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हाफिज पर पाक को फिर फटकार

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राजएक्सप्रेस,भोपाल। अमेरिका ने मुंबई हमले के मास्टर माइंड और जमात-उद-दावा सरगना हाफिज सईद (Hafiz Saeed) को बड़ा झटका दिया है। उसने इस अंतरराष्ट्रीय गुनहगार का राजनीतिक चेहरा बनाने जा रही पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग (Milli Muslim League) और सात नेताओं को आतंकवादी घोषित करते हुए प्रतिबंधित कर दिया है। अमेरिका का यह कदम ऐसे वक्त में आया है, जब पाकिस्तान में चुनावी सुगबुगाहट के बीच कई नए राजनीतिक दल पंजीकरण की फिराक में हैं। मगर सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान इससे सीख लेगा। पाकिस्तान में आम चुनाव से पहले अमेरिका ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद (Hafiz Saeed) की राजनीतिक पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग  (एमएमएल)  को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। इतना ही नहीं अमेरिका ने एमएमएल के सात सदस्यों को भी आतंकी घोषित किया है। अमेरिका ने तहरीक-ए-आजादी-ए-कश्मीर को भी आतंकी संगठनों की सूची में डाला है। तहरीक को लश्कर-ए-तैयबा का फ्रंट माना जाता है, जो अमेरिका के मुताबिक पाकिस्तान में बिना रोक-टोक संचालित होता है। इससे एक दिन पहले ही पाकिस्तान चुनाव आयोग ने एमएमएल क...

देश पर बोझ है दो जगहों से चुनाव

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राजएक्सप्रेस,भोपाल। चुनाव आयोग (Election Commission) ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर एक प्रत्याशी के एक सीट पर ही चुनाव लड़ने की याचिका का समर्थन किया है। यह प्रावधान अब बनना ही चाहिए, क्योंकि नेता सरकारी खजाने को चपत लगाने के साथ अपना हित भी साधते जा रहे हैं। चुनाव आयोग (Election Commission) ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर एक प्रत्याशी के एक सीट पर ही चुनाव लड़ने की याचिका का समर्थन किया है। चुनाव आयोग ने कहा है कि एक प्रत्याशी जब दो जगहों से जीतता है तो एक सीट से इस्तीफा देता है। ऐसे में इस सीट पर दोबारा चुनाव होते हैं और अतिरिक्त खर्च होता है। वकील और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने  ‘वन कैंडिडेट वन सीट’  का फॉर्मूला लागू करने लिए याचिका डाल रखी है। इस याचिका के तहत लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33(7) को चुनौती दी गई है। साथ ही मांग की गई है कि संसद और विधानसभा समेत सभी स्तरों पर एक उम्मीदवार के दो सीटों पर चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए। चुनाव आयोग भी याचिकाकर्ता की इस मांग से सहमत है। चुनाव आयोग इससे पहले भी इस फॉमरूला को अपना सम...

अन्ना का अनशन नहीं जीत पाया भरोसा

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राजएक्सप्रेस, भोपाल। सात साल पहले का रामलीला मैदान और अन्ना हजारे का अनशन (Anna Hazare Strike) आज भी लोगों को याद है। हाल ही में एक बार फिर अन्ना आंदोलन कर चुके हैं, लेकिन इस बार लोगों की सोच भी अलग थी और अन्ना के साथी भी। नतीजतन, जन समर्थन भी उतना नहीं मिल पाया, जितना पिछले आंदोलन को मिला था। पिछले आंदोलन का सार लोगों में इस कदर अविश्वास भर चुका था कि इस बार जनता ने दूरी बनाना ही उचित समझा। सात साल पहले का रामलीला मैदान और अन्ना हजारे का अनशन आज भी लोगों को याद है। वह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का आगाज ही नहीं, बल्कि बदलाव और बेहतरी की उम्मीदों के लिए बजा एक बिगुल था। पूरे देश में एक जनआंदोलन और व्यवस्था के प्रति आक्रोश पैदा करने वाली उस सैद्धांतिक लड़ाई के प्रति आमजन का मन से जुड़ाव था। हाल ही में एक बार फिर अन्ना आंदोलन कर चुके हैं, लेकिन इस बार लोगों की सोच भी अलग थी और अन्ना के साथी भी। नतीजतन, जन समर्थन भी उतना नहीं मिल पाया, जितना पिछले आंदोलन को मिला था। इसमें कोई संदेह नहीं कि 2011 का अन्ना आंदोलन एक बड़े बदलाव की गवाही था। बरसों से घोटालों का देश बन चुके...

बॉल टेम्परिंग क्रिकेट की पुरानी बीमारी

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राजएक्सप्रेस, भोपाल। (Ball Tampering Cricket) क्रिकेट ही नहीं, बल्कि समूचे खेल इतिहास में इस तरह की हरकतें अक्षम्य मानी गई हैं क्योंकि खेल कोई राजनीति नहीं, जहां साम, दाम, दंड, भेद का सिद्धांत चलता हो। मगर जिस तरह से खिलाड़ियों को इस अघोषित युद्ध में सिर्फ जीतने के लिए झोंक दिया गया है, उसे देखते हुए ऐसी घटनाएं स्वाभाविक लगने लगी हैं। क्रिकेट अभी बहुत सारे फॉर्मेट्स में खेला जाता है। ऐसे में जीतने की जिद में खिलाड़ी गलती कर बैठते हैं, जिसके नतीजे भी उन्हें भुगतने पड़ते हैं। यूं तो क्रिकेट को जेंटलमैन गेम कहा जाता है लेकिन इससे जुड़ी विवादास्पद खबरें भी समय-समय पर आया करती हैं। ताजा विवाद बॉल टेम्परिंग (गेंद के साथ छेड़छाड़) का है। इस विवाद ने ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम की जमकर फजीहत कर दी है। बॉल टेम्परिंग का पूरा मामला दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ केपटाउन टेस्ट में सामूहिक रूप से गेंद से छेड़छाड़ करने से जुड़ा है। यूं तो गेंद से छेड़छाड़ आसानी से पकड़ी नहीं जा सकती मगर दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ केपटाउन टेस्ट में मैदान में उपस्थित कैमरापर्सन ऑस्कर की नजरों से गेंद से छेड़छाड़ बच नहीं पा...

