लव जिहाद को पीछे छोड़ें हम, उम्मीद है कि फैसले के बाद अब विवाद नहीं होगा



केरल के लव जिहाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए हादिया उर्फ अखिला अशोकन के निकाह को फिर से बहाल कर दिया है। देखा जाए तो समाज में लव जिहाद की परिकल्पना ही बेफिजूल है। उम्मीद है कि फैसले के बाद अब विवाद नहीं होगा। केरल के लव जिहाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए हादिया उर्फ अखिला अशोकन के निकाह को फिर से बहाल कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को भी पलट दिया है, जिसमें शादी की वैधता को रद्द किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हादिया अब अपने पति शफी के साथ रह सकेंगी।
कोर्ट ने कहा कि हादिया अपनी पढ़ाई जारी रख सकती है और जो वह चाहती हैं कर सकती हैं। वहीं कोर्ट ने कहा कि एनआईए इस मामले से निकले पहलुओं की जांच जारी रख सकता है। 23 जनवरी को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए को हदिया की शादी की वैधता की जांच करने पर रोक लगा दी थी। पिछले साल हादिया ने मुस्लिम धर्म अपनाकर शफी जहां नाम के शख्स से निकाह कर लिया था, जिस पर लड़की के पिता अशोकन ने इस मामले को लेकर कोर्ट में गुहार लगाई थी।
तब केरल हाईकोर्ट ने इसे लव जिहाद का मामला मानते हुए शादी को रद्द कर दिया था। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुना दिया है, तो हादिया के बहाने लव जिहाद पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है। दरअसल, केरल की अखिला का मुस्लिम युवक शफी जहां से प्रेम विवाह और फिर अखिला से धर्म बदल कर हादिया बन जाना कुछ लोगों के लिए धर्म के नाम पर घर-घर में घुस कर पेट्रोल डालने जैसा काम कर गया था। इस प्रेम और विवाह को लव जिहाद का नाम दे कर उन्होंने इतना हो-हल्ला कर डाला है।
पहले केरल उच्च न्यायालय और बाद में सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना पड़ा कि इन दोनों का क्या किया जाए। दरअसल, लव जिहाद एक बेहूदी बात है और शादियां केवल पंडे और मौलवियों के हाथों अपने धर्म या जाति वालों के साथ ही हो सकती हैं के रिवाजों को कायम रखने के लिए की जा रही हैं। अब हल्ला मचाया जा रहा है कि मुस्लिम युवक हिंदू लड़कियों को प्रेम के जाल में फंसा कर मुसलमानों की गिनती बढ़ाने में लगे हैं ताकि एक दिन भारत मुसलमानों का देश हो जाए। यह मामला तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर पहुंचना ही नहीं चाहिए था।
यही कट्टरपंथियों को ताकत देता है। हादिया के मामले से पूरे देश में यह संदेशा तो चला ही गया है कि दूसरे धर्म वाले से प्रेम और शादी करोगे तो हंगामा मचेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सब बातें भले ही स्पष्ट कर दी हों, मगर आने वाले दिनों में एक और हादिया जैसा मामला सामने आएगा ही, क्योंकि समाज में जिस तरह की परिपाटी बना दी है, वह व्यक्ति को धर्म और जाति से अलग कर ही नहीं पा रही है। शादी-विवाह की बात होते ही सबसे पहले जाति-धर्म का बंधन आड़े आ जाता है। लेकिन अब समाज को इन फिजूल की बातों से ऊपर उठकर सोचना ही होगा।

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