सोशल मीडिया की अर्थहीन बहसें, बेमतलब की बहसों में उलझने से बेहतर कि हम अपना दायरा समझें
हाल ही में विशाखापत्तनम में एक मानसिक रूप से विमंदित महिला के साथ खुलेआम फुटपाथ पर बलात्कार किया गया। इस शर्मनाक घटना के दौरान लोग उस राह से आते-जाते रहे, वीडियो बनाते रहे। लेकिन किसी ने उस विक्षिप्त महिला की मदद नहीं की। यह वायरल वीडियो समाचार चैनलों की खबर बना। लेकिन आभासी दुनिया में कोई हलचल नहीं दिखी। आभासी दुनिया में मन को उद्वेलित करने वाले इस वाकए को लेकर हलचल न होने से ढेरों सवाल उठना लाजमी है, क्योंकि सोशल मीडिया में अब महिलाओं की समस्याओं एवं शोषण को लेकर सार्थक ढंग से आवाज उठाने के बजाय परंपरा व प्रगतिशीलता का खेल ज्यादा हो रहा है। इन मुद्दों में स्त्री विमर्श की बातें कहीं दबकर रह गई हैं। मुखर हो मन की बात कहने के लिए मिला सोशल मीडिया का मंच अब चयनात्मक टिप्पणियों का अखाड़ा भर बन गया है। अब यहां स्त्री जीवन से जुड़ी समस्याओं से ज्यादा विमर्श पर्व-त्योहारों का उपहास करने और नकारात्मक माहौल बनाने में हो रहा है। विचार साझा करने के इन मंचों पर भाषाई अभद्रता के साथ ही चयनात्मक विचारों की अभिव्यक्ति पूरे माहौल को विद्रूप बना रही है। कभी करवा चौथ को लेकर तो कभी किसी और ...