अब राहुल गांधी अगले माह कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएंगे, आसान नहीं राहुल की राह




कांग्रेस के भीतर इंतजार की घड़ी खत्म होने की ओर है। अब यह पूरी तरह तय हो चुका है कि अगले माह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी हो जाएगी। अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए एक दिसंबर को अधिसूचना जारी होगी। इसके लिए 4 दिसंबर को नामांकन होगा और 16 दिसंबर को मतदान होगा। अगर मतदान हुआ तो 19 दिसंबर को मतगणना होगी और इसी दिन नाम का ऐलान भी कर दिया जाएगा। वैसे माना जा रहा है कि राहुल गांधी सर्वसम्मति से कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाएंगे। इसकी वजह यह है कि सभी दिग्गज नेता लंबे समय से उनको अध्यक्ष बनाए जाने की मांग करते रहे हैं। ऐसे में कोई अन्य नेता नामांकन दाखिल करेगा, इसकी संभावना बेहद कम है।
अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के लिए चुनाव प्रक्रिया राहुल गांधी की मंशा के अनुरूप ही हो रही है। दरअसल, वे चाहते हैं कि अध्यक्ष पद पर उनकी ताजपोशी महज सीडब्ल्यूसी के प्रस्ताव के आधार पर ही न कर दी जाए। राहुल संगठन चुनाव की प्रक्रिया के तहत ही अध्यक्ष पद पर अपनी ताजपोशी चाहते हैं। जनवरी-2013 में राहुल गांधी को महासचिव से पार्टी उपाध्यक्ष बनाकर नंबर दो की भूमिका सौंप दी गई थी। उसके एक साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अब तक की सबसे बुरी हार हुई। फिर महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और असम समेत कई राज्यों में कांग्रेस के हाथ से सत्ता चली गई। इसे राहुल गांधी की नाकामी के तौर पर भी देखा गया। लेकिन, कांग्रेस आलाकमान सही वक्त के इंतजार में था। सोनिया गांधी को लगता था कि सही वक्त पर ही सही फैसला लिया जाएगा।
सीडब्ल्यूसी की तरफ से कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा राहुल को कमान सौंपने पर मुहर लगाई जा चुकी है, लेकिन अब जबकि लोकसभा चुनाव में डेढ़ साल का वक्त बचा है, तब कांग्रेस के भीतर ‘चेंज ऑफ गार्ड’ की तैयारी हो रही है। ‘जेनरेशनल शिफ्ट’ की इस कवायद के बाद कांग्रेस की नई पीढ़ी टीम मोदी से भिड़ने को तैयार होगी। अपनी हर रैली और संबोधन में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी नेताओं की तरफ से कांग्रेस में वंशवाद को लेकर निशाना साधा जाता है। जब राहुल गांधी कांग्रेस की कमान संभालेंगे तो वंशवाद का मुद्दा भाजपा फिर से उठाएगी। लगता है राहुल गांधी ने इसी वजह से चुनावी प्रक्रिया के तहत कांग्रेस की कमान अपने हाथों में लेने का फैसला किया है। अब कमान आने के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस किस तरह कम बैक कर सकेगी, यह सिर्फ राजनीति की समझ रखने वाले नहीं, पूरे देश को इंतजार रहेगा।
बहरहाल, राहुल गांधी गुजरात चुनाव में जमकर प्रचार कर रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गढ़ में उन्हें जोरदार चुनौती दे रहे हैं। राहुल की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी का गुजरात चुनाव पर सकारात्मक असर होगा। पहला तो यह कि सोनिया गांधी इस बार चुनाव प्रचार से बाहर हैं और जिस तरह पहले मोदी और भाजपा सोनिया के विदेशी मूल के बहाने कांग्रेस को घेरती थी, वह इस बार नहीं है। अब मैदान में राहुल गांधी हैं और इस तरह के सवाल इस बार बाहर हैं। दूसरा यह है कि आर्थिक नीतियों के बारे में भी राहुल की सोच अलग है। सोनिया गांधी आर्थिक नीतियों के बारे में मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम पर भरोसा करती थीं, वहीं राहुल ने नोटबंदी हो या जीएसटी या फिर आर्थिक विकास, सब पर बेबाक राय दी है।
