बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, अब करेंगे ठीक से काम



खबर यह आ रही थी कि नीतीश कुमार के भाजपा से हाथ मिलाने के फैसले से जनता दल-यू के वरिष्ठ नेता शरद यादव नाराज हैं। अत: शुक्रवार को बिहार की नई सरकार जब विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेगी, तो वह पराजित भी हो सकती है। मगर अब इस शक्ति-परीक्षण का परिणाम हमारे सामने है। मुख्यमंत्री नीतीश के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार को कुल 122 विधायकों का समर्थन चाहिए था, लेकिन उसे मिला 131 विधायकों का समर्थन। नीतीश ने यह बहुमत एनडीए के घटक दलों यानी बीजेपी, आरएलएसपी, हम (यह जीतन राम माझी की पार्टी है) व एलजेपी के साथ ही तीन निर्दलीय विधायकों के समर्थन से हासिल किया है। मतलब, लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी में फूट होने की जो आशंका व्यक्त की जा रही थी, वह भी गलत साबित हुई है। न फूट आरजेडी में हुई, न जूडीयू में। इस घटनाक्रम के बाद अगर हम इस तथ्य को भूल जाएं कि बिहार की जनता ने विधानसभा चुनाव में आरजेडी-जेडीयू एवं कांग्रेस के गठबंधन को वोट दिया था और इसीलिए नई सरकार जनादेश के खिलाफ है, तो बाकी जो कुछ भी हुआ, वह बिहार के हित में हुआ है। लालू प्रसाद यादव का मिजाज यह है कि उनके हाथों में ज्यों ही सत्ता आती है, वे उसका दुरुपयोग करने लगते हैं। वे जब चारा घोटाले के एक मामले में सजा पाकर राजनीति से बाहर हो चुके हैं, तो बिहार सरकार में उनकी कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए थी। यूं तो उन्हें अपने पुत्रों को मंत्रिमंडल में भी शामिल नहीं कराना चाहिए था, न तो तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनवाना चाहिए था और न ही तेज प्रताप को मंत्री। लेकिन जो लालू चारा घोटाले के समय अपनी धर्म पत्नी को सत्ता सौंपकर जेल गए थे, उनसे परिवारवाद से मुक्त रहने की अपेक्षा करना शायद सही नहीं था।
अलबत्ता, वे तेजस्वी और तेज प्रताप की जगह आरजेडी के किसी वरिष्ठ नेता को उपमुख्यमंत्री या मंत्री बनवा देते, तो यह उनकी राजनीति के लिए ही मुफीद होता। नीतीश कुमार उसी समय से असहज थे, जब लालू ने अपने पुत्र तेजस्वी का कद उन्हें उपमुख्यमंत्री बनवा कर नीतीश के समकक्ष करने की कोशिश की थी। इसे लेकर उनकी पार्टी में भी असहजता थी, वरिष्ठ नेताओं में खास तौर पर। दिल्ली और पटना के गलियारों में आरजेडी के तमाम वरिष्ठ नेता यह कहते हुए मिल जाते थे कि लालू अब तक नहीं बदले हैं। पहले वे पिछड़ों के नेता थे, फिर यादवों के नेता बने और अब बस अपने परिवार के नेता इसके बावजूद हैं कि उन्हें कई राजनीतिक झटके लग चुके हैं। उनकी यह बात सही थी, क्योंकि दोनों ही पुत्रों को नीतीश मंत्रिमंडल में जगह दिलाना उनके रुख में बदलाव न आने की ही सूचना दे रहा था। इससे नीतीश असहज तो थे, पर खिन्न नहीं। उनकी खिन्नता के कारण अलग हैं।
लालू प्रसाद यादव को सरकार के कामकाज में जरा भी दखल नहीं देना चाहिए था, मगर वे अपने पुत्रों के विभागों को स्वयं चला रहे थे। स्वास्थ्य मंत्रलय तेजस्वी यादव के पास था, मगर लालू अस्पतालों का निरीक्षण करते थे। प्रशासन में भी उनका जबर्दस्त हस्तक्षेप होने लगा था। पुलिस और प्रशासन के अफसरों का स्थानांतरण तक वे अपनी मर्जी से कराने लगे थे। एक पत्रकार की हत्या के बाद स्थानीय एसपी का स्थानांतरण इसके बावजूद हुआ कि नीतीश उनको बनाए रखना चाहते थे। माफिया सरगना शहाबुद्दीन का कद अचानक बढ़ने लगा था। जेल में उससे मिलने वालों की संख्या बढ़ने लगी थी, वह वहीं से अपनी गतिविधियां चलाने लगा था। उसे तो जमानत तक मिल गई थी, जिसके कारण राज्य के मुख्यमंत्री की छवि ही खराब हुई थी।
