सामाजिक बंधनों एवं परंपराओं के बारे में सोच के हों टीवी सीरियल
दृश्य साधन मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालते हैं, इसी कारण सामाजिक मनोविज्ञान के तार भी इससे गहरे जुड़े हुए दिखाई देते हैं। सामाजिक मनोविज्ञान में संस्कार और पुरातन जकड़न इतनी गहरी बैठी है कि वर्चस्ववादी ताकतों और मानसिकता को हवा देने वाली स्थितियों को समाज सहज ही अपने में आत्मसात कर लेता है। टेलीविजन और उसमें आने वाले ऐसे धारावाहिक इसी मानसिकता को हवा देते हैं। यह मंच कई प्रसंगों में घर-घर की कहानी और परंपराओं की दुहाई के नाम पर ही सामाजिक जड़ मान्यताओं को बढ़ावा देता रहा है। कुछ नया करने की आड़ में ये शो कभी अतिमानवीय कथानकों को पकड़ते हैं, तो कभी जड़ मान्यताओं को हवा देते हैं। कभी ये इतिहास के झरोखों से केवल ऐसे ही प्रसंगों को चुनते हैं, जो महज भूलों से स्मृति में जमे रहते हैं तो कभी किसी कुप्रथा को ही आभिजात्य और सामंती रंग देकर विलासिता को बढ़ावा देते प्रतीत होते हैं। वर्तमान में ऐसे कथानक टीवी सीरियल्स में बढ़ गए हैं, जो घर की भीतरी संस्कृति में चुपचाप दखल देते हैं। हाल ही में बाल विवाह को एक विलास व सामंती कलेवर में प्रस्तुत करने वाले सीरियल को प्रतिबंधित करने की मांग पूरे दे...