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भाजपा की चुनौती कांग्रेस को मिले जैकपॉट से निपटना

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पटियाला हाउस कोर्ट के फैसले से पूरा देश हैरान है। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन को देश का सबसे बड़ा घोटाला बताया गया था, लेकिन सभी आरोपी बच गए। राजनीतिक तौर पर खलबली मचाने वाले इस मामले में कॉरपोरेट व राजनेता सभी आरोपियों को सीबीआई अदालत ने बरी कर दिया। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट की स्पेशल सीबीआई अदालत ने इस घोटाले से जुड़े सभी मामलों में फैसला सुनाया। इनमें से दो मामलों में जांच सीबीआई ने और तीसरे मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय ने की। इस मामले में मुख्य आरोपी पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा और डीएमके सांसद कनिमोझी थे। सीबीआई कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि सरकारी पक्ष आरोपियों पर दोष सिद्ध करने में नाकाम रहा। इस फैसले के बाद कांग्रेस के हाथ भाजपा और प्रधानमंत्री को घेरने के साथ ही आगामी लोकसभा चुनावों के लिए एक मनचाहा जैकपॉट हाथ लग गया है। यह फैसला भाजपा के लिए सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने जैसा है, क्योंकि गुजरात में 99 के फेर में पड़ने के बाद अभी वह संभल भी नहीं पाई है कि कांग्रेस को हमलावर होने का हथियार मिल गया है। अदालत के फैसले का असर आगामी दिनों में होने वाले चुनाव पर...

मणिशंकर अय्यर को बाहर कर कांग्रेस ने उम्दा काम किया, दिखाया दूसरों को रास्ता

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राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले पार्टी जिस पुराने चोले को उतार फेंकने की ओर बढ़ रही है, वह अच्छे दिनों की ओर लौटने का संकेत है। गुजरात चुनाव के दौरान पार्टी के नेताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए असंसदीय भाषा का प्रयोग न करने की नसीहत देने से लेकर मणिशंकर अय्यर को पार्टी से बाहर करने तक का फैसला इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। गौरतलब है कि गुरुवार को अय्यर ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए बेहद निचले स्तर की बयानबाजी करते हुए कहा था कि ‘इस आदमी में कोई सभ्यता नहीं है और ऐसे मौके पर इस किस्म की गंदी राजनीति करने की क्या आवश्यकता है?’ इस बयान के आने के बाद भाजपा और खुद मोदी ने कांग्रेस को घेरने में कसर बाकी नहीं रखी। मगर रात होते तक राहुल सक्रिय हुए और न सिर्फ अय्यर को माफी मांगनी पड़ी, बल्कि उन्हें बाहर का रास्ता भी देखना पड़ा। इस पूरे एपिसोड में लोगों ने कांग्रेस को खलनायक से नायक बनते भी देखा और इस बात पर भी बहस शुरू हुई कि अगर पार्टी नेतृत्व सख्ती से पेश आए, तो फिर राजनीति में भाषा के गिरते स्तर को बचाया जा सकता है। राजनीति में भाषा में आ रही गिरावट के प्रति च...

