पूंजीगत व्यय पर टिका है विकास, सरकार की सोच सही विकास की रफ्तार तेज होगी



चालू वित्त वर्ष की दो तिमाहियों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट आने के बाद विकास को लेकर सरकार की चिंता स्वाभाविक है। फिलहाल, अर्थव्यवस्था में छाई मंदी दृष्टिगोचर हो रही है। इस स्थिति पर काबू पाने के लिए सरकार सार्वजनिक खर्च को बढ़ाने पर विचार कर रही है। हालांकि, इस वजह से राजकोषीय घाटे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। फिर भी केंद्र सरकार इस राह पर चलने के लिए तैयार है, क्योंकि मौजूदा समय में पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी करके विकास के विविध मानकों में तेजी लाई जा सकती है। उदाहरण के तौर पर सड़क एवं आवास क्षेत्र में निवेश करने पर सीमेंट, छड़ और रेत आदि की मांग में इजाफा एवं रोजगार सृजन में बढ़ोतरी हो सकती है। मौजूदा समय में औद्योगिक गतिविधियों, बुनियादी क्षेत्र और रोजगार के अवसरों में सुस्ती का माहौल बना है। उत्पादों की मांग में सुस्ती एवं खर्च करने में परहेज से विकास का गुलाबीपन मद्दिम पड़ रहा है।
माना यह जा रहा है कि पूंजीगत व्यय में वृद्धि होने से अर्थव्यवस्था में सुधार आ सकता है। अस्तु केंद्र वित्त मंत्री अरुण जेटली, वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु, रेलवे एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल, नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार एवं वित्त, वाणिज्य और रेल मंत्रलयों के वरिष्ठ अधिकारियों ने हाल ही में पूंजीगत व्यय को बढ़ाने के लिए उपलब्ध विकल्पों पर विचार-विमर्श किया है। वैसे, सरकार हमेशा से राजकोषीय घाटे को लक्ष्य के अंदर ही रखना चाहती है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि केंद्र सरकार को अर्थव्यवस्था में गति लाने के लिए पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी करनी ही होगी। सो, चालू वित्त वर्ष में पूंजीगत व्यय को बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है, जो 2016-17 के मुकाबले 25 प्रतिशत अधिक व संशोधित अनुमान 2.80 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले 11 प्रतिशत अधिक है।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि व्यय को बढ़ाने के लिए राजस्व के स्रोत क्या होंगे। वर्तमान में सरकार विनिवेश के विकल्प को सबसे कारगर मान रही है। एयर इंडिया का विनिवेश इस साल किया जा सकता है। पहले इसके विनिवेश में समय लगने की बात कही जा रही थी। केंद्र सरकार बाजार से भी उधारी ले सकती है। गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में 5.8 लाख करोड़ रुपए सकल उधारी का लक्ष्य रखा गया है। वहीं कुल विनिवेश का लक्ष्य 72 हजार 500 करोड़ रुपए है। केंद्र सरकार गैर वित्तीय प्रोत्साहन के उपायों पर भी विचार कर रही है, जिसके तहत केंद्रीय एजेंसियों द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड जारी किया जा सकता है। सरकार बैंकों के पुनर्पूजीकरण के विकल्पों पर भी विचार कर रही है। इस आलोक में ऋण बाजार से पूंजी जुटाई जा सकती है या फिर सरकार बैंकों में हिस्सेदारी को कम कर सकती है। कुछ सरकारी बैंकों का निजीकरण भी किया जा सकता है।
वर्तमान में पूंजीगत व्यय और राजस्व में अंतर 5.05 लाख करोड़ रुपए है, जो पूरे वित्त वर्ष के 5.46 लाख करोड़ का करीब 92 प्रतिशत है। नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद कई कंपनियों द्वारा स्टॉक खाली करने और नए स्टॉक रखने से परहेज करने के कारण अप्रैल-जून तिमाही में आर्थिक विकास दर कम होकर 5.7 प्रतिशत पर आ गई, जिसके कारण दूसरी तिमाही में भी जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई, जो वित्त वर्ष 2016-17 की अप्रैल-जून तिमाही के 7.9 प्रतिशत के मुकाबले काफी कम है। दूसरी तरफ जीएसटी के लागू होने के बाद से केंद्र सरकार की राजस्व प्राप्ति में कमी दृष्टिगोचर हो रही है, जबकि चालू वित्त वर्ष की दोनों तिमाहियों में चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रही।
