इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी उद्योग पर संकट के बादल छाने लगे



हमारे देश के इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी उद्योग पर संकट के बादल छाने लगे हैं। पिछले कोई तीन दशक में इस उद्योग का भारी फैलाव हुआ था। इससे देश की वाषिर्क आमदनी में प्रतिवर्ष 150 बिलियन डालर का इजाफा होता था। करीब 40 लाख लोग इस उद्योग से रोजी-रोटी कमा रहे थे। इस उद्योग के माध्यम से देश की कई कंपनियां अमेरिका और यूरोप की कंपनियों को सस्ता तकनीकी श्रम उपलब्ध करा रही थीं। लेकिन अब विश्व स्तर पर इस उद्योग की प्रकृति और कार्यशैली में बहुत सारे परिवर्तन आए हैं।
अब इस उद्योग में दिन-प्रतिदिन ऑटोमेशन बढ़ रहा है। रोबोट पर निर्भरता बढ़ रही है। इस तरह की बड़ी मशीनें एवं यंत्र बन गए हैं, जिनसे जरूरी काम लिए जा रहे हैं। इस विकास के कारण ही हमारे देश के तकनीकी श्रमिकों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसके कारण ऐसी परिस्थितियां भी निर्मित हो रही हैं, जिनके चलते अमेरिका और यूरोप के देशों की हमारे देश की प्रतिभा पर निर्भरता कम हो गई है। यदि इस तरह की स्थितियां लगातार चलती रहीं तो इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ जाएगी।
यही आशंका ‘न्यूयार्क टाइम्स’ में प्रकाशित एक लेख में भी व्यक्त की गई है, जिसके अनुसार इस तरह की परिस्थितियों से केंद्र सरकार को राजनीतिक नुकसान तक भुगतना पड़ सकता है, क्योंकि नरेंद्र मोदी ने वषर्-2014 के चुनाव में दो प्रमुख आश्वासन दिए थे। पहला यह कि देश में विकास की गति बढ़ेगी और दूसरा, बड़ी संख्या में लोगों को काम मिलेगा। पर इसी वर्ष जनवरी में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में काम के नए अवसर अब कम पैदा हो रहे हैं। आईटी क्षेत्र के एक विशेषज्ञ टीवी मोहनदास के अनुसार, सितंबर आते-आते इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी में लगे लगभग दो प्रतिशत लोग बेरोजगार हो जाएंगे। ‘एमसी किन्से इंडिया’ ने भी अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी में लगे 50 से 70 प्रतिशत लोगों की योग्यता लगभग अप्रासंगिक हो जाएगी।
यानी, जो कार्य-कुशलता अभी उनके पास है, वह उपयोगी नहीं रहेगी। वैसे इस बीच इस बात की भी संभावना है कि नए तकनीकी ज्ञान के रास्ते खुलेंगे, लेकिन वे इतने बड़े पैमाने पर नहीं होंगे, जिससे वर्तमान पर बढ़ने वाले दुष्प्रभाव की क्षतिपूर्ति हो सके। इसकी भी संभावना है कि काम के अवसर बढ़ेंगे तो, पर वे भारत में नहीं, अमेरिका और अन्य विकसित देशों में बढ़ेंगे। इसके लिए कुछ हद तक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वीजा संबंधी नई नीति भी उत्तरदायी है। पहले वीजा संबंधी जो कानून थे, उनके चलते अनेक भारतीय अमेरिका में जाकर काम पा लेते थे, लेकिन अब ऐसा संभव नहीं होगा।
हालांकि, इस बीच केंद्रीय इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आश्वस्त किया है कि काम के अवसर बहुत ही सीमित मात्रा में कम होंगे। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस तरह की खबरें गलत हैं कि टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री से बड़े पैमाने पर लोगों को हटाया जा रहा है। हां, यह बात सही है कि जो अपेक्षा के अनुसार काम नहीं करेंगे, उन्हें हटना पड़ेगा। हम दिन-प्रतिदिन अपनी क्षमताओं को बढ़ाते हैं। लेकिन आज जो परिस्थितियां बन गई हैं, उनके लिए मुख्य रूप से औद्योगिक इकाइयां जिम्मेदार हैं। जिस काम के लिए अमेरिका में 12 डालर मिलते हैं, उसी के लिए हमें यहां एक डालर मिलता है।
