महिलाओं की उम्मीदें: सशक्त बनाने के लिए उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना जरूरी




हालिया सालों में महिलाओं की भूमिका घर और बाहर दोनों ही जगह पर महत्वपूर्ण हुई है। आर्थिक विकास में महिला वर्ग की भूमिका की अहमियत भी बढ़ी है । यही वजह है आम बजट से आधी आबादी को भी बड़ी उम्मीदें रहती हैं, लेकिन इस बार के बजट में महिलाओं के लिए कोई खास घोषणाएं नहीं हुई हैं। हालांकि, ग्रामीण पृष्ठभूमि की गरीब महिलाओं के लिए जरूर सोच गया है। सरकार ने आठ करोड़ ग्रामीण महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देने का प्रावधान किया है। बजट में चार करोड़ गरीब घरों को सौभाग्य योजना से बिजली कनेक्शन देने का भी प्रावधान है। साथ ही महिलाओं की गरिमा को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2018-19 में गांवों में स्वच्छ भारत मिशन के तहत कुल 1.88 करोड़ नए शौचालय बनाने की बात भी की गई है। 2018-19 में ग्रामीण क्षेत्रों में 51 लाख आवास बनाने की भी योजना है, जिससे महिलाएं लाभान्वित होंगी।
हमारे यहां औरतें खेती किसानी से भी बड़ी संख्या में जुड़ी हुई हैं। बजट में प्रावधान है कि आर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए महिला स्वयं सहायता समूह भी बनाए जाएंगे। साथ ही इस साल के बजट में महिला स्वयं सहायता समूह के लिए ऋण बढ़ाने की भी बात की गई है। सेल्फ हेल्प ग्रुप के लिए ऋण सहायता 2019 तक बढ़कर 75 हजार करोड़ रुपए हो जाएगी। ध्यान देने वाली बात है कि महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए ऋण 2016-17 में बढ़कर लगभग 42 हजार करोड़ रुपए हो गया था। पिछले साल की तुलना में इसमें 37 फीसदी का इजाफा हुआ है। गौरतलब यह भी है कि व्यापार शुरू करने के लिए मुद्रा योजना से 76 फीसद कर्ज लेने वाली महिलाएं ही हैं। बजट में ग्रामीण महिलाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों ही तरह से लाभ दिए जाने की कोशिश की गई है। आज भी गांवों में महिलाएं खेती के साथ-साथ पशुपालन से भी जुड़ी हुई हैं। बजट में मछली एवं पशुपालन पर भी खास जोर है। इसके लिए 10 हजार करोड़ रुपए का फंड बनाए जाने का प्रावधान किया गया है।
महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना जरूरी है। बजट 2018 में सरकार ने महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने और कामकाजी महिलाओं के आंकड़ों में इजाफा करने के लिए भी कदम उठाए हैं। पहली बार नौकरी शुरू करने वाली महिलाओं के लिए एक बड़ी घोषणा की गई है। संगठित क्षेत्र में कामकाजी महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए भी सरकार भविष्य निधि अधिनियम 1952 में बदलाव करने जा रही है। इस बदलाव से उनके हाथ में आने वाले वेतन में इजाफा हो सकेगा। बड़ी आमदनी के चलते महिलाएं ज्यादा बचत कर पाएंगी। इसके लिए पीएफ में नौकरी के पहले तीन साल के लिए महिला कर्मियों का अंशदान वर्तमान 12 फीसदी या 10 फीसदी से घटाकर आठ फीसदी करने की बात कही गई है, जबकि नियोक्ता के अंशदान में कोई बदलाव नहीं होगा। महिलाओं के लिए सुखद कदम यह भी है कि अब मातृत्व अवकाश 12 हफ्तों से बढ़ाकर 26 हफ्ते कर दिया गया है।
