‘न्यूटन’ का नायक घनघोर आदर्शवादी भारतीय सिनेमा का काला हास्य
भारतीय सिनेमा के लिए ‘न्यूटन’ एक नए मिजाज की फिल्म है बिल्कुल ताजी, साबूत और एक ही साथ गंभीर और मजेदार। इसमें सादगी और भव्यता दोनों का विलक्षण संयोग है। ‘न्यूटन’ की विषयवस्तु भारी-भरकम है, लेकिन इसका ट्रीटमेंट बहुत ही सीधा और सरल है। बिल्कुल मक्खन की तरह। सिनेमा का यह मक्खन आपको उसी दुनिया की सैर कराता है, जिसमें हमारी जिंदगी की सारी खुरदरी हकीकतें दिखाई देती हैं। इसी के साथ ही यह सिनेमा के बुनियादी नियम मनोरंजन को भी नहीं भूलती है। यह एक क्लास विषय पर मास फिल्म है। नक्सलवाद प्रभावित इलाके में चुनाव जैसे भारी भरकम विषय वाली सितारा विहीन फिल्म से आप मनोरंजन की उम्मीद नहीं करते हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस विषय पर पहले भी फिल्में न बनी हों लेकिन ‘न्यूनटन’ का मनोरंजक होना इसे अलग और खास बना देता है। आदर्शहीनता के इस दौर में इसका नायक घनघोर आदर्शवादी है और ऐसा करते हुए वह अजूबा दिखाई पड़ता है, यही इस फिल्म का काला हास्य है। ‘न्यूटन’ एक राजनीतिक फिल्म है, जिसे बहुत ही सशक्त तरीके से सिनेमा की भाषा में गढ़ा गया है। यह हमारे सिनेमा की ताकत का अहसास कराती है। इस फिल्म की कई परतें हैं, लेकिन ...