योग संजीवनी है, आध्यात्मिक उन्नति योग को दिनचर्या में शामिल करें
तपस्विभ्योधिको योगी, ज्ञानिभ्योपि मतोधिक: कर्मिभ्यश्चाधिको योगी, तस्माद्योगी भवाजरुन।। श्रीमद्भगवद्गीता-कथन है कि तपस्वियों, ज्ञानियों और सकाम-कर्मियों से भी श्रेष्ठ है योगी। इसी महाग्रंथ का एक अन्य श्लोक है:- तरूमाद्योगाय युज्यस्व योग:, योग: कर्मसुकौशलम्। इसी के उत्तरार्ध-‘योग: कर्मसुकौशलम्’ को ‘आईएएस’ ने अपने आषर्वाक्य के रूप में ग्रहण किया है-कर्म में कुशलता ही योग है। 21 सौ साल पुरानी ईसाइयत और 14 सौ साल पुराने धर्म इस्लाम की उत्पत्ति से भी सहस्राब्दियों पूर्व विश्व के प्राचीनतम आर्ष-चिंतन ऋग्वेद में योग का उल्लेख मिलता है। अत: इसके सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक महत्व को देखते हुए सहज ही समझा जा सकता है कि यह तो विश्वदृष्टि का आध्यात्म है, जो सभी को स्वीकार्य भी है। सामान्यत: महर्षि पतंजलि को योग का सूत्रधार माना जाता है। तमाम दावों-प्रतिदावों के बीच महर्षि पतंजलि का जन्म स्थान मध्यप्रदेश में ही माना जाता है। वैदिक साहित्य के विख्यात शोधार्थी मैक्समुलर के एक वाक्य ‘वैयाकरण गोनर्दीय’ के आधार पर डॉ. प्रभुदयालु अग्निहोत्री ने अपनी तथ्यपुष्ट पुस्तक ‘पतंजलिकालीन भारत’ में...