अपराध के दलदल में फंसते बच्चे को सही रास्ते पर लाने का एक भी उपक्रम हम नहीं कर सके



रेयान स्कूल के सनसनीखेज प्रद्युम्न मर्डर केस में सीबीआई ने जो खुलासा किया है, वह हैरतअंगेज है। रोज ही नए-नए खुलासे हो रहे हैं। माना जाना चाहिए कि आने वाले दिनों में कई ऐसे राज सामने आएंगे, जो हमारी कल्पना से परे थे। लेकिन सवाल यह भी है कि हमारे बच्चे अपराध के दलदल में जिस तरह फंसते जा रहे हैं, वह क्या सही है? बच्चों में अपराध करने के विचार कहां से आ रहे हैं, हम इस दिशा में कभी सोच पाएंगे? सिर्फ फिल्म और टीवी को ही जिम्मेदार बताकर जिम्मेदारी टालने की जो प्रवृत्ति हमने बना रखी है, वही बच्चों को हिंसक बनाने में काफी हद तक कसूरवार है। बच्चों का अपराध की तरफ जाना आज का किस्सा नहीं है। जुवेनाइल एक्ट का होना बताता है कि अब हिंसा की कोई उम्र नहीं रह गई है।
रेयान स्कूल में पढ़ने वाला ग्यारहवीं का छात्र प्रद्युम्न की हत्या का आरोपी है। एक मासूम बच्चे की गला रेतकर की गई हत्या के इस दर्दनाक मामले में आए नए मोड़ से फिर यह सवाल उठा है कि नई पीढ़ी में यह दिशाहीनता और आक्रामकता क्यों आ रही है? आखिर कैसे बच्चे बड़े कर रहे हैं हम? इससे पहले भी स्कूलों में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जो बच्चों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति का ही उदाहरण बनी हैं। बीते साल ही मध्य प्रदेश में एक निजी स्कूल के प्राचार्य ने छात्र को यूनिफॉर्म पहनने को कहा, तो उसने प्रिंसिपल को गोली मार दी थी। दिल्ली के सरकारी स्कूल में ऐसी एक वारदात में शिक्षक ने सख्ती दिखाई तो 12वीं कक्षा के दो छात्रों ने अपने सहपाठियों की उपस्थिति में उस शिक्षक की चाकू मारकर हत्या कर दी थी।
ऐसे मामले परवरिश और परिवेश दोनों को सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं। यह चिंतनीय है कि बच्चों में बढ़ रही उग्रता और उदंडता के ऐसे मामले देश के हर हिस्से में हो रहे हैं। मासूमियत से परे बर्बरता भरे ऐसे मामले पूरे समाज को ही चेताने वाले हैं। बच्चों में बढ़ रही अनुशासनहीनता, आक्रामकता और नकारात्मक व्यवहार अध्यापकों के लिए ही नहीं अभिभावकों के लिए भी बड़ी दुविधा पैदा कर रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण है जिन्हें देश का भविष्य कहा जाता है वे सशक्त व संवेदनशील नागरिक बनना तो दूर ठीक से इंसानी व्यवहार भी नहीं सीख पा रहे हैं, यह चिंतनीय नहीं तो क्या है।
बचपन ऐसा तो नहीं होता? ये बच्चे ही तो समाज के भावी नागरिक हैं। यही वजह है कि बर्बर अपराधों में बच्चों की भूमिका चौंकाती ही नहीं बल्कि अब भयभीत भी करती है। मासूमियत के गुम होने का यह ग्राफ हमारे पूरे पारिवारिक-सामाजिक तानेबाने के लिए ही नहीं बल्कि प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था के लिए भी विचारणीय एवं चिंतनीय विषय है। ऐसी कई गंभीर घटनाओं पर सोचते हैं तो लगता है कि बच्चों का मन बच्चों सा रहा ही नहीं। मासूमियत, संजीदगी और संस्कार की कमी आज के दौर में बच्चों में साफ दिखती है।
वहीं किशोरवयों में बढ़ती दुस्साहस भरी प्रवृत्तियों एवं आपराधिक मामलों में हो रहे इजाफे के आंकड़े इस बात को और पुख्ता करते हैं। पिछले एक दशक के आंकड़ों का अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि हर ओर की आपराधिक गतिविधियों जैसे छेड़छाड़, दुष्कर्म, यौन उत्पीड़न, चोरी, अपहरण, साइबर क्राइम और हत्या जैसी घटनाओं में किशोरों की संलिप्तता बड़े पैमाने पर देखने को मिल रही है। आंकड़े बताते हैं कि विगत पांच वर्षो में अपराध करने वाले नौ से 17 साल के किशोरों की संख्या में बहुत तेजी से इजाफा हुआ है।
