अन्ना का अनशन नहीं जीत पाया भरोसा


राजएक्सप्रेस, भोपाल। सात साल पहले का रामलीला मैदान और अन्ना हजारे का अनशन (Anna Hazare Strike) आज भी लोगों को याद है। हाल ही में एक बार फिर अन्ना आंदोलन कर चुके हैं, लेकिन इस बार लोगों की सोच भी अलग थी और अन्ना के साथी भी। नतीजतन, जन समर्थन भी उतना नहीं मिल पाया, जितना पिछले आंदोलन को मिला था। पिछले आंदोलन का सार लोगों में इस कदर अविश्वास भर चुका था कि इस बार जनता ने दूरी बनाना ही उचित समझा।
सात साल पहले का रामलीला मैदान और अन्ना हजारे का अनशन आज भी लोगों को याद है। वह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का आगाज ही नहीं, बल्कि बदलाव और बेहतरी की उम्मीदों के लिए बजा एक बिगुल था। पूरे देश में एक जनआंदोलन और व्यवस्था के प्रति आक्रोश पैदा करने वाली उस सैद्धांतिक लड़ाई के प्रति आमजन का मन से जुड़ाव था। हाल ही में एक बार फिर अन्ना आंदोलन कर चुके हैं, लेकिन इस बार लोगों की सोच भी अलग थी और अन्ना के साथी भी। नतीजतन, जन समर्थन भी उतना नहीं मिल पाया, जितना पिछले आंदोलन को मिला था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि 2011 का अन्ना आंदोलन एक बड़े बदलाव की गवाही था। बरसों से घोटालों का देश बन चुके भारत में वह आंदोलन लोकपाल बिल के लिए किया गया था। चूंकि, देशवासी भ्रष्टाचार के इस दंश को भोगने को अभिशप्त रहे हैं और आज भी हैं, सो अन्ना के समर्थन में आ खड़े हुए। लोग सड़कों पर उतर आए। जात, धर्म, वर्ग सब कुछ भुलाकर लोग अन्ना के साथ आए, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अन्ना के उस आंदोलन के नतीजे को लेकर रहा, क्योंकि उस दौरान उनके साथी रहे लोग स्वयं सत्ता का हिस्सा बन गए। जनता ने ठगा सा महसूस किया।
व्यवस्था बदलने का नारा देने वाले खुद इस व्यवस्था का हिस्सा बन भ्रष्टाचार को लेकर वही भाषा और व्यवहार अपनाने लगे जो इस देश की जनता सालों से राजनीति के दावपेचों में देखती आ रही थी। यह एक भरोसा टूटने वाली बात थी, जिसे लेकर यह तक कहा गया कि अब देश की जनता हर भेदभाव भुलाकर एकजुट हो शायद ही किसी आंदोलन के लिए यूं सड़कों पर उतरेगी। इस बार संभवत: वही हुआ। इस बार अन्ना के आंदोलन में आमजन की वो भगीदारी नहीं दिखी, जो सात पहले थी। मन का वह जुड़ाव नदारद था, जिसने पिछले आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई जैसा संघर्ष बना दिया था। ऐसा न होना वाकई सवाल खड़े करता है।
हालांकि, जिन मुद्दों को लेकर अन्ना आंदोलन कर रहे थे, उन पर तब भी सोचा जाना जरूरी था और अब भी सोचा जाना चाहिए। उनकी कुछ मांगें वही हैं जो सात साल पहले थीं। इस बार भी भ्रष्टाचार निवारण के लिए केंद्र में लोकपाल बिल लाना, राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति और किसानों के लिए स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करना जैसी मांगों के साथ अन्ना रामलीला मैदान में उतरे थे। गौरतलब है कि उनके 2011 के आंदोलन के कारण ही लोकपाल व लोकायुक्त कानून-2013 पारित हुआ था। सदन में पेश किए जाने के 46 साल बाद यह लोकपाल कानून पास हुआ था।
लेकिन सरकार ने अब तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं की है, जबकि सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि लोकपाल को एक ‘डेड लेटर’नहीं बनने दिया जाना चाहिए। सरकार को इसके लिए एक समय सीमा तय करनी होगी। इस बार अन्ना ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की बात भी की है। इस रिपोर्ट में किसानों से जुड़े तमाम मुद्दे और उनके समाधान के लिए बातें सुझाई गई हैं। अन्ना हजारे ने सरकार से किसानों के लिए बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य की भी मांग की है। यकीनन, इन सभी मुद्दों को लेकर आवाज उठाना बेहद जरूरी है।
बावजूद इसके इस आंदोलन को जनसमर्थन न मिलना कई विचारणीय सवालों की ओर इशारा करता है, जो मुख्य रूप जनभावना के विकर्षण से जुड़े हैं। जो आंदोलन तत्कालीन मनमोहन सरकार के लिए एक चुनौती बन गया था, उसमें आज लोगों की भागीदारी इतनी कम क्यों है? समाजसेवी अन्ना हजारे के 2011 के अनशन की तरह इस अनशन की मीडिया में चर्चा क्यों नहीं हुई? इतना ही नहीं कभी नौकरी-व्यवसाय तक छोड़कर रामलीला मैदान में जुट जाने वाले आम लोग भी इस बारे में कोई बात नहीं कर रहे, आखिर क्यों? 2011 का जो आंदोलन मीडिया के लिए बड़ा मुद्दा था, वह इस बार दोयम कैसे हो गया?
