देश में लंबे समय से जारी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला



Wish Death:- देश में लंबे समय से जारी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कई शर्ते भी लगाई हैं। वैसे, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की सख्त निगरानी की भी जरूरत है, ताकि इसका दुरुपयोग न किया जा सके। हमारे देश की परंपरा और संस्कृति जीवन रक्षा की रही है। कहा तो यह भी जाता है कि जब हम किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे मारने का अधिकार भी नहीं है। समय-समय पर बीमार व्यक्तियों के लिए इच्छा-मृत्यु यानी बिना कष्ट के मरने के अधिकार की मांग उठती रही है।
दुनिया के कुछ देशों में मरीज की मंजूरी के बाद ऐसी दवाइयां दी जाती हैं, जिससे मरीज की मौत हो जाए, परंतु भारत में इसे मान्यता नहीं है। ऐसे मरीजों को जो मौत की मंजूरी देने में असमर्थ हो, उसे मारने के लिए दवाइयां देना भी हमारे यहां पूरी तरह से गैर-कानूनी है और अपराध है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला दिया है, जिसके बाद भारत भी उन देशों में शुमार हो गया, जहां लिविंग विल यानी इच्छा मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत को मंजूरी मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी दे दी है कि मनुष्य को सम्मानपूर्वक जीने के साथ-साथ इसे समाप्त करने का अधिकार भी है। हालांकि, कोर्ट ने इस संबंध में कुछ दिशा-निर्देश भी तय किए हैं, जिसका अर्थ यह है कि कोई भी यूं ही अपना जीवन समाप्त नहीं कर सकता। पैसिव यूथेनेशिया शब्द का आम तौर पर अर्थ किसी मरीज से ऐसे मेडिकल उपचार को जानबूझकर हटा लेना होता है, जो उसके जिंदा रहने के लिए जरूरी होता है। यदि किसी मरीज को किडनी डायलिसिस की जरूरत है, तो डॉक्टर डायलिसिस मशीन हटा लेते हैं।
जिससे जल्द ही मरीज की मौत हो जाती है। यह एक्टिव यूथेनेशिया या यूथेनेशिया से बिल्कुल अलग होता है, जिसमें मौत के लिए किसी घातक पदार्थ का इस्तेमाल होता है। वैसे तो इसे हत्या के तौर पर आपराधिक माना जाता है, लेकिन स्वेच्छापूर्वक पैसिव यूथेनेशिया को दुनिया के कई देशों में आपराधिक नहीं माना जाता। मरीज की सहमति से की जाने वाली यूथेनेशिया को वॉलन्टरी यूथेनेशिया कहा जाता है और यह बेल्जियम, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड्स और स्विट्जरलैंड जैसे देशों के साथ-साथ अमेरिका के ओरेगन व वाशिंगटन में भी वैध है।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था वह निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर कानून बनाने की दिशा में काम रही है। केंद्र ने कोर्ट को बताया था कि मामले में गठित की गई कमेटी ने विशेष परिस्थितियों में पैसिव यूथेनेशिया (कोमा में पड़े मरीज का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने) को भी सही बताया है, लेकिन लिविंग विल का सरकार समर्थन नहीं करती।
वैसे, सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्यवस्था पर सही तरह से निगरानी नहीं की गई तो दुरुपयोग होने की आशंका बनी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने खुद आशंका जाहिर की थी कि आजकल मध्यम वर्ग में वृद्धों को बोझ समझा जाने लगा है। ऐसे में उन्हें उनके संबंधी इच्छा मृत्यु दे सकते हैं। सरकार इस दिशा में जो कानून बना रही है, उसे कई मानकों पर परखने की जरूरत है, ताकि समाज में इच्छा मृत्यु को लेकर किसी तरह की विपरीत परिस्थिति का सामना न करना पड़े।

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