चीन जिद पर अब भी कायम, दोनों देशों को पारस्परिक विश्वास की जरूरत



राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की चीन यात्रा संपन्न हुई। इस यात्रा के दौरान उन्होंने अपने चीनी समकक्ष येंग जेइची और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। भारत-भूटान एवं चीन ट्राई जंक्शन पर जून के मध्य में शुरू हुए विवाद के बाद भारत और चीन के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों के बीच यह पहली बैठक थी। यद्यपि इस सुरक्षा बैठक को लेकर पहले से ही कुछ खास होने की आशा नहीं थी, जो हुआ भी नहीं। दोनों तरफ से आधिकारिक वक्तव्य या संयुक्त वक्तव्य इस संदर्भ में नहीं आया। हां, चीनी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने कॉमेंट्री की और ज्ञान बांटा। सवाल यह उठता है कि इस यात्रा के महत्व को, खासकर भारत-चीन के टकराव के संदर्भ में किस नजरिए से देखा जाए?
हालांकि, अजीत डोभाल और येंग जेइची की इस मुलाकात पर शिन्हुआ ने कॉमेंट्री करते हुए कहा है कि दोनों देशों को दुश्मनी की जगह साझा हित के साथ आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। उसने द्विपक्षीय बैठक के प्रभाव को महत्वपूर्ण बताया और मित्रता की तरफ बढ़ने के संकेत दिए हैं। उसने कहा है कि दोनों देश ‘जन्म से दुश्मन’ नहीं हैं, सो दोनों देशों को पारस्परिक विश्वास बढ़ाने की जरूरत है। यही नहीं, उसने युद्ध की आशंका को खत्म करने की भी अपील की। शिन्हुआ के मुताबिक, चीन भारत के लिए समस्या नहीं है, बल्कि विकासशील देशों की आम समस्याएं, जैसे- भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य और शिक्षा की कमी भारत को पीछे धकेल रही हैं। अत: भारत को समझना होगा कि चीन उसकी जनता की भलाई चाहता है। यदि भारत उसके साथ खड़ा हो जाए तो उसे खुशी होगी।
चीन के सरकारी मीडिया ने यह भी लिखा है कि दुश्मन बनने की जगह भारत-चीन के पास साझा आधार, साझा हित व महत्वाकांक्षाएं हैं। दोनों ही विकासशील देश हैं, उनको जलवायु परिवर्तन, संरक्षणवाद और वाशिंगटन के वित्तीय विशेष अधिकार के मुद्दे पर काम करने की जरूरत है। इस तरह चीनी शासन मौन रहा और मीडिया ने ज्ञान बांटा। सवाल यह उठता है कि आखिरकार क्यों चीनी शासन नेपथ्य में रहकर अपनी बात मीडिया के माध्यम से कहना चाह रहा है? क्या इसके जरिए चीन डबल गेम खेल रहा है अथवा यह उसके संवाद का तरीका है? सभी को पता है कि चीन का मीडिया स्वतंत्र न होकर प्रशासन का ही एक प्रतिष्ठान है, इसलिए वह जो बोलता है, वह एक प्रकार से चीनी शासन का ही बयान होता है। इसके बावजूद चीनी शासन दुनिया की नजर में सौम्य एवं चरित्रवान दिखना चाहता है और मीडिया के जरिए अपनी बात भी भारत के सत्ता प्रतिष्ठान तक पहुंचाना चाहता है।
यानी, चीन अपने मीडिया का प्रयोग एक रणनीतिक हथियार की तरह कर रहा है। फिर तो भारत को इसे गंभीरता से लेने की जरूरत होगी। शिन्हुआ ने जो ज्ञान बांटा, उसका एक पक्ष यह भी दिखाई दिया कि चीन भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को भावनात्मक पुट देना चाह रहा है। पर क्या वास्तव में चीन भावना-संपन्न है? क्या चीन ने स्ट्रिंग ऑफ पल्र्स नीति, दक्षिण चीन सागर, भारत-वियतनाम संबंध, पाक आर्थिक कॉरिडोर के निर्माण, कहीं भी सह-अस्तित्व के सिद्धांत एवं भावनात्मक उदारता का परिचय दिया है? यूं भी अजीत डोभाल और येंग जेइची भारत-चीन सीमा तंत्र के विशेष प्रतिनिधि हैं। इसलिए कोई सार्थक बात हुई थी, तो संयुक्त बयान आना चाहिए था, जिसका विशेष महत्व होता।
लेकिन इस तरह का कोई बयान नहीं आया। वार्ता के बाद चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार येंग जेइची ने आधिकारिक बयान में सिर्फ इतना ही बताया कि उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों पर तीन देशों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श किया है। उन्होंने कहा कि मीटिंग में बहुपक्षीय व द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत की गई। यानी, इस बयान में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसके आधार पर हम मान लें कि चर्चा सार्थक हुई। अत: हमें किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इस तथ्य पर विचार करना होगा कि केवल चीन का शासन ही नहीं, बल्कि उसका सरकारी मीडिया पिछले कुछ दिनों से जिस तरह की अहमन्यता और आक्रामकता से ग्रसित है और भारत के खिलाफ बयान दे रहा है, उसका तात्पर्य क्या है?