एक परिस्थिति यह भी है कि छोटी जगहों व ग्रामीण इलाकों के लोग शहर आए, उन्होंने इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला लिया एवं डिग्री हासिल की। इनकी तादाद प्रति वर्ष बढ़ती गई। इन्हें इस बात का भरोसा था कि देश में स्थित ऑउटसोर्सिग कंपनियों में उन्हें काम मिल जाएगा। परंतु धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलती गईं और प्रतियोगिता ने विशाल रूप ले लिया। छात्र अश्विन कोटनाला बताती हैं कि उन्होंने देहरादून की ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 20 कंपनियों में आवेदन भेजा, पर उन्हें नौकरी नहीं मिल पाई।
कारण साफ है कि आज हर आदमी आईटी कंपनी में ही काम करना चाहता है, क्योंकि वहां वेतन काफी अच्छा मिलता है। उन्होंने कहा कि मुझे पूरा भरोसा है कि यदि किसी आईटी कंपनी में मुझे काम मिलता है तो मैं अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर पाऊंगी व जिस कंपनी में मुझे काम मिलेगा, उसके विकास में भी भागीदार बनूंगी। लेकिन देश में वातावरण कुछ ऐसा बन रहा है, जिससे ऐसे लोगों को भी काम मिलना मुश्किल होगा, जिन्हें काम का लंबा अनुभव है। इस लंबे अनुभव के बाद भी उन्हें नई स्किल्स सीखना पड़ेगी। बिना उसके उन्हें काम मिलना मुश्किल हो जाएगा। 38 वर्षीय दिनेश शेंडे बताते हैं कि उनसे इसी वर्ष फरवरी में जबरन त्यागपत्र लेकर हटा दिया गया। वे एक प्रतिष्ठित कंपनी में काम करते थे। अब कई महीनों से वे काम ढूंढ रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव के किसान परिवार में पैदा हुए थे, पर नौकरी में वे 37 हजार डालर प्रतिवर्ष कमा रहे थे। अब उनका नियोक्ता कहता है कि आप अपनी स्किल्स बढ़ाएं। वे स्किल्स बढ़ा भी लें और नई डिग्री हासिल भी कर लें, तो इसकी क्या गारंटी है कि कोई कंपनी उन्हें काम देगी।
इस बीच बेंगलुरु में उन्हें काम मिला भी, पर उनका वेतन वहां बहुत कम था। इस तरह के कामगारों की बात सुनने वाला अब कोई नहीं। हालांकि, अभी हाल ही में कुछ इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी कंपनियों से निकाले गए लोगों ने मिलकर कोर्ट में याचिका दाखिल की है। सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल इस याचिका में 47 लोग शामिल हैं। इनका अपनी कंपनी पर आरोप है कि वह उनसे जबरन इस्तीफा मांग रही है। सुधाकर चौधरी नामक एक तकनीक कर्मचारी, जो उक्त कंपनी में काम करते थे, एक दिन सुबह काम पर पहुंचे, तो उनसे कंपनी के मैनेजर ने कहा कि आपको इस्तीफा देना होगा। चौधरी कहते हैं कि मैं 11 वर्ष से कंपनी में काम कर रहा था। अचानक नौकरी जाने से मुझे गहरा धक्का लगा।
सुधाकर कहते हैं कि वर्ष-2006 में एक फ्लैट के लिए कर्ज लिया था। अब मेरे पास नौकरी नहीं है। अब उनके सामने सवाल यह है कि वे अपने परिवार का भरण-पोषण करें या कर्ज चुकाएं? सुधाकर तो आईटी सेक्टर में आए संकट का एक उदाहरण मात्र हैं, उन जैसे अनेक लोग हैं, जो इस तरह की मुसीबतों का सामना कर रहे हैं। यह चिंता का विषय है। इंफारमेशन टेक्नोलॉजी ने निम्न और मध्यम वर्ग के लिए मानो स्वर्ग के दरवाजे खोल दिए थे। इस क्षेत्र में रोजगारों की बहार आने से कई लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया, कई लोगों का विदेश जाने का भी सपना पूरा हुआ। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। कुछ बदलाव आधुनिकीकरण की वजह से आया है, तो कुछ ट्रंप की नीतियों की वजह से। इसका एक कारण यह भी है कि कर्मचारी स्वयं को समय के हिसाब से अपडेट नहीं कर पाते हैं, तो भी संकट का निदान किया जाना चाहिए।

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