सिनेमा की ‘श्रीदेवी’ का चले जाना, दिल अब भी मानने को तैयार नहीं, मगर उनके अभिनय की छाप हमारे दिलों में हमेशा बनी रहेगी


वो रोमांटिक हो तो चांदनी बन जाती है। चुलबुली हो तो चालबाज बन जाती है। नाचे तो नगीना है। गुस्से में हो तो मॉम बन जाती है और अगर रूठ जाए तो उम्रभर का सदमा दे जाती है। श्रीदेवी चली गई हैं, लेकिन दिल अब भी मानने को तैयार नहीं। माने भी कैसे, 55 साल के जीवन में 51 साल तो सिनेमा को ही दिए हैं। मगर सच यही है कि श्रीदेवी अब हमारे बीच नहीं हैं। मगर उनके अभिनय की छाप हमारे दिलों में हमेशा बनी रहेगी।
कहते हैं कि ईश्वर मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाता, कोई न कोई कमी छोड़ ही देता है। किसी को रूप देता है तो गुण नहीं और किसी को गुण देता है तो रूप में कमी कर देता है, लेकिन इस बात के अपवाद भी होते हैं। भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार श्रीदेवी वैसे ही अपवादों में से एक थीं। उन्हें ईश्वर ने संपूर्णता से रचा था। रूप का अपार वैभव भी दिया था और विलक्षण प्रतिभा का खजाना भी। परंतु, शायद ईश्वर को स्वीकार नहीं था कि उसकी ये मोहक रचना अधिक समय तक आदमियों की दुनिया में रहे, सो उसने बड़ी जल्दी ही भारतीय सिनेमा की इस श्री को अपने पास बुला लिया। 25 फरवरी को लगभग चौवन वर्ष की अल्पायु में श्रीदेवी भारतीय सिनेमा को सूना करके चली गईं।
यह एक विचित्र संयोग ही है कि जिस तारीख को श्रीदेवी ने अपने जीवन की अंतिम सांस ली, उसी रोज सिनेमा की एक और अजीम अभिनेत्री दिव्या भारती का जन्मदिन था। दिव्या भारती भी श्रीदेवी की ही तरह रूप और प्रतिभा से परिपूर्ण अभिनेत्री थीं। उल्लेखनीय होगा कि फिल्म लाडला में अनिल कपूर के साथ पहले दिव्या भारती को लिया गया था, जिसके कुछ दृश्यों की उन्होंने शूटिंग भी की थी, जो बाद में लीक होकर काफी चर्चित रहे और अब भी यूट्यूब पर मौजूद हैं। मगर, फिर किसी वजह से दिव्या इस फिल्म से अलग हो गईं और उनकी जगह श्रीदेवी को लिया गया। यह फिल्म सुपरहिट रही थी। कहने का आशय यह है कि उस दौर में ये दो अभिनेत्रियां थीं, जिनको आवश्यक होने पर एक-दूसरे के साथ बदला जा सकता था।
लेकिन आज से लगभग ढाई दशक पूर्व मात्र 19 साल की उम्र में दिव्या भारती अचानक ही दुनिया को छोड़कर चली गईं। आज श्रीदेवी की मौत पर जैसी कसक दिखाई दे रही है, वैसी ही तब दिव्या भारती की मौत पर भी सिनेमाप्रेमियों को हुई थी। 13 अगस्त-1963 को चेन्नई के शिवकाशी में जन्मीं श्री अम्मा येंगर अय्यपन के लिए भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार श्रीदेवी बन जाने की यात्र सरल बिल्कुल भी नहीं रही। 1979 में अमोल पालेकर के साथ आई बॉलीवुड में उनकी पहली फिल्म सोलवा सावन बुरी तरह से फ्लॉप रही थी। इसके बाद के अगले चार साल उनके लिए काफी कठिन रहे। इस दौरान उन्होंने कई फिल्में कीं, लेकिन कोई खास कामयाब नहीं मिली।
आखिर सन 1983 में के. राघवेंद्र राव द्वारा निर्देशित फिल्म हिम्मतवाला में उन्हें तब के सुपरस्टार रहे जीतेंद्र के साथ मुख्य अभिनेत्री के रूप में लिया गया। ये फिल्म न केवल बड़ी हिट रही, बल्कि बॉलीवुड में श्रीदेवी के सफर के लिए मील का पत्थर भी साबित हुई। इस फिल्म के गीत और श्रीदेवी पर फिल्माए गए गाने आज भी बेहद लोकप्रिय हैं। यह फिल्म भी उनकी बेहतरीन फिल्मों में से एक है। हिम्मत तो श्री में पहले से ही थी, लेकिन हिम्मतवाला की सफलता ने उनमें आत्मविश्वास भी भर दिया और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद उन्होंने मवाली, तोहफा, बलिदान, धरम अधिकारी आदि तमाम सफल मसाला फिल्में कीं, जिनमें अभिनय से अधिक उनके रूप-वैभव का चित्रण हुआ था।
1983 में कमल हासन के साथ आई उनकी फिल्म सदमा ने उनमें छिपी अभिनय की बहुआयामी क्षमता को भी लोगों के सामने लाने का काम किया था। यह फिल्म व्यावसायिक रूप से तो औसत सफल रही, लेकिन इसमें श्रीदेवी के अभिनय को सराहा खूब गया। यह उनकी अभिनय क्षमता को उभारने वाली फिल्म साबित हुई। इस फिल्म ने नायक प्रधान फिल्मों के उस दौर में भी श्रीदेवी को एक नायिका के रूप में मजबूती से पेश किया। परिणाम यह हुआ कि इसके बाद आई कई फिल्मों में उनके किरदार को केवल अदाओं तक सीमित रखने की बजाय नायक के बराबर सशक्त ढंग से गढ़ा गया। इस बात का एक सशक्त उदाहरण 1992 में आई खुदा गवाह जिसमें अभिनेता की भूमिका में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन थे, में श्रीदेवी द्वारा निभाए गए बेनजीर के किरदार के रूप में देखा जा सकता है।