गांवों से लेकर शहरों तक आधी दुनिया की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए बजट में कुछ कल्याणकारी योजनाओं और महिला सशक्तीकरण को लेकर सोचा जरूर गया है, पर आधी आबादी से जुड़ी कई अहम् बातों की अनदेखी भी हुई है। खासकर महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सेनिटेशन के विषय पर और ध्यान दिए जाने की जरूरत थी। यकीनन, शौचालयों के निर्माण, उज्ज्वला योजना के तहत गरीब महिलाओं के गैस कनेक्शन और मुद्रा योजना के तहत कारोबार के लिए ऋण मुहैया कराना, महिलाओं की बेहतरी के लिए उठाए गए कदम हैं, लेकिन ये पहले से मौजूद योजनाओं में फेरबदल करने जैसा भर लगता है। बजट 2018 से यह उम्मीद की जा रही थी कि महिलाओं की सुरक्षा पर भी सरकार कुछ न कुछ जरूर करेगी। महानगरों से लेकर गांवों तक बढ़ रहे दुष्कर्म और शोषण के आंकड़ों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा, लेकिन इस मामले में यह बजट वाकई निराश करता है। हालिया सालों में हमारे यहां कामकाजी महिलाओं की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। देखने में आ रहा है कि कार्यस्थल पर भी महिलाओं के साथ न केवल र्दुव्‍यवहार के मामले सामने आ रहे हैं बल्कि घर से दफ्तर तक पहुंचने में भी असुरक्षा का माहौल बना है। ऐसे में सुरक्षित वातावरण के बिना महिला सशक्तीकरण की सारी बातें बेमानी सी लगती हैं। सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से न सोचा जाना वाकई देश की आधी आबादी को निराश करने वाला है।
दरअसल, इस सरकार के इस आखिरी पूर्ण बजट को लेकर महिलाओं के पास आशाओं की एक लंबी सूची थी। महिलाओं के लिए सुरक्षा और विकास के साथ-साथ रसोई का खर्च भी मायने रखता है। ऐसे में बढ़ती महंगाई के दौर में महिलाओं को केंद्र सरकार से दैनिक जरूरतों की वस्तुओं की कीमत नियंत्रित करने की भी आशा थी। महिलाओं के नजरिए से देखा जाए तो इस बजट में घर गृहस्थी की उपयोगी चीजों के मूल्यों पर लगाम लगाने से लेकर सशक्तिकरण तक प्रभावी कदम उठाए जाने की दरकार भी थी। हाल ही में पीएम मोदी ने भी मन की बात कार्यक्रम में महिला सशक्तिकरण और हर क्षेत्र में आधी आबादी की भूमिका को रेखांकित करने वाली बात कही थी, लेकिन आम बजट में महिलाओं की कई उम्मीदें अधूरी रह गईं। सरकार से बेटियों के लिए उच्च शिक्षा हेतु सहयोग और सुरक्षा के पहलू पर कदम उठाने की भी वाजिब सी उम्मीद थी। महिलाओं की सेहत और स्वच्छता से जुड़े होने के चलते सैनेटरी पैड्स पर जीएसटी हटाने की भी मांग की जा रही थी, इसे भी पूरा नहीं नहीं किया गया। इस पर ध्यान दिया जाना था, क्योंकि यह स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू है।
यह आज के समय की दरकार है कि रोजगार, उच्च शिक्षा और कौशल विकास जैसे विषयों पर कुछ इस तरह से सोचा जाए कि इनमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जा सके। विशेषकर युवतियों की, क्योंकि हालिया सालों में बेटियों के शिक्षित होने के आंकड़े तो बढ़े हैं मगर असुरक्षा, असमानता और दोयम दर्जे से जूझते हुए वे करियर की दौड़ में कहीं पीछे छूट जाती हैं। हर विसंगति से लड़कर शिक्षा पाने वाली आज की स्त्रियां खुद के लिए रोजगार के पर्याप्त मौके भी चाहती हैं और सम्मान के साथ काम करने का उचित माहौल भी, क्योंकि अब दोहरी जिम्मेदारी निभाते हुए भी वे खुद को साबित कर रही हैं। सरकारी संस्थानों से लेकर निजी कंपनियों तक में वे ऊंचे ओहदों पर विराजमान हैं और अपनी कार्यकुशलता का परिचय दे रही हैं। इसके लिए बजट में सुरक्षा और रोजगार से जुड़ी जो महिला योजनाएं हैं उन्हें और बेहतर बनाए जाने पर विचार होना ही चाहिए था। आधी आबादी की सुरक्षा से जुड़े पहलू को नजरअंदाज करते हुए उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की बात अव्यावहारिक लगती है। वैसे, सरकार ने महिलाओं की उम्मीदों को पूरा करने के लिए काफी कुछ किया है, फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि नए वित्त वर्ष की घोषणाओं में महिलाओं के हाथ खाली रह गए हैं।

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