मणिशंकर अय्यर को बाहर कर कांग्रेस ने उम्दा काम किया, दिखाया दूसरों को रास्ता



राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले पार्टी जिस पुराने चोले को उतार फेंकने की ओर बढ़ रही है, वह अच्छे दिनों की ओर लौटने का संकेत है। गुजरात चुनाव के दौरान पार्टी के नेताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए असंसदीय भाषा का प्रयोग न करने की नसीहत देने से लेकर मणिशंकर अय्यर को पार्टी से बाहर करने तक का फैसला इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। गौरतलब है कि गुरुवार को अय्यर ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए बेहद निचले स्तर की बयानबाजी करते हुए कहा था कि ‘इस आदमी में कोई सभ्यता नहीं है और ऐसे मौके पर इस किस्म की गंदी राजनीति करने की क्या आवश्यकता है?’ इस बयान के आने के बाद भाजपा और खुद मोदी ने कांग्रेस को घेरने में कसर बाकी नहीं रखी। मगर रात होते तक राहुल सक्रिय हुए और न सिर्फ अय्यर को माफी मांगनी पड़ी, बल्कि उन्हें बाहर का रास्ता भी देखना पड़ा। इस पूरे एपिसोड में लोगों ने कांग्रेस को खलनायक से नायक बनते भी देखा और इस बात पर भी बहस शुरू हुई कि अगर पार्टी नेतृत्व सख्ती से पेश आए, तो फिर राजनीति में भाषा के गिरते स्तर को बचाया जा सकता है।
राजनीति में भाषा में आ रही गिरावट के प्रति चिंतित तो सभी हैं, मगर इस समस्या का इलाज कोई नहीं ढूंढ रहा है। याद होगा कि दिल्ली में चुनाव के दौरान मोदी सरकार में मंत्री निरंजन ज्योति ने विपक्ष के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। विपक्ष ने न सिर्फ इसे मुद्दा बनाया, बल्कि संसद को भी ठप रखा। पार्टी नेता तो साध्वी के पक्ष में खड़े दिखे, मगर मोदी की सख्ती के बाद साध्वी को माफी मांगनी पड़ी। अमर्यादित बयान के बाद अपने नेता को बचाने की कार्यशैली ही बदलाव लाने में बाधक है। पहले मोदी और अब राहुल ने भले ही पहल की हो, मगर इससे कुछ होने वाला नहीं है। बदलाव की चाह तभी पूरी होगी, जब सभी पार्टियां अपने बेलगाम नेताओं के प्रति इसी तरह सख्ती से पेश आएंगी। कुछ दिन पहले ही बिहार में राजद नेता तेज प्रताप यादव के बोल बचन को कोई भूला नहीं होगा। जब वे प्रधानमंत्री की खाल उधेड़ देने तक की चेतावनी दे रहे थे। पर तेज प्रताप पर कार्रवाई तो दूर, आज तक उनके पिता लालू प्रसाद यादव ने पेशी भी नहीं लगाई है।
हमारे देश में ऐसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है, जो विवादित बयान देने में सबसे आगे हैं। अब सड़क की भाषा का प्रयोग संसद तक में होने लगा है। आजकल राजनीतिक विरोधियों और दूसरी विचारधारा के लोगों के खिलाफ गुस्सा और उनसे अलग मत जाहिर करने के लिए ‘भाषाई अनुदारवाद’ का बेरोक-टोक इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन कोई भी दल या समाज इस पर चिंता जाहिर नहीं करना चाहता है। एक दौर में हमारे राजनेताओं का आचरण शालीन और विनम्र होता था। आज के दौर में गिने-चुने राजनेता ही ऐसे रह गए हैं, जो अपने बोलचाल में मर्यादित भाषा का उपयोग करते हैं। लेकिन अब राजनीति में भाषा की मर्यादा को बचाए रखने के लिए सभी पार्टियों को पहल करनी होगी। यह काम ज्यादा कठिन भी नहीं है। मणिशंकर अय्यर को बाहर कर कांग्रेस ने रास्ता दिखा भी दिया है।

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