नशे में तब्दील हो गया सोशल मीडिया


राजएक्सप्रेस, भोपाल। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने वहां की निचली अदालतों के न्यायाधीशों व कर्मचारियों को अदालत की कार्य-अवधि के दौरान सोशल मीडिया का प्रयोग न करने का निर्देश दिया है। यह व्यवस्था बेहद उम्दा है। दूसरे राज्यों को भी इसी तरह की पहल करते हुए नियम बनाने चाहिए। यही एकमात्र रास्ता है, जो लोगों को सोशल मीडिया (Social Media Intoxication)से दूर रख सकता है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने वहां की निचली अदालतों के न्यायाधीशों व कर्मचारियों को अदालत की कार्य-अवधि (वर्किग ऑवर) के दौरान सोशल मीडिया का प्रयोग न करने का निर्देश दिया है। इसमें कहा गया है कि न्यायाधीश समेत अन्य कर्मचारी अदालती कामकाज के दौरान मोबाइल आदि पर सोशल साइट्स न देखें। हालांकि, इस दौरान बहुत जरूरी होने पर परिवार से बात करने के लिए उन्हें इंटरनेट के इस्तेमाल की छूट अवश्य दी गई है। इस निर्देश का अनुपालन न करने वालों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने संबंधी नियम भी निर्धारित कर दिया गया है। यह निर्देश पंजाब, हरियाणा व चंडीगढ़ की जिला अदालतों के लिए जारी किए गए हैं। ज्ञात हो कि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में यह नियम पहले से ही लागू है। लेकिन सवाल यह है कि उच्च न्यायालय को इस प्रकार का नियम लागू करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हमें मौजूदा सोशल मीडिया के स्वरूप और इसके प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण पर एक दृष्टि डालनी होगी।
दरअसल, वर्तमान दौर सोशल मीडिया का है। चाहे सरकारी कार्यक्षेत्र से संबद्ध लोग हों या निजी क्षेत्र से, वे फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल साइट्स से जुड़ने और उन पर सक्रिय होने में कतई पीछे नहीं रह रहे हैं। सोशल मीडिया आज अभिव्यक्ति और संवाद का एक ऐसा माध्यम बन गया है, जिसके जरिए देश-विदेश में घट रही प्रत्येक घटना पर तुरंत प्रतिक्रियाओं से लेकर अपने मनोभावों और निजी जीवन की झलकियों तक, लोग हर विषय पर स्वयं को अभिव्यक्त कर रहे हैं। साहित्य, सिनेमा, राजनीति, दर्शन, प्रेम और धर्म आदि जिस विषय में व्यक्ति की रुचि है, उस विषय के लोग सोशल मीडिया पर बड़े जोर-शोर से सक्रिय हैं और वे स्वयं को अभिव्यक्त कर रहे हैं। खास बात यह है कि सोशल मीडिया पर व्यक्ति को अपनी बात पर प्रतिक्रिया इतनी शीघ्र प्राप्त होती है कि वह स्वयं को अभिव्यक्त करने से नहीं रोक पाता। इस प्रकार की कई अच्छाइयों के साथ इसकी कुछ बुराइयां भी हैं। इसका प्रयोग तब तक ठीक है, जब तक यह एक नशे का रूप न ले। यदि इसने नशे का रूप ले लिया तो चिंता की बात है। अकसर यह तब नशे का रूप ले लेता है, जब व्यक्ति के पास इंटरनेट की उपलब्धता हमेशा हो। ऐसे में पोस्ट डालना और उसके बाद मिनट-मिनट पर उस पर आए पसंद व टिप्पणियों को चेक करना, इस नशे के सब से बड़े लक्षण हैं। इससे बचने की जरूरत होती है। लेकिन आज के समय में इंटरनेट की उपलब्धता होने से अधिकांश लोगों के लिए इस नशे से खुद को बचाए रखना बहुत मुश्किल है।
