पर था। वहां अफ्रीकी देशों से काले रंग के लोगों को गुलामी करने के लिए लाया जाता था। उन्हें तरह-तरह की प्रताड़नाएं दी जाती थीं, पशुओं की तरह मारा-पीटा जाता और बाकायदा बाजार में खड़ा कर के नीलाम किया जाता था, लेकिन अब सैद्धांतिक तौर पर वहां से रंग भेद लगभग खत्म हो चुका है। यह भी माना जाता है कि भारत में रंग भेद है ही नहीं, लेकिन यह बात सच नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि हमारे समाज में हमेशा से रंग भेद रहा है और यह भेद अब भी कायम है, पर हम और हमारा समाज इस सच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, जबकि विज्ञापन की दुनिया से लेकर सिनेमा, सियासत, मॉडलिंग के क्षेत्र में काबिलियत के बजाय गोरे रंग को अब भी अत्याधिक महत्व दिया जाता है। विज्ञापन की दुनिया में चाहे प्रिंट हो या फिर टीवी दोनों में गोरी महिलाओं को ही प्रमुखता दी जाती है। आपको अभिनेत्री यामी गौतम का विज्ञापन तो याद ही होगा, जिसमें वह मात्र कुछ ही दिनों में क्रीम से गोरा होने की बात कहती हैं। वहीं यह विज्ञापन भी उनके जैसे गोरे रंग वाली अभिनेत्री से ही कराया जाता है, लेकिन चर्चा केवल इस विज्ञापन की ही क्यों की जाए। काले और सांवले इंसान को गोरा बनाने का दावा करने वाली तमाम चीजें बाजार में बिक रही हैं और इन चीजों को बनाने वाली कंपनियां अरबों—खरबों रुपयों का कारोबार करती हैं। ऐसा हो भी क्यों न, जब समाचार पत्रों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों, वेबसाइट्स और पंजीकृत विवाह संस्थाओं में भी लड़की के रंग के बारे में विशेष तौर पर पूछा जाता है। जबकि प्रतिभा का रंग से कोई लेना देना नहीं है।
अगर मॉडलिंग के क्षेत्र की बात करें तो वहां हाल ही में काले रंग की मॉडल ने सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरीं। दरअसल, काले रंग की वजह से इसे ब्लैक बार्बी के नाम से बुलाया जाता है। लोलिता नाम की इस मॉडल का रंग काला होने के बावजूद सोशल मीडिया पर उसके लाखों फॉलोवर्स हैं। अमेरिकी-अफ्रीकी मॉडल हेना मोंटाना की तरह लोलिता भी देखने में खूबसूरत हैं, जिनसे लोगों की नजरें हटती नहीं हैं। लेकिन हमारे देश में अब भी श्वेत वर्ण वाली मॉडल को पहले अवसर दिया जाता है। यही कहानी फिल्मी दुनिया की है। हिंदी फिल्मों में सांवली और गहरे रंग की अभिनेत्रियों को उनका रंग गोरा करके दिखाया जाता रहा है। रेखा, तनूजा, जया बच्चन, हेमामालिनी और जयाप्रदा के साथ श्रीदेवी अपने दौर की सुपरहिट अभिनत्रियों में शुमार रही हैं। ये चारों ही अभिनेत्रियां दक्षिण भारत की थीं, जिसकी वजह से इनका रंग काफी गहरा था। इसलिए निर्माता और निर्देशक इनकी बेहतरीन अदाकारी के साथ इन्हें फिल्मी पर्दे पर काफी गोरा करके दिखाते थे। 90 के दशक से अब तक रानी मुखर्जी और काजोल और बिपाशा तीनों बंगाली ब्यूटीज ने एक से बढ़कर एक हिट फिल्में दी हैं। लेकिन इन्हें भी अपने रंग के चलते कई बार रंग भेद का शिकार होना पड़ा है। अब तो बॉलीवुड की तरह ही राजनीति का क्षेत्र भी ग्लैमर से अछूता नहीं रहा है। यहां भी गोरे रंग का ही दबदबा दिखता है। समाचार चैनलों में कई राजनीतिक हस्तियां चर्चा के लिए शो में आती हैं, जिसमें विभिन्न दलों की खूबसूरत महिला प्रवक्ताएं भी दिखाई देती हैं। मानंे या न मानें लेकिन यहां भी प्राय: गोरे रंग वाली और खूबसूरत महिलाओं को ही पहले अवसर दिया जाता है। कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी और रागिनी नायक इसका उदाहरण हैं।
