गुजरात चुनाव को लेकर अब सोशल मीडिया पर भी जीत हार के कयास लगने शुरू



राजनीति अपनी जगह है, उसे लेकर सोशल मीडिया पर चर्चाएं अपनी जगह, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। गुजरात के भावी चुनावों को लेकर जिस तरह सोशल मीडिया पर आक्रामक चर्चाएं जारी हैं, उससे आसानी से यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां इस बार कयास आसान नहीं है। जिस तरह चुनाव आयोग ने पहले हिमाचल प्रदेश की तारीखों का ऐलान कर दिया और गुजरात की तारीखों को रोके रखा, उससे भी इसी आशंका को बल मिला है। लेकिन अपने चुनावी सर्वेक्षणों की साख के लिए विख्यात सीएसडीएस के संजय कुमार के मुताबिक, जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सीएसडीएस के सर्वेक्षण नतीजों के मुताबिक अगर गुजरात के लोगों की सोच मौजूदा स्तर पर बनी रही तो निश्चित तौर पर एक बार फिर गुजरात में भाजपा की सरकार बनेगी।
भारत जैसे देश में राजनीति में नतीजों का सही-सही अनुमान लगा पाना किसी के लिए संभव नहीं है। लेकिन यह भी हकीकत है कि चुनाव नतीजों का मोटा अनुमान उस क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे नेताओं को लग जाता है। आपसी बातचीत में कांग्रेसी नेता यह स्वीकार कर रहे हैं कि पिछली बार के नतीजों की तुलना में इस बार अगर उन्होंने दस-पंद्रह सीटें भी ज्यादा जीत लीं तो उसे वे अपनी जीत मानेंगे। पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 182 सदस्यीय विधानसभा में 115 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को पिछले चुनाव की तुलना में एक सीट ज्यादा मिली थी। तब भी कांग्रेस पार्टी ने इसे अपनी ही कामयाबी माना था।
यह ध्यान देने की बात है कि तब भाजपा से नाराज केशुभाई पटेल ने अलग पार्टी गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में दस्तक दी थी। तब माना गया था कि उनकी मौजूदगी से भाजपा की हार हो सकती है। चूंकि, केशुभाई पटेल गुजरात के ताकतवर पाटीदार नेता हैं, इसलिए माना जा रहा था कि उनकी वजह से कांग्रेस को फायदा मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। पांच साल बाद भाजपा के लिए हालात फिर वैसे ही हैं। बस अंतर इतना है कि इस बार केशुभाई की जगह हार्दिक पटेल चुनौती दे रहे हैं। लेकिन सीएसडीएस के सर्वेक्षणों के मुताबिक हार्दिक पटेल भाजपा को चुनौती देते नजर नहीं आ रहे हैं।
वैसे गुजरात में हार्दिक की तरह क्षत्रियों के युवा नेता अल्पेश ठाकोर व दलितों के आंदोलनकारी नेता जि™ोस मेवानी भी भाजपा को चुनौती देते नजर आ रहे हैं। ये नेता अपनी जातियों में लोकप्रिय तो हैं, पर उनकी अपील सीएसडीएस के मुताबिक बाहरी समुदायों में अभी नहीं है। गुजरात का स्थानीय मतदाता भी अब इस तथ्य को समझ रहा है। यही वजह है कि सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक राज्य के ब्राह्मणों, पटेलों एवं दूसरी ऊंची जातियों में भाजपा की लोकप्रियता बनी हुई है। ब्राह्मण व पटेल समुदाय के 72-72 और ऊंची जाति के 74 फीसद लोग भाजपा को ही पसंद कर रहे हैं। इसी तरह 69 प्रतिशत कोली, 56 प्रतिशत क्षत्रिय, अन्य पिछड़ी जातियों के 66 प्रतिशत लोगों का समर्थन भाजपा को ही जा सकता है। अनुसूचित यानी दलित जातियों में भाजपा की हालत जरूर खराब दिखती है, जिसमें उसकी लोकप्रियता 39 प्रतिशत है, पर उसके मुकाबले अनुसूचित जन जातियों का 55 प्रतिशत वोटर भाजपा की ओर झुका हुआ है। और तो और 27 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता भी भाजपा से सहानुभूति रख रहा है।
