अब खत्म हो लोकपाल का इंतजार


राज एक्सप्रेस भोपाल। लोकपाल (Lokpal Bill)की नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को समयबद्ध प्रगति की जानकारी 10 दिन के भीतर शपथ-पत्र के जरिए देने को कहा है। लोकपाल की नियुक्ति का रास्ता साफ  कर न्यायालय ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में बड़ा काम किया है। अब सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि जो काम चार साल से अटका पड़ा है, उसे पूरा करे और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार की जो मंशा है, उसे भी पूरा करे।
लोकपाल की नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को समयबद्ध प्रगति की जानकारी 10 दिन के भीतर शपथ-पत्र के जरिए देने को कहा है। दरअसल साढ़े चार साल पहले लोकपाल कानून बन जाने के बावजूद भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। नियुक्ति न हो पाने की पृष्ठभूमि में वर्तमान लोकसभा में विपक्ष के नेता के नहीं होने का तर्क सरकार अदालत को दे रही है। लोकपाल नियुक्ति की जो प्रक्रिया है, उसमें विपक्ष के नेता को भी एक सदस्य के रूप में शामिल किया जाना है। दरअसल 2014 के आम चुनाव के बाद लोकसभा का जो गणित बना है, उसमें किसी भी दल के पास विपक्षी दल की हैसियत नहीं है। विपक्षी दल नहीं है, इसलिए विपक्ष का नेता भी नहीं है। हालांकि, कांग्रेस 44 सदस्यों के साथ लोकसभा में सबसे बड़ा विपक्षी दल है, पर सदन में उसी पार्टी का नेता प्रतिपक्ष बनता है, जिसकी लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या कम से कम 10 प्रतिशत हो। वर्तमान में किसी भी विपक्षी पार्टी के सदस्यों की संख्या 10 प्रतिशत नहीं है। लिहाजा कांग्रेस के नेता मल्लिकाजरुन खड़गे को लोकसभा अध्यक्ष ने प्रतिपक्ष का नेता मानने की कांग्रेस की अपील खारिज कर दी थी। हालांकि, न्यायालय ने पिछले साल दिए एक फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता ही नेता प्रतिपक्ष कहलाएगा। बावजूद इसके लोकपाल की नियुक्ति का रास्ता साफ नहीं हो पाया है। लेकिन अब न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और आर. भानुमति की पीठ ने निर्देश दिया है कि प्रस्तावित संशोधनों को संसद में पारित होने तक लोकपाल कानून को निलंबित रखना न्यायोचित नहीं है।
लोकसभा में लोकपाल संशोधन विधेयक-2013 लंबित है। यह विधेयक जब लाया गया था तब भाजपा ने दोनों सदनों में समर्थन दिया था। अब एक-दो नहीं मूल विधेयक के प्रारूप में 20 संशोधन प्रस्तावित कर दिए हैं। इस कारण विपक्षी दल इसे पारित करने में सहमत नहीं है। गांधी जी ने कहा था कि ‘सच्चा स्वराज थोड़े से लोगों द्वारा सत्ता हासिल कर लेने से नहीं, बल्कि जब सत्ता का दुरुपयोग हो, तब सब लोगों द्वारा उसका प्रतिकार करने की क्षमता जगा कर ही प्राप्त किया जा सकता है।’ इस नजरिए से राजकाज में बदलाव लाने का यह सक्रिय हस्तक्षेप व इसकी प्रासंगिकता दोहराई जाती रहनी चाहिए। जिससे इस प्रक्रिया के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र ने जो उपलब्धि हासिल की है, उसकी निरंतरता बनी रहे। क्योंकि अब भ्रष्टाचार की व्यापकता और उसकी स्वीकार्यता की महिमा जिस अनुपात में समाज में व्याप्त हो चुकी है, उसका निमरूलन हालांकि इस अकेले कानून से संभव नहीं है, लेकिन लोकपाल अस्तित्व में आना चाहिए। इससे संबंद्ध जो पूरक विधेयक लंबित हैं, उनके प्रारूप को भी वैधानिक दर्जा मिलना अत्यंत जरूरी है। तभी, लोकपाल जैसे सशक्त प्रहरी की वास्तविक सार्थकता सामने आएगी। लोकसेवकों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता व उत्तरदायित्व के समावेश भी तभी परिलक्षित हो सकेंगे। अगर विपक्ष या सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा जन हस्तक्षेप कालांतर में जारी नहीं रहता है तो लोकपाल जनता की जागी उम्मीदों पर खरा उतरने वाला नहीं है। केंद्र सरकार की लोकपाल के बाबत शिथिलता के चलते लग रहा है कि संसद में किसी एक दल को असाधारण बहुमत मिलना लोकपाल के मार्ग में बड़ी बाधा है, क्योंकि ऐसे में कोई विपक्षी पार्टी नेता प्रतिपक्ष के पद की अधिकारी नहीं रह जाती। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसी ही स्थिति में लोकपाल की अधिक जरूरत है, जिससे लोकसेवक भय का अनुभव करते रहें। हमारे देश में 1963 में पहली बार लोकपाल की अवधारणा सामने आई थी, लेकिन आज 55 साल बाद भी यह फलीभूत नहीं हो पाई है।