यह किसी से छिपा नहीं कि 2011 से लेकर 2013 तक मीडिया में जितनी बहस लोकपाल और भ्रष्टाचार को लेकर हुई उतनी किसी दूसरे विषय को लेकर नहीं हुई। आजादी के बाद पहली बार आम लोगों में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को लेकर ऐसी जागरूकता देखी गई। अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ 125 करोड़ भारतीयों की आवाज बने तो जनता में भी घूसखोरी के कोढ़ को रोकने के लिए कानून बनाने की जद्दोजहद में साथ देने का जनून और जज्बा देखने को मिला। देश के गली-चौराहों पर किसी कानून और उसके ढांचे को लेकर विचार विमर्श हुआ, लेकिन उस आंदोलन के खत्म होते ही तमाम बहसों और उम्मीदों पर लगाम लग गई।
गौरतलब है कि पूरे देश को भ्रष्टाचार के विरुद्ध एकजुट करने वाले अन्ना के उस आंदोलन का असर 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर भी पड़ा था। यह सच है कि जब अन्ना ने 2011 में आंदोलन किया था, तब देश में भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ जन आक्रोश था। आये दिन घोटाले सामने आ रहे थे। जनता रिश्वतखोरी की कुव्यवस्था से त्रस्त थी, लेकिन अब भी इन पहलुओं पर तो देश में कोई बदलाव नहीं आया है। कई तरह के घोटाले और व्यवस्था से भरोसा उठाने वाले मामले अब भी लगातार सामने आ रहे हैं। जनलोकपाल और लोकायुक्त की जरूरत अब भी खत्म तो नहीं हुई है।
हालिया आंदोलन में अन्ना सक्षम किसान, सशक्त लोकपाल और चुनाव सुधार को लेकर अनशन कर रहे थे। नि:संदेह ये सभी मुद्दे देश में बेहतर प्रशानिक और लोककल्याणकारी व्यवस्था बनाने के लिए जरूरी हैं। बावजूद इसके जनता ने अन्ना के आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि सात साल पहले की नैतिक और सैद्धांतिक बातों को आधार बनाकर व्यवस्था बदलने वादे भी केवल दावे बनकर रह गए। जनता की आशाओं को आगे चलकर उसी खेल में बदल दिया गया जो कि भारतीय राजनीति में बरसों से होता आ रहा है। दरअसल, साल 2011 के अन्ना आंदोलन के नतीजों ने पूरे देश के मनोविज्ञान को प्रभावित किया।
पिछले आंदोलन में युवाओं, बच्चों और यहां तक गृहणियों को भी रामलीला मैदान की भीड़ में देखा गया, लेकिन इस बार देश ही नहीं राजधानी दिल्ली का मध्यम वर्ग और नई पीढ़ी भी खामोश रही। दिल्ली में अब अरविंद केजरीवाल की सरकार है, जो सात साल पहले अन्ना के आंदोलन का मुख्य चेहरा थे, इस बार उन्होंने भी चुप्पी साध रखी। पिछली बार अन्ना की टीम में अरविंद केजरीवाल, किरन बेदी और वीके सिंह जैसे चेहरे शामिल थे, जिनमें से एक केंद्र में विदेश राज्यमंत्री हैं एक पुडुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर हैं और केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं।
व्यवस्था में बदलाव के दावे और इस कोढ़ पर लगाम लगाने की कवायद के वादे आमजन के मन में भरोसा नहीं जगा पा रहे हैं, जिसके चलते लोग आंदोलन को लेकर उदासीन दिखे। युवा हतोत्साहित हैं और बदलाव की बातें उन्हें वास्तविक न लगकर राजनीति के किसी दावपेंच का ही हिस्सा लग रही हैं। अन्ना हजारे के इस आंदोलन का फीका-फीका रहना इस बात को पुख्ता करता है कि पिछली बार हुए आंदोलन के सार ने लोगों के विश्वास को किस कदर तार-तार कर दिया था।
बहरहाल, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस ने अन्ना हजारे को आश्वासन देकर आंदोलन तो शांत करा दिया है, मगर उन सवालों की चिंगारी अब भी सुलग रही है, जिन्हें लेकर आंदोलन की रूपरेखा बनी थी। उम्मीद है कि अन्ना की मांगों पर सरकार गंभीरतापूर्वक विचार करेगी। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अन्ना आंदोलन कर रहे हैं और सरकार के एजेंडे में भी यह मुद्दा शीर्ष पर है। ऐसे में सरकार को अन्ना की मांग पूरी करने में कोई दिक्कत नहीं पेश आनी चाहिए।

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