हिंसा समस्या का समाधान नहीं

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राजएक्सप्रेस, भोपाल। एससी/एसटी एक्ट में बदलाव (Changes in ST/SC Act) के विरोध में भारत बंद के दौरान हिंसा का जो स्वरूप दिखा है, वह स्वीकारने योग्य नहीं है। हिंसा किसी समस्या का अंतिम विकल्प होती है। यह बात प्रदर्शनकारियों को समझनी चाहिए। सरकारों को भी ऐसे मामलों में तत्परता दिखानी होगी। एससी/एसटी कानून में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में देशभर में दलित संगठनों का भारत बंद प्रदर्शन हिंसक हो गया। भिंड-मुरैना में हुई झड़प में जहां एक-एक युवक की मौत हो गई है। वहीं, ग्वालियर में दो लोगों के मरने की खबर है। उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद में भी एक शख्स की मौत हो गई, जबकि मेरठ में प्रदर्शनकारियों ने जमकर काफी उत्पात मचाया है। राजस्थान के बाड़मेर और मध्य प्रदेश के भिंड में दो गुटों में हुई झड़प में करीब 30 लोग जख्मी हुए। बाड़मेर में कई वाहनों में आग लगाई गई है। पंजाब, बिहार और ओडिशा में भी बंद का व्यापक असर है। यहां प्रदर्शनकारियों ने न सिर्फ ट्रेनें रोकीं, बल्कि सड़क जाम कर परिवहन व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाया। देश भर के कई जगहों पर कर्फ्यू लगा दिया गया है। दलित संगठनों के इ...

रूस विरोधी वैश्विक अंतर्विरोध

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राजएक्सप्रेस, भोपाल। Spy Poisoning ब्रिटेन (Britain) के नेतृत्व में शक्तिशाली यूरोपीय देश तथा व्यापार के लिए यूरोपियन यूनियन से जुड़े अनेक देश रूस से टकराव की स्थिति में पहुंच चुके हैं। यह टकराव भविष्य में किस रूप में सामने आएगा, यह बड़ा सवाल है। मगर इतना तो साफ है कि अगले कुछ दिनों में रूस विरोधी मानसिकता कुछ और देशों में देखने को मिल सकती है। यह घटनाक्रम भारत के लिहाज से भी अहम है। अत: हमें तटस्थता कतई नहीं दिखानी चाहिए। ब्रिटेन (Britain) के नेतृत्व में शक्तिशाली यूरोपीय देश तथा व्यापार के लिए यूरोपियन यूनियन से जुड़े अनेक देश रूस (Russia) से टकराव की स्थिति में पहुंच चुके हैं। इस टकराव का जो प्रमुख कारण प्रचारित व सार्वजनिक हुआ या हो रहा है, वह है ब्रिटेन में रह रहे पूर्व रूसी जासूस सर्गेई स्क्रिपल व उनकी 36 वर्षीय पुत्री पर विषमिश्रित रसायनिक हमला, जिसका आरोप ब्रिटेन ने रूस पर लगाया है। परिणामस्वरूप विगत 25 मार्च को अमेरिका ने भी रूस के विरुद्ध बड़ा कूटनीतिक निर्णय लेते हुए उसके 60 राजदूतों को गुप्तचर भूमिका निभाने के संदेह पर निष्कासित कर दिया। इनमें से 12 संयुक्त राष्ट्र ...

कर्नाटक में किस करवट बैठेगा ऊंट

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राजएक्सप्रेस, भोपाल। कर्नाटक में चुनाव (Karnataka Assembly Elections Analysis)का ऐलान होने के साथ ही भाजपा-कांग्रेस ने समीकरण अपने पक्ष में करने शुरू कर दिए हैं। भाजपा को सिद्धारमैया के अति क्षेत्रवाद की राजनीति से तो मुकाबला करना ही है, सिद्धारमैया ने जातीय समीकरण को साधने की जो कोशिश की है उससे भी निपटना है। सिद्धारमैया क्षेत्रवादी भावनाओं को उभारकर अपने विफलताओं को ढंकना चाहते हैं। तो भाजपा ने लिंगायत वोट के लिए उसके प्रमुख मठों का दौरा कर संतों से आशीर्वाद लेने की शुरुआत कर दी है। कर्नाटक (Karnataka) विधानसभा चुनाव का राजनीतिक महत्व आसानी से समझ में आने वाला है। अभी कांग्रेस की सिर्फ चार सरकारें- कर्नाटक, पंजाब, मिजोरम और पुडुचेरी  (केंद्रशासित)  हैं। इसलिए उसकी हर कोशिश 2013 में मिली विजय को बरकरार रखने की होगी। कांग्रेस को पता है कि कर्नाटक खोने के राजनीतिक मायने कितने घातक होंगे। न केवल दक्षिण का अंतिम राज्य उसके हाथों से निकल जाएगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा और नरेंद्र मोदी विरोधी विपक्षी दलों का गठबंधन बनाने की उसकी मुहिम कमजोर पड़ जाएगी। राहुल गांधी...