बुराड़ी की घटना के मायने बेहद गंभीर


राजएक्सप्रेस, भोपाल। देश में अंधविश्वास की जड़ें कितनी गहरी हैं यह बुराड़ी की घटना (Burari Case)से एक बार साबित हो गया है। इसी तरह का एक मामला कुछ वर्षों पहले राजस्थान में सामने आया था। सवाल है कि आखिर हम सही-गलत की पहचान को लेकर आज तक दुविधा में क्यों फंसे हुए हैं?
राष्ट्रीय राजधानी या देश के किसी और हिस्से में आत्महत्या की घटनाएं पहले भी होती रही हैं। मगर एक ही परिवार के 11 सदस्यों की आत्महत्या ने पूरे देश को जरूर सकते में डाल दिया है। संत नगर के बुराड़ी में हुई इस सामूहिक आत्महत्या का केस इससे पहले शायद ही देखा गया हो। आम तौर पर आत्महत्या करने की वजह तनाव या पैसे की तंगी होती है। कई बार किसी बेहद करीबी शख्स की मौत या लंबी बीमारी से भी परेशान होकर लोग आत्महत्या कर लेते हैं। हालांकि, परिवार के 11 सदस्यों की आत्महत्या में अब तक मिली जांच में पता चला है कि परिवार ने शायद तंत्र-मंत्र के प्रभाव में आकर ऐसा कदम उठाया। इस मामले ने 29 सितंबर 2013 के उस मामले की याद ताजा कर दी है, जिसमें राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के गंगापुर सिटी में तीन बच्चों समेत परिवार के सभी आठ लोगों ने होली से एक दिन पहले आत्महत्या कर ली थी। इन सभी ने पहले तो भगवान शिव के साक्षात दर्शन करने के लिए हवन किया। इसके बाद भी जब उन्हें भगवान के दर्शन नहीं हुए तो परिवार के सभी लोगों ने मरने के बाद स्वर्ग में शिव से मिलने के मकसद से जहर मिला हुआ प्रसाद खा लिया।
तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास के चक्कर में फंसे बुराड़ी के परिवार की और राजस्थान की घटना में काफी हद तक समानता है और सवाल एक कि आखिर विकास की दौड़ में आज भी अंधविश्वास हमारे पैरों में क्यों बेड़ियां बना हुआ है। बुराड़ी कांड में अब तक जो निष्कर्ष सामने आए हैं, वह अंधविश्वास की ओर इशारा कर रहे हैं। आगे कुछ और सामने आ जाए, तो कह नहीं सकते। मगर अब तक मिले सुराग व तथ्यों पर गौर करें, तो पाएंगे कि हम अंधविश्वास को कितना भी बुरा-भला कहें पर सच्चाई यह है कि इससे कोई बाहर भी नहीं आना चाहता। विडंबना है कि लोग यह मानने को तैयार रहते हैं कि घर के बाहर रंगोली बनाने से उनके घर में लक्ष्मी आएगी लेकिन यह नहीं समझते कि ऐसा घर को साफ रखने के लिए किया जाता है। हमारा भारतीय समाज भय की अधिकता के कारण 21वीं सदी में भी 18वीं सदी की विचारधारा से ओतप्रोत है। जहां दूसरे देश निरंतर प्रगति के रास्ते पर चल महाशक्ति बन बैठे हैं, तो भारत धर्म, पूजापाठ और अंधविश्वास के चलते लगातार पीछे जा रहा है।
किसी देश की उन्नति अंधविश्वासों के सहारे नहीं हो सकती। उस के लिए कर्मठता की जरूरत होती है। अमीर देशों में भी अंधविश्वासी हैं पर वहां अंधविश्वास विरोधियों, तार्किकों और वैज्ञानिकों की संख्या भी काफी है, जो समाज को निरंतर आगे ले जाते रहते हैं। ऐसे लोगों की कमी अपने देश में भी नहीं है, बस संख्या में ये कम हैं। इसी के चलते विश्वास पर अंधविश्वास भारी पड़ जाता है। कई सरकारों ने अंधविश्वास को लेकर कानून बनाया है, लेकिन वह कानून तब तक असर नहीं दिखा सकता, जब तक राजस्थान और बुराड़ी जैसी घटनाएं हमें मुंह चिढ़ाती रहेंगी।

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