शिक्षा का बाजारीकरण रोकना जरूरी
राजएक्सप्रेस, भोपाल। बेहतर शिक्षा (Education) उपलब्ध कराने के नाम पर अस्तित्व में आए निजी विद्यालयों की मानसिकता पर अब सवाल उठने लगा है। आजादी के पूर्व और बहुत बाद तक निजी क्षेत्र के सम्मानित नागरिक, राजनेता और व्यापारी शिक्षा के क्षेत्र के लिए अपना योगदान देते थे। बड़ी-बड़ी संस्थाएं खड़ी करते थे, किंतु सोच में व्यापार नहीं, सेवा का ही भाव होता था। आज जो भी लोग शिक्षा के क्षेत्र में आ रहे हैं, वे व्यापार की नीयत से आ रहे हैं। इस दिक्कत को दूर करना बेहद आवश्यक है। समाज में शिक्षा समाज द्वारा पोषित और गुरुजनों द्वारा संचालित रही है। सरकार या राज्य का हस्तक्षेप शिक्षा में कभी नहीं रहा, पर बदलते समय के अनुसार सरकार और राज्य इसे चलाने और पोषित करने लगे। किंतु भावना यही रही है कि, इसकी स्वायत्तता बनी रहे। शिक्षा का यह बदलता दौर नई तरह की समस्याएं लेकर आया है। आज की शिक्षा सरकार से आगे बाजार तक जा पहुंची है। यह शिक्षा समाज के सामाजिक नियंत्रण से मुक्त है और सरकारें भी यहां अपने आपको पूरी तरह से असहाय महसूस कर रही हैं। निजी विद्यालयों से प्रारंभ हुआ यह क्रम अब निजी विश्वविद्यालयों तक...