निश्चित तौर पर बाकी वोट कांग्रेस की ओर जाता दिख रहा है, लेकिन यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि गुजरात के एक और ताकतवर नेता शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया है। इसके बाद कांग्रेस के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जो पूरे राज्य में न सिर्फ पहचाना जाता हो, बल्कि प्रभावी भी हो। वैसे भी जिस तरह प्रधानमंत्री ने गुजरात में बोलते हुए 2024 के चुनावों पर ध्यान देने की बात की है, उससे उनका आत्मविश्वास साफ झलकता है। इसके बावजूद 2014 के आम चुनावों का नतीजा राज्य में दोहराया जाना मुमकिन नहीं लगता। तब 60 प्रतिशत वोट हासिल करके भाजपा ने राज्य की सभी 26 सीटें जीत ली थीं। चूंकि, विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे भी हावी रहेंगे, इसलिए वह नतीजा दोहरा पाना भी आसान नहीं होगा।
हिमाचल प्रदेश की 68 विधानसभा सीटों के लिए भी चुनावी रणभेरी बज चुकी है। राज्य का अब तक का रिकॉर्ड यही रहा है कि एक बार वहां कांग्रेस जीतती है तो दूसरी बार भारतीय जनता पार्टी। चूंकि इन दिनों राज्य में कांग्रेस की सरकार है तो इस लिहाज से माना जा सकता है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी को ही मौका मिलेगा। लेकिन इसमें इस बार महत्वपूर्ण होगा राज्य के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू के बीच जारी शीतयुद्ध। मुख्यमंत्री वीरभद्र की विपरीत राय के बाद भी कांग्रेस आलाकमान ने सुक्खू को न सिर्फ राज्य के संगठन की कमान सौंपी है, बल्कि उन्हें तवज्जो देना भी जारी रखा है, जिसे लेकर सीएम वीरभद्र ने अपनी नाराजगी सार्वजनिक करने में भी देर नहीं लगाई। लेकिन वीरभद्र ने भी हार नहीं मानी है। इसका असर यह हुआ है कि सुक्खू की जगह वीरभद्र को ही चुनाव अभियान की कमान कांग्रेस को सौंपनी पड़ी। बहरहाल, इस अंदरूनी खींचतान का असर वहां के मतदाताओं ही नहीं, संगठन पर भी पड़ना तय है। इसलिए कांग्रेस की हालत खराब हो सकती है।
दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी पूरे उत्साह में है। राज्य में पहले दो ही धड़े होते थे, एक तरफ शांता कुमार तो दूसरी तरफ प्रेम कुमार धूमल। लेकिन इन दिनों राज्य के तीसरे बड़े नेता केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जयप्रकाश नड्डा भी उभर आए हैं। बेशक, शांता कुमार ज्यादा उम्र होने के चलते मार्गदर्शक मंडल में शामिल कर दिए गए हैं, लेकिन यह मान लेना कि जीत के बाद धूमल को ही कमान मिलेगी, ऐसी सोच जल्दबाजी होगी। यह तथ्य राज्य का पार्टी कार्यकर्ता भी समझता है। बहरहाल भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तरफ से किसी को भी नेता बनाने का ऐलान नहीं किया है, इसलिए पार्टी उम्मीद कर सकती है कि उसके तीनों बड़े नेता राज्य में पार्टी की जीत के लिए जोर लगाएंगे। गुरदासपुर उपचुनाव में कांग्रेस के सुनील जाखड़ की एक लाख 93 हजार वोटों से जीत के बाद कांग्रेसी खेमा उत्साहित है। इन संदर्भो में देखें तो गुजरात और हिमाचल के चुनावों की जीत-हार भावी राष्ट्रीय राजनीति की भी दिशा तय करेगी।
अगर एक भी राज्य में भारतीय जनता पार्टी की हार होती है तो 2019 के आम चुनावों के लिए विपक्ष एकजुट होने और इसके जरिए मोदी को चुनौती देने की तैयारी में जुट सकता है। लेकिन अगर दोनों ही राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को जीत हासिल होती है, तो तय है कि पार्टी का उत्साह कुलांचें भरेगा। तब नोटबंदी व जीएसटी से सवालों में घिरी भाजपा इन मुद्दों को दरकिनार करने की कोशिश करेगी। लेकिन अगर एक भी राज्य में उसे हार मिलती है या फिर खींच तानकर सरकार बनाने का मौका मिलता है तो उसे जीएसटी और नोटबंदी को लेकर नई रणनीति बनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। अब देखते हैं कि दोनों राज्यों में ऊंट किस करवट बैठता है।

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