सोनिया गांधी 1998 से कांग्रेस अध्यक्ष हैं और कांग्रेस के इतिहास में सबसे लंबा कार्यकाल उनका ही है। उन्होंने संगठनात्मक रूप से बहुत बदलाव नहीं किए और उनके कार्यकाल में ‘सब चलता है’ की कार्यसंस्कृति कांग्रेस में विकसित हो गई थी। अब फेरबदल से युवाओं में स्पष्ट संदेश जाएगा कि अब कमान राहुल के हाथ में है। युवाओं और महिलाओं के बीच निश्चित तौर पर राहुल की लोकप्रियता बढ़ेगी। हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर जैसे युवाओं को अपने साथ मिलाने से उन्होंने युवाओं में यह संदेश तो दिया ही है कि वे उनकी बातें सुनने को तैयार हैं। राहुल के अध्यक्ष बन जाने से कांग्रेस की छवि में भारी बदलाव आएगा और वह होगा धर्मनिरपेक्षता का।
सोनिया गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस पर धर्मनिरपेक्षता के नाम का ऐसा लेबल लग गया था कि वह बहुसंख्यकों की अनदेखी कर रही है। राहुल ने इस शैली को काफी हद तक बदला है। शायद यही वजह है कि राहुल गांधी गुजरात चुनाव में मंदिरों में जा रहे हैं और हिंदू होने के नाते वे इस धर्म में आस्था जता रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात की अपनी चुनावी रैलियों में जय सरदार के साथ-साथ जय भवानी के भी नारे लगा रहे हैं और तकरीबन दर्जन भर मंदिरों के दर्शन भी कर चुके हैं। इसके अलावा यह किसी से छिपा नहीं है कि राहुल के भाषणों की धार काफी तेज हुई है। ऐसे में अध्यक्ष बनने के बाद तो पूरे अधिकार से वे अपने विरोधियों को जवाब दे पाएंगे।
वैसे, 132 साल पुरानी कांग्रेस की कमान राहुल को सौंपने से पहले अनुकूल हालात का लंबा इंतजार किया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बुरी तरह से हारने के बाद अनुकूल हालात के इंतजार में कांग्रेस ने कैसे कैसे बहानों से बदलाव टाला है, यह इतिहास में दर्ज है। पर अब भी ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि हालात अनुकूल हैं। हां, अब स्थितियां पहले जैसी प्रतिकूल नहीं हैं। अब देश में नरेंद्र मोदी की सुनामी का वैसा असर नहीं है, जैसा तीन साल पहले था। कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान ठिठक गया है और लोगों के बीच कांग्रेस की जरूरत महसूस होने के संकेत मिलने लगे हैं। छोटे-छोटे राजनीतिक घटनाक्रम से इस बात को समझा जा सकता है। यह कांग्रेस के लिए संक्रमण का समय है और इस संधि बेला में राहुल का कमान संभालना इस बात का संकेत है कि वे चुनौतियों से मुकाबले के लिए तैयार हो गए हैं।
अभी कांग्रेस ऐसी स्थिति में है, जहां से उसे वापसी ही करनी है। एक के बाद एक राज्यों से उसकी सरकार जा चुकी है। लोकसभा में उसके सिर्फ 46 सांसद हैं। राज्यसभा में भी अगले साल अप्रैल के बाद उसके सांसदों की संख्या 50 के नीचे आ जाएगी। 776 सदस्यों की संसद में पहली बार ऐसा होगा कि कांग्रेस के सौ सदस्य नहीं होंगे। इतने भारी पतन के बाद प्रकृति के नियम के तहत भी कांग्रेस का उत्थान होना है और अध्यक्ष पद पर राहुल बैठे होंगे तो स्वाभाविक रूप से उसका श्रेय उनको जाएगा। पर यह बात ध्यान रखने की है कि वापसी अपने आप संभव नहीं है।
कांग्रेस को भी वापसी के लिए उसी तरह मेहनत करनी होगी, जैसी मोदी कर रहे हैं। उसी तरह की रणनीति बनानी होगी, जैसी अमित शाह बनाते हैं। उसी तरह का गठबंधन बनाना होगा, जैसा भाजपा ने बनाया है। कांग्रेस के भावी अध्यक्ष के सामने मुख्य रूप से तीन चुनौतियां होंगी। पहली चुनौती कांग्रेस के प्रति आम लोगों के मन में बैठी धारणा को ठीक करना होगा। दूसरी चुनौती अपनी पार्ट टाइम और अगंभीर नेता की छवि बदलने की है और तीसरी चुनौती गठबंधन के नेताओं के बीच स्वीकार्यता स्थापित करने की है। पर इन सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि राहुल गांधी अपनी उस छवि से बाहर आएं, जो भाजपा ने बनाई है। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद गंभीरता सबसे ज्यादा जरूरी होगी।

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