Posts

Showing posts with the label Education

शिक्षा का बाजारीकरण रोकना जरूरी

Image
राजएक्सप्रेस, भोपाल। बेहतर शिक्षा (Education) उपलब्ध कराने के नाम पर अस्तित्व में आए निजी विद्यालयों की मानसिकता पर अब सवाल उठने लगा है। आजादी के पूर्व और बहुत बाद तक निजी क्षेत्र के सम्मानित नागरिक, राजनेता और व्यापारी शिक्षा के क्षेत्र के लिए अपना योगदान देते थे। बड़ी-बड़ी संस्थाएं खड़ी करते थे, किंतु सोच में व्यापार नहीं, सेवा का ही भाव होता था। आज जो भी लोग शिक्षा के क्षेत्र में आ रहे हैं, वे व्यापार की नीयत से आ रहे हैं। इस दिक्कत को दूर करना बेहद आवश्यक है। समाज में शिक्षा समाज द्वारा पोषित और गुरुजनों द्वारा संचालित रही है। सरकार या राज्य का हस्तक्षेप शिक्षा में कभी नहीं रहा, पर बदलते समय के अनुसार सरकार और राज्य इसे चलाने और पोषित करने लगे। किंतु भावना यही रही है कि, इसकी स्वायत्तता बनी रहे। शिक्षा का यह बदलता दौर नई तरह की समस्याएं लेकर आया है। आज की शिक्षा सरकार से आगे बाजार तक जा पहुंची है। यह शिक्षा समाज के सामाजिक नियंत्रण से मुक्त है और सरकारें भी यहां अपने आपको पूरी तरह से असहाय महसूस कर रही हैं। निजी विद्यालयों से प्रारंभ हुआ यह क्रम अब निजी विश्वविद्यालयों तक...

शिक्षा की उम्र में अपराध चिंतनीय, यह देश और समाज के लिए चुनौती का समय

Image
अंग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक विलियम हैजलिट लिखते हैं कि संसार में बच्चे का प्रथम प्रवेश विद्यालय में होता है। इसके पूर्व बच्चा घर में रहता है। कहीं जाता भी है तो माता-पिता के साथ। अत: बच्चे में अच्छे संस्कार व आदर्श स्थापित करने का उत्तरदायित्व सबसे पहले उसके माता-पिता का ही होता है। वह अनुशासन का पाठ सबसे पहले घर में सीखता है। अगर माता-पिता अनुशासन में रहने के आदी हैं तो बच्चा भी वैसा ही बनेगा। लेकिन दुखद बात यह है कि देश में बाल अपराधियों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। अब ऐसा माना जाता है कि निम्न आर्थिक वर्ग से संबंधित बच्चे जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं, वे अपराधों में जल्दी फंस जाते हैं, क्योंकि उनके माता-पिता दोनों मजदूरी या दूसरे छोटे-मोटे काम करते हैं। आंकड़ों की मानें तो पढ़े-लिखे व अच्छे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी अब हत्या व सामूहिक दुष्कर्म जैसे अपराध कर बैठते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक किशोरों द्वारा किए जा रहे अपराधों में इजाफा हो रहा है। किशोरों के खिलाफ वर्ष-2003 में 33 हजार 320 मामले दर्ज किए गए थे, जो...

शिक्षा अधिकार कानून आज भी उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाया, इससे सबक ले या सफलता

Image
संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित ऐसा कानून जो देश के छह से 14 वर्ष के सभी बच्चों को नि:शुल्क, अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की बात तो करता है, पर कानून बनने के सात साल बाद भी उपलब्धियां असरकारक नहीं हैं। सात साल पहले शिक्षा अधिकार कानून (आरटीई) का आना बड़ा कदम था। लेकिन खामियों और इसके क्रियान्वयन में सरकारों की उदासीनता के चलते इसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके। यदि आरटीई अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाने में असफल साबित हो रहा है तो इसके लिए समाज और सरकार दोनों जिम्मेदार हैं। शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के सात साल बाद हमारे सामने चुनौतियों की एक लंबी सूची है। इस दौरान भौतिक मानकों जैसे स्कूलों की अधोसंरचना, छात्र-शिक्षक अनुपात आदि को लेकर स्कूलों में सुधार देखने को मिलता है, लेकिन पर्याप्त व प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, उनसे दूसरे काम कराया जाना, नामांकन के बाद स्कूलों में बच्चों की रुकावट, बीच में पढ़ाई छोड़ने की बढ़ती दर और संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। लेकिन सबसे चिंताजनक बात इस दौरान शिक्षा की गुणवत्ता और सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था पर भरोसे में कमी का हो...