इसके अलावा नगीना, निगाहें, चालबाज, लाडला आदि तमाम और फिल्मों में उनका मजबूत किरदार दिखाई देता है। ये सब फिल्में सुपरहिट रही थीं, जिससे जाहिर है कि नायक प्रधान फिल्मों के उस युग में इस मजबूत नायिका को लोगों ने खूब पसंद किया। हाल के वर्षो में भी उनकी दो फिल्में इंग्लिश-विन्ग्लिश और मॉम आईं। ये दोनों ही फिल्में अलग-अलग कथानक के साथ मां के किरदार के इर्द-गिर्द रही थीं। ये फिल्में व्यावसायिक रूप से कुछ खास सफल नहीं रहीं, लेकिन इनमें श्रीदेवी द्वारा अभिनीत मां के किरदार इतने मजबूत और प्रभावी हैं कि हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे और इन फिल्मों को भी महत्वपूर्ण बनाए रखेंगे। भारत में तो श्रीदेवी ने दिलों पर राज किया, भारत से बाहर पाकिस्तान और दूसरे देशों में भी उनका जलवा कम नहीं था।
पाक में भी ट्विटर पर श्रीदेवी को लेकर चर्चा जारी है। पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर ने ट्वीट करके बताया कि रविवार को टीवी चैनल जिओ न्यूज ने हेडलाइन्स में पहले पांच मिनट तक श्रीदेवी को याद किया। सिंगापुर में तो एक रेस्तरां सिर्फ इसलिए मशहूर है, क्योंकि वहां श्रीदेवी जैसी और उनके नाम पर एक गुड़िया है। जापान जैसे देशों में भी श्रीदेवी का खूब नाम था और वहां की मीडिया में भी श्रीदेवी के निधन से जुड़ी खबरें लगातार आ रही हैं। श्रीदेवी की फिल्म इंग्लिश विंग्लिश जापान में भी रिलीज हुई थी। फिल्म रूप की रानी चोरों का राजा में श्रीदेवी एक सीन में जापानी लड़की के लिबास (कीमोनो) और किरदार में नजर आई थीं और इसका इस्तेमाल जापान में फिल्म प्रमोट करने के लिए भी किया गया था।
जब जापान में फिल्म आई थी, तो प्रधानमंत्री शिंजो आबे की पत्नी खास तौर पर इसे देखने गई थीं। रजनीकांत के बाद श्रीदेवी पहली ऐसी भारतीय एक्टर थीं जो जापान में इतनी लोकप्रिय हुईं। मलेशिया की मीडिया में भी श्रीदेवी से जुड़ी खबरें छाई हुई हैं। 50 साल के करियर में लोगों ने हिंदी, तेलुगू, मलयालम और तमिल फिल्मों में उन्हें कई बार देखा, लेकिन ये किसी ने नहीं सोचा था कि मॉम उनके जीवित रहते आखिरी फिल्म होगी। शाहरुख खान की जीरो में भी श्रीदेवी दिखाई देंगी। इसमें वे एक छोटे रोल यानी मेहमान भूमिका में नजर आएंगी। कुछ महीने पहले शाहरुख और करिश्मा कपूर ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट में तस्वीर पोस्ट की थी, जिसमें श्रीदेवी, करिश्मा, काजोल, रानी और आलिया नजर आ रही हैं।
कहा जाता है कि जया प्रदा के साथ उनकी नहीं बनती थी। दोनों एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करती थीं। एक बार सुपरस्टार राजेश खन्ना और जीतेंद्र ने दोनों के बीच पैचअप कराने के मकसद से दोनों को एक कमरे में दो घंटे के लिए बंद कर दिया। दोनों सुपरस्टार मानते थे कि ऐसा करने से शायद उनके रिश्तों के बीच जमी बर्फ पिघल जाए लेकिन जब दो घंटे बाद दरवाजा खोला गया, तो पता चला कि दोनों उस कमरे के दो कोनों पर चुपचाप बैठी हैं। दो घंटे तक दोनों ने एक-दूसरे से बात करना तो दूर एक दूसरे की शक्ल तक नहीं देखी। खैर, जयाप्रदा के अलावा उनका किसी से बैर नहीं था। वैसे, कहा जाता है कि बाद में वे जयाप्रदा के निकट आ गई थीं।
श्रीदेवी में सभी को अपना बना लेने की खूबी थी। शायद यही वजह कि उनके चले जाने के बाद हर कोई उन्हें विदाई देने उमड़ पड़ा। श्रीदेवी अब भले ही हमारे बीच न हों, मगर उनके अभिनय की ताजगी, उनके सौंदर्य की खुशबू और उनकी अदाओं की चंचलता कभी नहीं मिट सकती। श्रीदेवी उन लोगों में से एक थीं, जिनकी कभी मौत नहीं होती। वे सदा लोगों की यादों में जीवित रहते हैं। ऐसे सितारे वर्षो में एक बार जन्म लेते हैं और अपने जीवन की सार्थकता साबित कर जाते हैं और दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं।

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