फिर, पिछले 20 महीनों से जब से बिहार में राजद-जेडीयू-कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी, राज्य में अपराधों का ग्राफ भी बढ़ा। लूट, हत्या और डकैती की वैसी ही वारदातें होने लगीं, जैसी कि लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में होती थीं। बहुत सारे मामले ऐसे भी सामने आए, जिनमें राजद के कार्यकर्ता संलिप्त पाए गए। उन पर गंभीर आरोप लगे, लेकिन लालू उनके पक्ष में ही खड़े पाए गए। कौन नहीं जानता है कि बीते वर्ष हुए टॉपर घोटाले का मुख्य आरोपी बच्चा राय लालू के करीबियों में से एक है। इस वर्ष भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने लालू और उनके पुत्रों पर मिट्टी घोटाला आदि के जो भी आरोप लगाए थे, वे काफी संगीन ही थे।
यही सब वे बातें थीं, जो नीतीश कुमार के विरुद्ध जा रही थीं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक लंबे अरसे तक भाजपा के साथ सरकार चला कर उन्होंने अपनी अच्छी छवि बनाई है। नीतीश की वे सरकारें सुशासन के लिए जानी जाती हैं। उस दौर में बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार आया। अपराधों पर लगाम लगी रही। कृषि की विकास दर भले ही न सुधरी हो, लेकिन बिहार देश का एकमात्र राज्य है, जहां के किसान आत्महत्याएं नहीं करते। जिस दौर में नीतीश ने भाजपा के साथ सरकार चलाई, उसी में बिहार में एक भी दंगा नहीं हुआ। उन्होंने खुद को पिछड़ों के नेता के तौर पर स्थापित किया है, न कि एक जाति विशेष के नेता के तौर पर। वे पिछड़ों के ऐसे नेता हैं, जिन्हें अगड़े भी पसंद करते हैं, क्योंकि वे उनके खिलाफ जहर कभी नहीं उगलते, बल्कि उनका साथ चाहते हैं।
फिर, हाशिए के दलितों का उन्होंने एक अलग वर्ग खड़ा किया, जिसे महादलित कहा गया एवं यही उन्होंने हाशिए के मुसलमानों व पिछड़ों के साथ भी किया, इन दोनों ही समुदायों को दो अलग-अलग वर्गो में बांटकर। अत: उनकी राजनीति ज्यादा ठोस हो गई थी। वह लालू प्रसाद यादव की उस राजनीति से मेल नहीं खा रही थी, जिस में पिछड़े का मतलब केवल यादव होता है एवं दलितों को सिर्फ वोट के लिए याद किया जाता है। लालू प्रसाद यादव की राजनीति में मुस्लिमों को भी मात्र वोट के लिए याद किया जाता है व यह करते समय भी उनके कल्याण का ध्यान नहीं रखा जाता है, बल्कि उन्हें केवल भाजपा का डर ही दिखाया जाता है। लालू प्रसाद यादव की यह राजनीति नीतीश से अलग थी।
20 महीने पहले जब उन्होंने महागठबंधन बनाया था, तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने का लोभ भी था। यदि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत नहीं हुई होती तो यह लोभ कायम भी रहता। लेकिन इस चुनाव के नतीजो के बाद वे समझ गए कि प्रधानमंत्री बनने के चक्कर में वे अपनी राजनीतिक जमीन भी खो देंगे। बिहार में उनकी जो छवि है, वह लालू के कारण ध्वस्त हो जाएगी। आय से अधिक संपत्ति का आरोप लगने के बाद तेजस्वी ने इस्तीफा नहीं दिया, तो वे और खिन्न हो गए। इसका अंतिम नतीजा यह है कि लालू सत्ता से बेदखल हो चुके हैं, जबकि नीतीश भाजपा के साथ फिर मिलकर मुख्यमंत्री बन चुके हैं। यह बिहार के हित में हुआ है और नीतीश के हित में भी है। बिहार में बीते 20 महीने में जो कूड़ा फैला है, वह तो वे समेट ही लेंगे।

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