संघ व राज्य के बीच सहयोग की बेहतर पहल

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देश में बदलाव के लिए नीति आयोग के संचालन परिषद की गत दिनों तीसरी बैठक हुई। इस बैठक से पूर्व आयोग की दो बैठकें वर्ष-2015 में फरवरी और जुलाई माह में हुई थीं। इस बैठक में पूर्व की दोनों बैठकों में लिए गए निर्णयों की समीक्षा की गई और यह देखा गया कि उन निर्णयों पर कहां तक प्रगति हुई है। गौर करें, तो पहली बैठक में लिए गए निर्णयों में प्रमुख था कि संघ और राज्यों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ाया जाएगा। बहरहाल, ताजा बैठक में देश में बदलाव लाने के लिए सात वर्षो के रणनीतिक ब्योरे समेत तीन वर्षो की पूरी कार्ययोजना को प्रस्तुत किया गया। गौरतलब है कि बीते एक अप्रैल को सरकार ने पंचवर्षीय योजना को समाप्त कर दिया था। अब इसकी जगह तीन वर्षीय योजना लाई गई है। इसे थोड़ा और अच्छे से समझें, तो यह योजनाओं की त्रिस्तरीय व्यवस्था है। पंद्रह वर्षो की समग्र कार्ययोजना, सात वर्षो की रणनीति और तीन वर्षो की लघु अवधि योजना। इन तीनों प्रकार की कार्य योजनाओं के पीछे प्रधानमंत्री मोदी के न्यू इंडिया के नारे को धरातल पर साकार करने की मंशा दिखाई देती है। बैठक की अध्यक्षता कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा-‘मैं ...

सामाजिक न्याय अब राजनीतिक विचार नहीं,न्याय चेतना का प्रश्न

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संसदीय व्यवस्था में कल्याणकारी राज्य का अर्थ सत्ता के लिए बहुमत बनाने वाले वोटरों को संतुष्ट करने के इर्द-गिर्द केंद्रित होकर रह जाता है। देश की राजनीतिक प्रक्रिया में एक बुनियादी बदलाव तब आया था, जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने संविधान में उल्लेखित सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़े वर्गो को सरकारी नौकरियों में विशेष अवसर यानी आरक्षण देने का फैसला किया था। संसदीय राजनीति में यह फैसला सामाजिक न्याय के नाम से जाना गया। यह वह दौर था, जब पूरी संसदीय राजनीति में हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था पर आधारित समाज के सबसे निचले हिस्से को अपना वोट बनाकर स्वयं से जोड़ने का प्रयास शुरु हुआ। इस प्रयास को ही सोशल इंजीनियरिंग के नाम से जाना गया। हिंदुत्ववादी संगठन राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और उसकी संसदीय पार्टी भाजपा ने भी इस सोशल इंजीनियरिंग की अनिवार्यता महसूस की। यह विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा शुरू की गई सामाजिक न्याय की राजनीति का ही असर था कि सभी को सोशल इंजीनियरिंग की जरूरत महसूस हुई। इसके कारण सामाजिक न्याय ने सत्ता में हिस्सेदारी के सवाल पर संसदीय राजनीति को प्रभावित तो किया, मगर वि...

निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी

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निर्वाचन आयोग ने बुधवार को राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी है। चुनाव कार्यक्रम वही है, जिसके बारे में चुनाव आयोग देश को पहले ही बता चुका है। यानी, मतदान 17 जुलाई को होगा, तो नतीजे 20 जुलाई को आएंगे, जबकि अधिसूचना जारी होते ही अब नामांकन की प्रक्रिया तो प्रारंभ हो ही गई है। इसी के अनुरूप राजनीतिक दल भी सक्रिय हो चुके हैं। विपक्ष की कोशिश यह है कि वह संयुक्त उम्मीदवार उतारे, जो ऐसा हो कि सत्तापक्ष उसका समर्थन करने के लिए बाध्य हो जाए। गौरतलब है कि वर्ष-2002 के राष्ट्रपति चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का नाम आगे बढ़ाकर ऐसा दांव मारा था कि उनसे असहमति रखने वाली विपक्ष की राजनीतिक पार्टियां तो हैरान हो ही गई थीं, तत्कालीन सत्तापक्ष यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) भी मुलायम के दांव की कोई काट नहीं खोज पाया था। उसके बाद डॉ. कलाम निर्विरोध राष्ट्रपति बने और उन्होंने इस पद की जिम्मेदारी जिस गरिमा के साथ निभाई, वह ऐतिहासिक है। विपक्ष इस बार फिर 2002 दोहराना चाहता है और इसके लिए तमाम दलों के बीच बैठकें हो ही रही हैं। लेकिन सत्त...