इधर, अप्रैल-जून में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर कम होकर 1.2 प्रतिशत रह गई, जो जनवरी-मार्च में 5.3 प्रतिशत थी। खनन और संबंधित गतिविधियों में भी आलोच्य अवधि के दौरान 0.7 प्रतिशत की कमी आई। कृषि विकास दर पिछली तिमाही के 5.2 प्रतिशत और अक्टूबर-दिसंबर 2016-17 की 6.9 प्रतिशत के मुकाबले कम होकर 2.3 प्रतिशत रह गई। एक अनुमान के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में यदि राजस्व के आंकड़े नहीं बदलते हैं, तो प्रत्येक एक हजार करोड़ रुपए के खर्च पर राजकोषीय घाटा जीडीपी के 0.1 प्रतिशत से कम दर से बढ़ेगा। इस तरह पूंजीगत व्यय में 40 हजार करोड़ रुपए की बढ़ोतरी से राजकोषीय घाटा बजट लक्ष्य के 3.2 प्रतिशत के मुकाबले बढ़कर 3.5 प्रतिशत तक हो सकता है।
देखा जाए, तो भारत जैसे विकासशील देश में निवेश का जिम्मा सरकार ने ले रखा है। निजी निवेश और विदेशी संस्थागत निवेश का प्रतिशत भारत में बहुत कम है, जबकि निवेश को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार निवेशकों को ढेर सारी सुविधाएं देती है। ऐसे में कहा जा सकता है कि पूंजीगत व्यय को बढ़ाने के लिए सरकार को ही आगे आना होगा। हालांकि, पूंजीगत व्यय में वृद्धि से भले ही शुरू में राजकोषीय घाटे में वृद्धि होगी, लेकिन जैसे ही विविध उत्पादों की मांग एवं खपत में बढ़ोतरी होगी स्थिति में सकारात्मक बदलाव का आना शुरू हो जाएगा। इसकी पुष्टि ब्लूमबर्ग ग्लोबल बिजनेस फोरम की बैठक को संबोधित करते हुए विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम यांग किम ने की है। किम के अनुसार, भारत तेज गति से वृद्धि करता जा रहा है। अर्थव्यवस्था में छाई मंदी अस्थायी है और यह दौर बहुत ही जल्द खत्म हो जाएगा।
किम के मुताबिक भारत में निजी क्षेत्र और सरकार के बीच सहयोग बढ़ाने, निवेश में बढ़ोतरी, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, स्वास्थ्य तथा शिक्षा में बेहतरी आदि को सुनिश्चित करने की जरूरत है, जिसे करने में सरकार समर्थ है और वह इस दिशा में तेजी से कार्य कर रही है। किम ने यह भी कहा कि आने वाले कुछ माह में मोदी सरकार उन सभी लक्ष्यों को पूरा करती दिखेगी, जो उसने तय कर रखा है। लेकिन इसके लिए भारत की अर्थव्यवस्था के साथ बाजार और दूसरी चीजों का अनुकूल बने रहना बेहद जरूरी है। किम ने ब्लूमबर्ग ग्लोबल बिजनेस फोरम की बैठक में अपनी बात को कुछ उदाहरणों से साबित भी किया है। वैसे भी पिछले दिनों आईं कई रिपोर्ट में भारत को तेजी से उभरती हुई आर्थिक शक्ति बताया गया है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि वैश्विक माहौल फिलहाल भारत के पक्ष में है। ऐसे में विदेश से आने वाले निवेश को बढ़ाकर भी संभावित लक्ष्य की पूर्ति काफी हद तक की जा सकती है।
पूंजीगत व्यय में वृद्धि होने के मद्देनजर सरकार द्वारा बनाए गए मंत्रियों के समूह की अनुशंसाएं आने वाले दिनों में काफी कुछ साबित कर देंगी। देश को विकास की पटरी पर तेजी से दौड़ाने के लिए केंद्र सरकार को आने वाले दिनों में कई और कड़े फैसले लेने पड़ेंगे, जिसके लिए हमें अभी से तैयार रहना पड़ेगा। बहरहाल, अभी सरकार के किसी भी फैसले पर सवाल उठाने से पहले उसे और समय दिया जाना न सिर्फ मौके की नजाकत है, बल्कि जरूरत भी है। मोदी सरकार को सत्ता संभाले अभी तीन साल से कुछ ज्यादा ही समय हुआ है। अत: कुछ मुद्दों के आधार पर अर्थव्यवस्था को रसातल में बताना या सरकार को फेल साबित कर देना सही नहीं होगा। आने वाले दिनों में सरकार दिक्कतों से बाहर आ जाएगी, ऐसा मानना ही सही होगा।

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