इसमें कोई शक नहीं है कि आज के बच्चे सही सोच और सहनशीलता भरे व्यवहार से दूर होते जा रहे हैं। साथ ही हमारे यहां की लचर कानूनी प्रक्रिया और समाज की फैली विकृत व्यवस्थाएं भी बाल अपराधियों के बढ़ते ग्राफ के लिए जिम्मेदार हैं। इसी लचरता के कारण बच्चे ऐसी घटनाओं को अंजाम भी देते हैं व हर बार कानूनों का दुरुपयोग कर बच भी निकलते हैं। ऐसे में छोटी उम्र के अपराधियों के बढ़ते आंकड़े न केवल आमजन का मनोबल तोड़कर असुरक्षा और आक्रोश का माहौल बना रहे हैं, बल्कि देश और समाज के भविष्य को भी अंधकारमय बनाते दिखते हैं। तभी तो संवेदनशील समाज के लिए ऐसे मामले सदमे से कम नहीं। शिक्षण संस्थानों के भीतर ही मासूम बच्चों के साथ हैवानियत व बर्बरता से भरे हादसे तो बेहद डराने वाले हैं।
दरअसल, कम उम्र में ऐसी घटनाओं को अंजाम देने और उग्रता दिखाने वाले बच्चों का ऐसा व्यवहार हमारे सामाजिक व पारिवारिक परिवेश के बदलते परिदृश्य पर भी सवाल उठाता है। बीते कुछ सालों में नाबालिग अपराधियों की संख्या तेजी से बढ़ी है? आंकड़ों के मुताबिक वर्ष-2011 की तुलना में 2012 में छोटी आयु के अपराधियों द्वारा किए गए अपराधों में 11.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भावी पीढ़ी की यह नकारात्मकता भरी दिशाहीन सोच और बर्ताव डराने वाले है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि खेलने-कूदने की उम्र में ही बालमन कई कुत्सित अपराधों को अंजाम दे रहा है। अफसोस विकृत मानसिकता व र्दुव्‍यवहार की प्रवृत्ति छोटी उम्र में ही इनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन रही है।
कई घटनाओं की तो वजह ही हैरान परेशान करने वाली है। स्कूल यूनिफॉर्म पहनने को कहने या नियमित स्कूल आने की बात करने और नकल करने से रोकने जैसी बातों को लेकर भी विद्यार्थियों ने हत्या जैसी घटनाओं को अंजाम दिया है। किशोरों के उग्र व्यवहार और ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या के चलते ही जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन) एक्ट में भी संशोधन किया गया था। संशोधन के बाद जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को यह अधिकार मिल गया है कि किसी भी नाबालिग द्वारा किए गए जघन्य अपराध को देखते हुए वह मामले को सेशन कोर्ट में स्थानांतरित कर सकता है। ऐसे में अपराध का कृत्य अगर जघन्य अपराधों की श्रेणी में आता है तो आईपीसी और अन्य कानून के अनुसार सात वर्ष एवं उससे ज्यादा की सजा हो सकती है।
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट-2015 के मुताबिक, अगर नाबालिग की मानसिक व शारीरिक अवस्था ठीक हो तो उस पर बालिग की तरह मुकदमा भी चल सकता है। गौरतलब है कि भारतीय कानून के तहत 16 वर्ष तक के बच्चे अगर कोई आपराधिक कृत्य करते हैं तो उन्हें बाल अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा, जिसके तहत कम उम्र अपराधियों को दंड नहीं मिलता, बल्कि सुधार गृह में रखा जाता है। हालिया वर्षो में हत्या जैसे संगीन मामलों में कम आयु के अपराधियों की बढ़ती भागीदारी न सिर्फ कानूनी एजेंसियों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
हिंसक और संवेदनहीन होती नई पीढ़ी, आज ही नहीं आने वाले वक्त के लिए चिंताजनक है। समाज में कम उम्र के अपराधियों की संख्या जिस तरह से बढ़ रही है, निश्चित रूप से अब मासूमियत के मापदंड नए सिरे से तय किए जाने की जरूरत है। निर्भया हो या मासूम प्रद्युम्न, ऐसी बर्बरता दिखाने वाले अमानुषों को बच्चा समझना भूल होगी। अब नई पीढ़ी को यह पुख्ता संदेश देना भी जरूरी है कि सजा उम्र नहीं अपराध की गंभीरता तय करेगी। ऐसा न हुआ तो भावी पीढ़ियां अपराध के दलदल में धंसती जाएंगी। हमें समझना होगा कि ऐसी हर घटना भावी समाज के विखंडन की बानगी है।

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