वहीं इस क्षेत्र में राजनीतिक सूझबूझ के साथ गोरा रंग प्राथमिकता है। असम की भाजपा नेता अंगूरलता डेका, मिस. इंडिया क्वीन व भाजपा नेता रूबी यादव, शायना एनसी, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, शाजिया इल्मी, अलका लांबा, कांग्रेस सोशल मीडिया सेल की नई हेड दिव्या स्पंदन उर्फ राम्या पार्टी के मुख्य चेहरे के रूप देखी जा सकती हैं। हालांकि, इनमें प्रतिभा की भी कमी नहीं है। लेकिन कनिमोझी एवं रूपा गांगुली में भी तो प्रतिभा की कमी नहीं है। क्या ममता बनर्जी और मायावती कम प्रतिभाशाली हैं? स्वर्गीय जयललिता भी गोरी नहीं थीं, मगर उनकी प्रतिभा के आगे अच्छे-अच्छे नहीं टिकते थे। मतलब प्रतिभा का रंग से कोई मतलब ही नहीं है, फिर भी आजकल सोशल मीडिया का चलन चरम पर है। यूट्यूब, फेसबुक, वाट्सअप, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे माध्यमों पर कई संस्थाएं और कारोबारी खूबसूरत व गोरी महिलाओं से अपने डिजिटल उत्पादों का प्रचार-प्रसार करते हुए दिख जाएंगे। मीडिया में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है। टीवी पर बुलेटिन पढ़ने वाली एंकर में से ज्यादातर को डार्क मेकअप करके कैमरे के सामने अत्याधिक गोरा बनाकर दिखाया जाता है। क्रिकेट का आधुनिक अवतार कहे जाने वाले आईपीएल का भी अब यही हाल है। आईपीएल के मैचों में आपने चीयर लीडर्स तो देखी ही होंगी, आपको इनमें से एक भी गहरे और काले रंग की नहीं दिखी होगी। आईपीएल से सबसे अधिक खिलाड़ियों और खेल संस्थाओं को ही फायदा होता है, ऐसे में वह इस खेल को ग्लैमर से पूरा भर देते हैं।
बहरहाल, यह सर्वविदित है कि देश में राम से लेकर कृष्ण और शिव से लेकर माता काली सभी का श्याम वर्ण हैं और श्रद्धालु भी इन्हें पूरी श्रद्धा के साथ पूजते हैं, लेकिन पुरुषों की तुलना में यहां महिलाओं से रंग को लेकर काफी भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जाता है। हाल ही में एक महिला का रंग काला होने के कारण उसके पति ने उसे तलाक दे दिया, लेकिन पितृसत्तात्मक इस समाज में रंग को ताक पर रखकर प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण जैसी अभिनेत्रियों ने देश के साथ विदेश में भी अपनी कामयाबी का लोहा मनवाया है। वहीं सेरेना विलियम्स और मिशेल ओबामा हैं, जिन्होंने एक मिसाल कायम की है कि रंग नहीं काम का महत्व होता है। दुनिया की सबसे बड़ी मीडिया शख्सियत ओपरा विनफ्रे भी काली ही हैं। चूंकि, रंगभेद बाजारवाद से गहरा प्रभावित है। इसलिए सोशल मीडिया और टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में गोरे रंग को ही सुंदरता का पैमाना माना जाता है। कहा जाता है कि हर विज्ञापन में संदेश छिपा होता है, लेकिन बाजारों में काले से गोरा बना देने वाले उत्पादों और विज्ञापनों को गलत तरीकों दिखाने की वजह से काले रंग के लोग हीनभावना का शिकार होते हैं। इन्हें देखने के बाद कहीं न कहीं आत्मविश्वास डगमगाने लगता है।
भारत अब चांद पर पहुंच गया है। आधुनिकता के युग में वह कई बड़े देशों को भी पीछे छोड़ चुका है। इसके बावजूद शिक्षित लोगों में काले व गोरे रंग में भेदभाव किया जाता है। न केवल प्रदर्शन संबंधित क्षेत्र इससे प्रभावित होते हैं, बल्कि ग्रामीण और शहरी इलाकों में भी विवाह व नौकरियों में अड़चनें पैदा होती हैं। दरअसल, सौंदर्य का रंग से कोई सरोकार नहीं होता है। यह तो हर देश की जलवायु और वहां के खान—पान पर ही निर्भर करता है। जैसे अफ्रीका की जलवायु के अनुसार वहां काले रंग के लोग ज्यादा होते हैं, वहीं ब्रिटेन, अमेरिका और इंग्लैंड में गोरे रंग के लोग होते हैं। लेकिन बाजारों में गोरे रंग को ही सुंदरता का पर्याय माना जाता है। विभिन्न उत्पादों के माध्यम से बाजार के जरिए लोगों का आर्थिक दोहन भी किया जा रहा है, जिससे भारतीय समाज को बाहर आना होगा। खैर, काबिलियत रंग से नहीं काम से तय होती। आज के युग में रंग भेद एक मानसिक समस्या है, जिससे मुक्ति के बिना समाज का समग्र विकास संभव नहीं है। रंग के मकड़जाल से सभी को बाहर आना ही होगा।

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