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भाजपा का एक और साहसिक फैसला

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राजएक्सप्रेस, भोपाल। जम्मू-कश्मीर में भाजपा और पीडीपी गठबंधन (BJP-PDP Alliance Ends)टूट गया है। अपनी आतंक विरोधी छवि खराब होने के बाद भाजपा ने महबूबा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। यह फैसला साहसिक है। अब कश्मीर में केंद्र सरकार की आतंक विरोधी मुहिम तेज हो सकेगी। जम्मू-कश्मीर में मार्च-2015 में पीडीपी-भाजपा के बीच हुए बेमेल गठबंधन वाली सरकार आखिरकार गिर गई। भाजपा ने महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी से गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया है। जब से राज्य में भाजपा-पीडीपी गठबंधन की सरकार बनी थी सेना, पत्थरबाजों-आतंकियों और नीतियों के मोर्चे पर दोनों पार्टियों के मतभेद खुलकर सामने आ रहे थे, लेकिन गठबंधन तोड़ने का फैसला भाजपा ने 40 महीने बाद लिया। वैसे, अचानक लिये गए इस फैसले के गंभीर मायने हैं। रमजान के आखिरी दिन जवान औरंगजेब और पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या के बाद केंद्र सरकार आतंकियों के खिलाफ सीजफायर को लेकर बैकफुट पर आ गई थी। पिछले चार साल में कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई इस एक महीने में धुलने लगी थी। बहरहाल, अगर भाजपा और पीडीपी के अलग होने के कारणों की समीक्षा करें, तो ब...

तमिलनाडु में त्रिपुरा दोहरा पाएगी भाजपा

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त्रिपुरा में वामदलों का किला ढहाने के बाद भाजपा की नजर अब तमिलनाडु के साथ पश्चिम बंगाल और ओडिशा पर है। तमिलनाडु में भाजपा की संभावना इसलिए भी बन रही है, क्योंकि पिछले चुनाव में त्रिपुरा में वोट प्रतिशत 1.5 प्रतिशत था, जबकि तमिलनाडु में वोट प्रतिशत तीन रहा है। इस नजरिए से देखें, तो भाजपा के लिए संभावनाएं हैं। वैसे इस राज्य में अब चार क्षेत्रीय दल हैं, जिनके साथ जाने की कोशिश कांग्रेस भी करेगी। देखना है कि राजनीति क्या करवट लेगी। क्या तमिलनाडु में कमल खिल सकता है? यह एक ऐसा सवाल है, जो पिछले कुछ दिनों से सभी के दिमाग में है। खासकर उत्तर पूर्वी राज्यों में भाजपा की बंपर जीत के बाद इससे जुड़े कयास तेज हो गए हैं। त्रिपुरा जैसे राज्य में पार्टी की जीत ज्यादा बड़ी इसलिए भी है क्योंकि यह हमेशा लाल गढ़ के रूप में देखा जाता रहा है और पिछले 25 साल से यहां कम्युनिस्ट सरकार बनती रही है। आज से पांच साल पहले अगर इस परिणाम की चर्चा भी होती तो लोग इसे हंसी में उड़ा देते क्योंकि पिछले चुनाव में भाजपा का वोट शेयर महज 1.5 प्रतिशत रहा था। अगर इसके बावजूद भी भाजपा यहां अपनी सरकार बंपर वोटों से बना सक...

भाजपा गंभीरता से ले चुनाव परिणाम और मतदाताओं की नाराजगी को दूर करें

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गोरखपुर, फूलपुर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव ने चौंकाने वाले नतीजे दिए हैं। कहा जा रहा है कि दोनों जगह मतदाताओं ने सपा-बसपा को जिताने के लिए नहीं, बल्कि भाजपा को हराने के लिए वोट किया था। अब जबकि नतीजे भाजपा के लिए बेहतर नहीं आए हैं, तो उसे गंभीरतापूर्वक मंथन करना चाहिए और मतदाताओं की नाराजगी को दूर करना चाहिए। मंथन इस बात पर भी करना होगा कि एक साल पुरानी सरकार से जनता का मोहभंग क्यों हो गया? गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव ने चौंकाने वाले नतीजे दिए हैं। इन नतीजों के कई मायने निकाले जा रहे हैं और उतने ही स्पष्टीकरण भी दिए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ कह रहे हैं कि अति आत्मविश्वास के कारण भाजपा हार गई। पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का कहना है कि यह विकल्प की जीत है और सामाजिक न्याय की जीत है। सपा और सहयोगी दलों की जीत है, लेकिन जीत की समीक्षा सुविधानुसार ही पेश की जा रही है। कहानी इससे कहीं आगे जाती दिख रही है। उपचुनाव के नतीजों के कई मायने हैं। सबसे पहला मायने तो यह है कि भाजपा हारी है। योगी हारे हैं। वरना एक दो-तिहाई बह...