स्वतंत्र भारत में भ्रष्टाचार का सुरसामुख लगातार फैल रहा है। इसने सरकारी विभागों से लेकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ी सभी संस्थाओं को अपनी चपेट में ले लिया है। शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी मानवीय मूल्यों से जुड़ी संस्थाएं भी अछूती नहीं रहीं? नौकरशाही को तो छोड़िए, देश और लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद की संवैधानिक गरिमा बनाए रखने वाले सांसद भी सवाल पूछने व पत्र लिखने के एवज में रिश्वत लेने से नहीं हिचकिचाते। जाहिर है, भ्रष्टाचार लोकसेवकों के जीवन का एक तथ्य मात्र नहीं, बल्कि शिष्टाचार के मिथक में बदल गया है। जनतंत्र में भ्रष्टाचार की मिथकीय प्रतिष्ठा उसकी हकीकत में उपस्थिति से कहीं ज्यादा घातक इसलिए है, क्योंकि मिथ हमारे लोक-व्यवहार में आदर्श स्थिति के नायक-प्रतिनायक बन जाते हैं। राजनीतिक व प्रशासनिक संस्कृति का ऐसा क्षरण राष्ट्र को पतन की ओर ले जाएगा? इसीलिए साफ  दिखाई दे रहा है कि सत्ता पक्ष की गड़बड़ियों पर सवाल उठाना, संसदीय विपक्ष के बूते से बाहर होता जा रहा है। विडंबना यह है कि जनहित से जुड़े सरोकारों के मुद्दों को सामने लाने का काम न्यायपालिका को करना पड़ रहा है। राजनीतिक संस्कृति के इस क्षरण और पतन को रोकने का पहला दायित्व तो उस विधायिका का था, जो रामलीला मैदान में अन्ना आंदोलन के चरम उत्कर्ष पर पहुंचने के दौरान संसद की सर्वोच्चता और गरिमा का स्वांग तो रच रही थी, पर जनता को दोषमुक्त शासन-प्रणाली देने की दृष्टि से एक कदम भी कानूनी प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा रही थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि संविधान के अनुसार संसद हमारे राष्ट्र की सर्वोच्च विधायी शक्ति व संस्था है। लोकतांत्रिक राजनीतिक संरचना में उसी का महत्व सवरेपरि है। लेकिन जिस तरह से वह व्यापक व समावेशी भूमिका निर्वहन में गौण होती चली जा रही है, उस परिप्रेक्ष्य में उसकी कार्य संस्कृति का प्रदूषित होते जाना तो था ही, जन सरोकारों से आंखे मूंद लेना भी था। संसद की गरिमा को क्षत-विक्षत करने का काम विधायिका में स्थापित होती जा रही व्यक्ति केंद्रित राजनीतिक शैली ने भी किया है।
राजनेताओं की उम्मीदवारी का निर्धारण उसकी आर्थिक व जातीय हैसियत से किए जाने के कारण भी इस जनतांत्रिक व्यवस्था का क्षय हुआ है। राजनीति में अर्थ की महत्ता ने नैतिक सरोकारों को हाशिए पर खदेड़ दिया। संविधान निर्माताओं ने समता व न्याय पर आधारित और मानवीय गरिमा से प्रेरित भारतीय संप्रभुता के जो आदर्श रचे थे, उसकी अवहेलना इसी विधायिका ने की। संविधान-सम्मत कोई भी व्यवस्था कितनी भी श्रेष्ठ क्यों न हो, उसकी स्वीकार्यता तभी संभव होती है, जब जनता का बहुमत उसके साथ हो। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा की बैठक में कहा था, ‘संविधान का कार्य पूर्णत: संविधान की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता। संविधान सिर्फ विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को शक्ति देता है। राज्य के इन स्तंभों की क्रियात्मकता जिन कारकों पर अवलंबित है, वे हैं जनता-जर्नादन व राजनीतिक दल। उनकी आकांक्षाएं और राजनीति ही मुख्य निर्धारक आधार बिंदु हैं। जनता और दलों के भावी व्यवहार के बारे में कौन सटीक आकलन कर सकता है?’ अंबेडकर की आशंका सही साबित हुई। कालांतर में राजनीतिकों के व्यक्तित्व से सैद्धांतिक व्यवहार और आमजन के प्रति विश्वास दुर्लभ तत्व हो गए हैं। राजनीति परिणाममूलक रहे, इसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था लोक की निगरानी में रहे। इसी के समानांतर विधायिका व कार्यपालिका का दायित्व बनता है कि जनतंत्र से उपजने वाली असहमतियों का वह सम्मान करे और उसके अनुरूप चले।
डॉ. प्रमोद भार्गव (वरिष्ठ पत्रकार)

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