यह एक वास्तविकता है कि मौजूदा दौर में अधिकांश सरकारी कार्यालयों में इंटरनेट होता है। इसी कारण कार्य-अवधि में भी वहां के कर्मचारी कंप्यूटर व इंटरनेट उपलब्ध होने पर अपना लंबा समय सोशल साइट पर बिताते हैं। ये संसाधन सुलभ न होने पर वे अपने मोबाइल के जरिए सोशल साइट्स पर सक्रिय रहते हैं। इस वजह से कार्यालयीन काम से उनका ध्यान भटकता है, जिससे अकसर उनके कार्य की गुणवत्ता पर भी अत्यंत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। एक पक्ष यह भी है कि कार्य के दौरान व्यक्ति के समक्ष अनेक प्रकार की चुनौतियां और समस्याएं होती हैं, जिन से उसे जूझना पड़ता है। इस दौरान व्यक्ति को विभिन्न प्रकार की मनोदशाओं से गुजरना होता है। तिस पर न्यायालयों की कार्यप्रणाली तो वैसे भी अत्यंत सजग और सतर्कता की अपेक्षा करती है। अनगिनत धाराएं, अनेक अनुच्छेद और विविध मामलों से भरी इस अदालती जटिल कार्यप्रणाली में जरा-सा ध्यान हटा नहीं कि धारा कुछ होगी और न्यायाधीश मामला कुछ और समझ बैठेंगे। यह भी संभव है कि अदालत का कोई कर्मचारी ही सोशल मीडिया पर अदालती कार्यवाही से जुड़ी कोई ऐसी बात साझा कर दे, जिसे सार्वजनिक नहीं होना चाहिए, तो अलग समस्या खड़ी हो सकती है।
संभवत: इन्हीं सब बातों के मद्देनजर पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने निचली अदालतों के लिए यह निर्देश जारी किया है। पहल अच्छी है, सो अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों को भी अपने यहां ऐसी ही पहल करनी चाहिए। फिर, अदालतें ही क्यों, अन्य सरकारी दफ्तरों जैसे- बैंक, बीमा, रेलवे पुलिस थानों आदि और प्रशासनिक सेवाओं के दफ्तरों में भी इस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकार चाहे तो इसके लिए तकनीक की सहायता भी ले सकती है। इस बारे में निजी क्षेत्र से सीख लेने की जरूरत है, जहां कई ऐसी कंपनियां हैं, जिन्होंने अपने कर्मचारियों को दिए कंप्यूटरों पर सोशल साइटों को ब्लॉक कर रखा है। इससे इंटरनेट होते हुए भी वहां कर्मचारी सोशल साइटों पर समय नहीं दे पाते। यही वजह है कि निजी क्षेत्र में कार्य को लेकर कर्मचारी एकदम मुस्तैद हैं व कार्य की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
हरियाणा-पंजाब हाईकोर्ट का यह हालिया निर्देश एक उदाहरण की तरह है, जिसका राष्ट्रीय स्तर पर सरकारी दफ्तरों में जैसे भी संभव हो, अनुसरण किया जाना चाहिए। असर यह होगा कि सरकारी अमला सोशल मीडिया के नशे से बचा रहेगा एवं कार्य में भी व्यवधान पैदा नहीं होगा। सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है, लेकिन अब तक ऐसी व्यवस्था नहीं बन पाई है कि इस पर किसी तरह की रोक लगाई जा सके या फिर दायरा सीमित किया जा सके। सोशल मीडिया से होने वाले नकारात्मक परिणामों के प्रति हमें सतर्क रहना होगा और युवाओं और बच्चों को इस बीमारी से बचाना होगा। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से होने वाले नुकसान को लेकर चर्चा तो बड़े पैमाने पर होती है, मगर इस दिशा में अब तक ऐसी कवायद होती नहीं दिखी है, जिससे यह कहा जा सके कि अब लोग फेसबुक या फिर वाट्सअप पर अपना कीमती समय बर्बाद नहीं करेंगे। सोशल मीडिया के चलते अब लोग अपना दिन तो खराब कर ही रहे हैं, रात की नींद भी पूरी नहीं ले पा रहे हैं। सोशल मीडिया के नशे में डूबे लोगों को अब भी अगर काम पर नहीं लगाया गया, तो सही नहीं होगा।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने जो व्यवस्था अपने यहां की है, उससे सीख लेते हुए दूसरे राज्यों को भी पहल करनी होगी और ऐसा नियम बनाना होगा कि लोग न सिर्फ दफ्तर बल्कि दूसरी जगहों पर भी सोशल मीडिया के नशे से दूर रहें। सरकार को सोशल मीडिया पर सख्ती के लिए निगरानी तंत्र बनाना होगा।

डॉ.पीयूष द्विवेदी (वरिष्ठ पत्रकार)

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