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराने के बाद भाजपा को निशाना बनाकर दूसरे राज्यों में भी प्रतिमाओं को खंडित करने का सिलसिला जारी

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Lenin:-  त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति गिराने के बाद भाजपा को निशाना बनाकर दूसरे राज्यों में भी महापुरुषों की प्रतिमाओं को खंडित किए जाने का सिलसिला जारी है। मगर भारतीय जनता पार्टी पर लाख आरोप लगाए जा रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि जब लेनिन की मूर्ति तोड़ी गई, तब त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी। तब माणिक सरकार की ही अगुआई में कार्यवाहक सरकार काम कर रही थी। त्रिपुरा में जनादेश आते ही पच्चीस साल के वामपंथी शासन के प्रतीकों पर हमला शुरू हो गया। लेनिन की मूर्ति तोड़ दी गई। इसे लेकर बौद्धिक वर्ग के एक तबके ने सवालों की फेहरिश्त उछालनी शुरू कर दी है। इस घटना की प्रतिक्रियाएं भी हुईं। कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया तो मेरठ में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबडेकर की मूर्ति तोड़ी गई तो सुदूर दक्षिण तमिलनाडु में पेरियार की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया। जाहिर है कि इसे लेकर देश में बवाल मचा। इसे लेकर सवाल उठने भी चाहिए, लोकतांत्रिक समाज में सत्ता का दर्शन और चेहरा बदलते ही उसके प्रतीकों को सदा के लिए आखिर क्यों उखाड़ फेंक देना चाहिए। हाला...

भाजपा को पूर्वोत्तर में मिली जीत नि:संदेह साल 2019 के चुनाव में बड़ा असर छोड़ेगी

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त्रिपुरा में शानदार जीत और मेघालय तथा नगालैंड में आशा के विपरीत प्रदर्शन के बाद भाजपा का उत्साह आसमान पर है। पूर्वोत्तर में मिली जीत नि:संदेह साल 2019 के चुनाव में बड़ा असर छोड़ेगी। वहीं कांग्रेस के लिए यह परिणाम खतरे की घंटी के समान है। पूवरेत्तर के तीन राज्यों के आए चुनाव नतीजों ने भाजपा को सियासी पटल पर और भी मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया है। त्रिपुरा में पार्टी ने अभूतपूर्व जीत दर्ज की तो मेघालय और नगालैंड में भाजपा का प्रदर्शन उत्साहजनक रहा। दूसरी तरफ, प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस का जनाधार उखड़ने से उसकी चुनौतियां बढ़ गई हैं। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि नतीजों का इस्तेमाल भाजपा अगले दो महीनों में कर्नाटक के महत्वपूर्ण चुनावी समर में अपने लिए जमीन तैयार करने में करेगी। साफ है कि भाजपा के नए मतदाता तेजी से बढ़ रहे हैं और ये 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा की राह आसान बना सकते हैं। गौरतलब है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में साल के अंत में होने वाले चुनाव में सत्ता बरकरार रखना भाजपा के लिए चुनौती है। हालांकि, ताजा चुनाव नतीजों से पार्टी कार्यकर्ताओं का हौ...

भाजपा की चुनौती कांग्रेस को मिले जैकपॉट से निपटना

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पटियाला हाउस कोर्ट के फैसले से पूरा देश हैरान है। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन को देश का सबसे बड़ा घोटाला बताया गया था, लेकिन सभी आरोपी बच गए। राजनीतिक तौर पर खलबली मचाने वाले इस मामले में कॉरपोरेट व राजनेता सभी आरोपियों को सीबीआई अदालत ने बरी कर दिया। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट की स्पेशल सीबीआई अदालत ने इस घोटाले से जुड़े सभी मामलों में फैसला सुनाया। इनमें से दो मामलों में जांच सीबीआई ने और तीसरे मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय ने की। इस मामले में मुख्य आरोपी पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा और डीएमके सांसद कनिमोझी थे। सीबीआई कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि सरकारी पक्ष आरोपियों पर दोष सिद्ध करने में नाकाम रहा। इस फैसले के बाद कांग्रेस के हाथ भाजपा और प्रधानमंत्री को घेरने के साथ ही आगामी लोकसभा चुनावों के लिए एक मनचाहा जैकपॉट हाथ लग गया है। यह फैसला भाजपा के लिए सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने जैसा है, क्योंकि गुजरात में 99 के फेर में पड़ने के बाद अभी वह संभल भी नहीं पाई है कि कांग्रेस को हमलावर होने का हथियार मिल गया है। अदालत के फैसले का असर आगामी दिनों में होने वाले चुनाव पर...

गुजरात चुनाव को लेकर अब सोशल मीडिया पर भी जीत हार के कयास लगने शुरू

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राजनीति अपनी जगह है, उसे लेकर सोशल मीडिया पर चर्चाएं अपनी जगह, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। गुजरात के भावी चुनावों को लेकर जिस तरह सोशल मीडिया पर आक्रामक चर्चाएं जारी हैं, उससे आसानी से यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां इस बार कयास आसान नहीं है। जिस तरह चुनाव आयोग ने पहले हिमाचल प्रदेश की तारीखों का ऐलान कर दिया और गुजरात की तारीखों को रोके रखा, उससे भी इसी आशंका को बल मिला है। लेकिन अपने चुनावी सर्वेक्षणों की साख के लिए विख्यात सीएसडीएस के संजय कुमार के मुताबिक, जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सीएसडीएस के सर्वेक्षण नतीजों के मुताबिक अगर गुजरात के लोगों की सोच मौजूदा स्तर पर बनी रही तो निश्चित तौर पर एक बार फिर गुजरात में भाजपा की सरकार बनेगी। भारत जैसे देश में राजनीति में नतीजों का सही-सही अनुमान लगा पाना किसी के लिए संभव नहीं है। लेकिन यह भी हकीकत है कि चुनाव नतीजों का मोटा अनुमान उस क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे नेताओं को लग जाता है। आपसी बातचीत में कांग्रेसी नेता यह स्वीकार कर रहे हैं कि पिछली बार के नतीजों की तुलना में इस बार अगर उन्होंने दस-पंद्रह सीटें भी ज्यादा जीत लीं तो उसे ...