चीन पर दबाव हमारी सफलता, भारत की कूटनीतिक जीत




डोकलाम मुद्दे पर चीन और भारत के बीच जारी गतिरोध की कूटनीतिक लड़ाई में चीन पिछड़ने लगा है। अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया के खुलकर भारत के पक्ष में आने के बाद चीन पहले से ही सकते में था। रही-सही कसर जापान ने पूरी कर दी। भारत के साथ जापान को खड़ा देख एक समय आंखें दिखाने वाला चीन अब बचने के रास्ते तलाशने लगा है। चारों तरफ से घिर रहा चीन अब कह रहा है कि डोकलाम विवाद की परिणति अगर युद्ध के तौर पर होती है तो उसे कुछ हासिल नहीं होगा। विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि युद्ध की स्थिति में चीन को भारी नुकसान उठाना पड़ जाएगा। ऐसे में, चीन द्वारा लगातार की जा रही बयानबाजी के बावजूद दोनों देशों के बीच बचे हुए कूटनीतिक संबंध भी खतरे में पड़ जाएंगे। विशेषज्ञों ने यह भी माना कि डोकलाम में भारत, चीन से कहीं ज्यादा बेहतर स्थिति में है। चीन के बदले इस रुख का श्रेय डोकलाम में मुस्तेदी से डटे भारतीय जवानों के साथ ही मोदी सरकार की कूटनीति को भी दिया जाना चाहिए।
भारत और चीन के बीच सिक्किम से लगी भूटान सीमा पर पिछले डेढ़ माह से भी ज्यादा समय से तनाव बरकरार है। इस दौरान कई बार चीन ने भारत को युद्ध की धमकी देकर पीछे हटने को विवश करना चाहा, मगर भारत ने हर बार उसे मुंहतोड़ जवाब दिया। रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने तो यहां तक कह दिया कि चीन भारत को 1962 वाला कतई न समझे। यह बयान चीन की हेकड़ी कम करने के लिए काफी था। दरअसल, चीन शुरू से ही भारत के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ने की कोशिश कर रहा है। वह इस रणनीति पर काम कर रहा है कि उसकी उकसावे वाली नीति में फंसकर भारत कोई गलती करे और वह फायदा उठा ले। मगर भारत चीन की परवाह किए बगैर उन सभी देशों को साथ लाने में कामयाब हो गया, जो चीन से आगे हैं या फिर दोस्ती की गाड़ी पटरी पर नहीं है। वैसे, डोकलाम में जो विवाद है उसकी एक अन्य वजह भारत की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक और सैन्य शक्ति में अप्रत्याशित वृद्धि है, जो चीन को परेशान किए है।
अब चीन के विशेषज्ञों ने युद्ध को लेकर जो चिंता जताई है, अगर उसका निष्कर्ष देखें, तो भारत डोकलाम में चीन से नौ गुना मजबूत है। वहां भारत के एक सैनिक के मुकाबले चीन को नौ सैनिक खड़े करने होंगे। इसके साथ ही भारत सांगपो इलाके में भी स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। सांगपो क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश में माउंट कैलाश के विपरीत पड़ता है, जो ब्रह्मपुत्र नदी से लगा हुआ है। चीन ने यहां 11 पुल बना रखे हैं। भारत के लिए यहां 250 किलोमीटर लंबी सीमा पर ही सुरक्षा स्थितियां चिंता की वजह हैं। हालांकि, इस इलाके में चीन ने किसी तरह की हरकत नहीं की है। वैसे चीन के विशेषज्ञों की चिंता में 1967 भी जरूर शामिल होगा। जब 1962 युद्ध के पांच साल बाद ही नाथू ला र्दे में हमारे जवानों ने चीनी सैनिकों को करारी शिकस्त दी थी। अब देखना है कि चीन अपने विशेषज्ञों की चिंता को किस रूप में लेता है।

Comments

Popular posts from this blog

सीरिया को नर्क से मुक्ति की जरूरत

भारत-फ्रांस संबंधों को आयाम

कानूनी सख्ती पर अमल भी किया जाए