न्याय क्षेत्र में महिलाओं की कम संख्या हमारे लिए बड़ा सबक, न्यायपालिका में लिंगभेद ठीक नहीं
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रीय विधि दिवस के अवसर पर नीति आयोग और विधि आयोग के सम्मेलन में न्यायपालिका में महिलाओं, ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के न्यायाधीशों की नगण्य संख्या पर चिंता जताते हुए सुधार की सलाह दी है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एके सीकरी भी इस मुद्दे पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। यह मुद्दा ऐसे समय उठाया गया है, जब न्यायपालिका न्यायाधीशों की कमी के संकट से जूझ रही है। सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के 17 हजार जजों में से देश की आधी आबादी यानी महिलाओं की संख्या 4 हजार 700 के करीब है। पिछले एक दशक से भी अधिक समयावधि में सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने सबसे बड़ी अदालत में नियुक्ति के लिए सिर्फ तीन महिला जजों का नाम प्रस्तावित किया है। एक स्वस्थ, सक्षम व सुदृढ़ न्यायपालिका के बिना बेहतर लोकतंत्र की कल्पना संभव नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि सभी तबकों का यथोचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। रूमा पाल को देश की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की दौड़ से कैसे अलग किया गया, यह अब भी रहस्य बना हुआ है। भारतीय गणतंत्र के 67 साल पूरे हो गए हैं। इ...