क्या चीन अपने इमर्जेस के कारण वैश्विक शक्ति बनने की दावेदारी को पुख्ता करने के लिए अति -आक्रामक हो रहा है? यदि हां तो फिर उसकी आक्रामकता की सीमाएं क्या हैं? क्या वह लघु स्तर का युद्ध भी कर सकता है? ग्लोबल टाइम्स ने संपादकीय में लिखा था कि भारत को कड़ा सबक सिखाया जाना चाहिए। उसने तो यह भी लिखा कि भारत यदि चीन के साथ अपने सीमा विवादों को भड़काता है तो उसे 1962 से भी गंभीर नुकसान झेलना पड़ेगा। क्या इन सभी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए? महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि विवाद वास्तव में भूटान तथा चीन के बीच है, पर आमने-सामने भारत-चीन हैं। आखिर भूटान चुप क्यों है?
हमें हिमालयी देशों को लेकर चीनी रणनीति और भारतीय हितों को गंभीरता से देखना होगा। इस संदर्भ में कुछ बिन्दु महत्वपूर्ण हैं। पहला यह कि चीन भारतीय सीमा का अतिक्रमण करने का आदी रहा है व उसकी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी भारतीय सीमा में घुसकर एलएसी (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल) का प्राय: उल्लंघन करती है, लेकिन इससे पहले दोनों तरफ से प्रतिक्रिया की तीव्रता इस स्केल की नहीं रही, तो फिर अब यह उच्च तीव्रता वाली प्रतिक्रिया क्यों? दूसरा-चीन मैकमोहन रेखा को मान्यता नहीं देता, जबकि वह भूटान के साथ की गई संधि को मानने का तर्क देता है। संधियों-समझौतों का आकलन क्या चीन की सुविधा के अनुसार होगा?
तीसरा-चीन कभी यह क्यों नहीं स्वीकार करता कि ब्रिटिश भारत ने सीमा संबंधी जितनी संधियां की थीं, वे तिब्बत के साथ की थीं, जो तब एक संप्रभु राष्ट्र/राज्य था, न कि पीपुल्स रिपब्लिक चीन के नियंत्रण वाला प्रदेश? चौथा यह कि चीन हिमालयी राष्ट्रों में अपना प्रभुत्व स्थापित कर ऊपर की तरफ से भारत को घेरना चाहता है। उसने पहले तिब्बत पर कब्जा किया, फिर नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाया। अब वह भूटान में भी यही सब कर रहा है। हां, अब तक भूटान उसके खांचे में फिट नहीं बैठ पाया है या यूं कहें कि वह भारत के खांचे से बाहर नहीं निकल पाया है। चीन की यही असल छटपटाहट है।
लिहाजा, डोका-लॉ पर भारत का स्टैंड सही है और अब उसे पीछे नहीं हटना चाहिए। रही बात चीन व उसकी ताकत की, तो इतिहास साक्षी है यदि सिर्फ भौगोलिक आकार एवं सेना ही प्रमुख होते तो 1905 में जापान रूस को पराजित नहीं कर पाता, छोटा सा किंगडम दुनिया भर पर शासन नहीं कर पाता। भारत की नीति युद्ध की नहीं है। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए अहंकारी चीन अनैतिक है। उसका चरित्र बदलता रहता है। सो, हमें हर समय उस पर नजर तो रखनी होगी।

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