दिल्ली के प्रदूषण ने एक बार फिर हमारी सरकारों के चेहरे से नकाब हटा दिया, नाकामी जनता क्यों भोगे?
अभी कुछ दिनों पहले आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 2015 में प्रदूषण से भारत में 25 लाख मौतें हुई है, तब इस तथ्य पर शायद ही किसी ने गौर किया हो। प्रदूषण हमारे लिए कभी बड़ा मुद्दा रहा ही नहीं। विकास की अंधी दौड़ में हम प्राकृतिक संसाधनों के साथ जिस तेजी से खिलवाड़ करते जा रहे हैं, उसका हश्र अब दिल्ली के रूप में हमारे सामने है। राष्ट्रीय राजधानी का अभी जैसा हाल है, वह सिर्फ और सिर्फ हमारी देन है। बावजूद इसके अभी तक हम सच को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। यह लगातार दूसरा साल है, जब दिल्ली की हवा जहरीली हुई है। हमारे पास संजीदा होने के लिए पूरा एक साल था, मगर न तो सरकार और न ही समाज ने इस दिशा में सोचने का वक्त निकाला। समय के साथ समस्या खत्म हुई, तो सब अपने काम में लग गए। अब जबकि दिल्ली फिर प्रदूषण की गिरफ्त में आई है, तब कुआं खोदने का काम शुरू हो गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) और दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली और केंद्र सरकार को फटकार लगाई है। एनजीटी ने दिल्ली व एनसीआर के सभी राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ तीन दिन के भीतर बैठक कर प्रदूषण नियंत्रण के उपाय तलाशने को कहा है। म...